बार बालाओं के परिजन और बार मालिक

कुछ सालों पहले महाराष्ट्र में जब काँग्रेस सरकार थी तब उस सरकार ने डांस बार बंद करने का निर्णय लिया. तब आर आर पाटिल राज्य के गृहमंत्री थे. कारण ये था कि डांस बारों के कारण काफी घर बर्बाद हो रहे थे. काफी युवाओं की ज़िंदगियाँ बर्बाद हो रही थी.

इस निर्णय ने बार मालिकों को सब से बड़ा नुकसान कराया क्योंकि युवतियों के मादक नृत्य के अलावा उनके पास ग्राहक खींचने को कुछ नहीं था. लेकिन उनका कोई नैतिक आधार नहीं था कि जिस पर वे अपना धंधा और उसमें फंसा धन बचा सके और धंधा फिर से चला सके. तब एक नई चाल चली गयी.

कोई भी अवैध और अनैतिक धंधा फलता फूलता है तो उसके लाभार्थी गिने चुने लोग नहीं होते. हाँ, धंधे से सब से अधिक मुनाफा जिनको होता है वे मालिक या पार्टनर कम होते हैं लेकिन इन धंधों का लाभ बहुतों को होता है, बहुतों के घर के चूल्हे जलते हैं. इनमें से कई लोग वाकई व्यक्तिगत कोई गलत काम नहीं करते. जैसे शराब के ठेके के बाहर अंडे बेचना. चखना के आइटम बनाना और सप्लाई करना. टेबल कुर्सी रिपेयर. बार में वेटर या उसके किचन के कर्मचारी गण. लिस्ट बनाने जाये तो काफी बड़ी होगी.

और गलत काम के सहायक और लाभार्थी भी गिने तो और भी बड़ी. नेता, पुलिस, निगम और जो भी. लेकिन इनमें जो भी गलत काम नहीं करते थे उन पर तो गाज गिरी, उनकी कमाई के स्रोत सूख गए. फिर भी, काम करने वाले कहीं न कहीं और चले गए, लेकिन बैठे बैठे मलाई काटनेवाले सब से अधिक प्रभावित हुए.

लेकिन यहाँ बार बालाओं के परिजनों को विक्टिम बताया गया. बेचारी युवती अपने परिजनों का पालन पोषण कर रही थी, अब उसके बूढ़े माँ बाप को कौन देखेगा, उसकी माँ का इलाज कैसे होगा, भाई की पढ़ाई कैसे होगी. नेता हल्के हल्के इलाके के लोगों में फैलती बेरोजगारी की सामाजिक समस्या और उसके परिणामों की बात करने लगे. कुल मिलकर मीडिया ने कुछ यूं माहौल बनाया कि सरकार ने यह बहुत ही अमानवीय कदम उठाया है. और किसी ने यह नहीं पूछा कि यह जवानी ढलने के बाद उस बार बाला और उसके परिजनों का क्या होगा, क्या उनके फरिश्ता आश्रयदाता उनकी कुछ ऐसी ही व्यवस्था लगाएंगे?

तब सोशल मीडिया नहीं था लेकिन काँग्रेस सरकार थी जिसको मीडिया को मैनेज करने में महारत रही है. और जनता का साथ था. बाद में ये बार शहर से बाहर शिफ्ट हुए. लेकिन कहीं भी यह बात नहीं आई कि मीडिया को बार बालाओं के लिए सहानुभूति किस महानुभाव के कारण आई. कभी कभी एकाध नाम चर्चा में आए लेकिन चर्चा हुई ही नहीं.

आज GST को लेकर जो हो हल्ला मचाया जा रहा है उससे यही याद आया. धंधा बंद नहीं हो रहा लेकिन बातें बहुत नकारात्मक की जा रही हैं. खोदने पर या दो-तीन सवाल और करने पर या कुछ सुझाव देने पर लोग भड़क या बिदक जाते हैं – अरे, आप को क्या समझा में आयेगा, आप हमारी तकलीफ समझना ही नहीं चाहते. हमारे पास टाइम नहीं ये सब करने का. हम परेशान हैं, और सरकार ने और परेशान कर रखा है और आप सरकार की वकालत कर रहे हैं.

यहाँ मुझे नोटबंदी का समय याद आता है. तब मैं दिल्ली में था. एक कुकर लेना था तो वहीं इंद्रपुरी में एक दुकान में पूछा. था उनके पास लेकिन उनको कैश ही चाहिए था. कार्ड हम लेते ही नहीं जी. चलिये ट्रान्सफर कर देता हूँ खड़े खड़े, मोबाइल से – नहीं जी, हम वो सब काम नहीं करते जी. सॉरी जी, सरकार के कारण आप को परेशानी हो रही है कैश लाने की या और कहीं जाने की और हमें कस्टमर लूज़ करना पड़ रहा है. मोद्दी ने यह बहुत बुरा किया जी बिज़नसवालों के साथ.

बस वही दोहराया जा रहा है. बंद हो रहे हैं जी बिज़नस. अच्छा, आप का तो चालू है, किसका बंद हुआ? ओ जी, बहुत लोगों के हो गए, लोग बोलते हैं जी मार्किट में.

अब एक नयी समस्या है. पहले दुकानदार को बिल बनाने की इच्छा नहीं थी, अब ऐसे ग्राहक भी मिल रहे हैं जिनको पक्का बिल नहीं चाहिए. पक्का बिल लेना ही होगा तो माल लेते नहीं, दूसरी जगह जाते हैं ऐसी शिकायत उठाई जा रही है. बस यह नहीं बताया जा रहा कि माल क्या होता है, कितने का होता है और ग्राहक कौन लोग होते हैं. ऐसे ग्राहकों को यह बताकर डराया जाता है कि वे अगर पक्का बिल लेंगे जिसमें उनका नाम आया हो तो तय है कि टैक्स वाले भी उनके दर पे आएंगे और टैक्स देना याने परेशान होना.

कहीं न कहीं मुझे वहीं बार बालाओं के साथ सहानुभूति के गीत सुनाई दे रहे हैं. बस बार मालिक तब भी गुमनाम रहे, यहाँ भी कोई असली आदमी का नाम नहीं आता. बाकी जो है सो हईये ही है.

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