क्या सचमुच वैदिक आर्य नहीं थे मूर्तिपूजक!

सिंधु घाटी सभ्यता की पशुपति मुद्रा (seal, मोहर)

यूं तो मैं वेदों का ज्ञानी नहीं. मगर यह भी अच्छा ही है कि मैं स्वयं को प्रकांड पंडित नहीं मानता. कोरे कागज़ पर लिखना आसान होता है और जो लिखा गया वो आसानी से पढ़ा भी जा सकता है. इसलिए जब वेद और उनकी विभिन्न विस्तृत व्याख्या पढता हूँ तो उसे सरलता से समझने का प्रयास करता हूँ. क्योंकि मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं है.

इसलिए जब अपनी सामान्य बुद्धि से इसे समझता हूँ तो पाता हूँ कि वैदिक काल के मानवीय विकासक्रम को कितनी सरलता से वेद और उपनिषद में संग्रहित किया गया है. हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के साथ रह कर जो सीखा और उसके रहस्यों को समझा, उसे आने वाली पीढ़ियों के हित में उपयोग किये जाने के लिए उसको सरल भाव में संकलित किया.

क्योंकि ये रचनायें काव्यशास्त्र के सभी पैमानों के अनुसार भी श्रेष्ठों में श्रेष्ठ हैं तो इसमें प्रतीकों व अलंकारों का प्रयोग बड़ी ख़ूबसूरती से किया गया. मगर इस काव्य सौंदर्य को ही हमने कालांतर में क्लिष्ट बना दिया. इसका भावार्थ तो समझा नहीं उलटे शब्दार्थ में भी अर्थ का अनर्थ कर दिया. यहां यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि इसको क्लिष्ट करने के कई फायदे होते हैं, इससे कइयों कि दुकान चलती रहती है.

बहरहाल, उपरोक्त सवाल का जवाब संक्षिप्त और सरल भाषा में देने का प्रयास कर रहा हूँ. यह अंतिम सच नहीं हो सकता और फिर सनातन में अर्थ भी निरंतर है. हाँ तो मुद्दे पर वापस आएं तो यह सच है कि वैदिक आर्यों की मान्यतानुसार ईश्वर निराकार है, अशरीर है, अरूप है. और फिर यह ठीक भी है, जिसे हमने देखा नहीं उसे अदृश्य मान लेने में ही भलाई है.

लेकिन ये संसार तो उसका दृश्य रूप है. हमार अस्तित्व है तो हमारा आकार और रूप भी है. और फिर हमारे पूर्वज आर्य यह जानने लगे थे कि इस शरीर का जीवनदाता और संरक्षक प्रकृति में कौन-कौन है. जीवन के लिए आवश्यक जल, वायु, अन्न का शुद्ध होना कितना महत्वपूर्ण है. अन्न के लिए उनके द्वारा विकसित की गई कृषि व्यवस्था के लिए प्रकृति से क्या-क्या जरूरी है.

यज्ञ को आर्यों से जोड़ा जाता है और वेदों में इसका विस्तृत वर्णन भी है. इसी संदर्भ में ऐसा मत बना कि आर्य यज्ञ करते थे, मूर्ति पूजन नहीं. मगर यह मेरे मतानुसार पूर्णतः सत्य नहीं. इसके लिए अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि आर्य कृषि आधरित संस्कृति विकसित कर रहे थे. कृषि योग्य भूमि के लिए जंगल को आग के हवाले किया जाता था. यही प्रक्रिया धीरे-धीरे यज्ञ में परिवर्तित हुई.

अग्नि जीवन में अति महत्वपूर्ण बन गई इसलिए ऋग्वेद में अग्नि प्रमुख देव हैं. और फिर फसल के लिए बरसात अति महत्वपूर्ण है इसलिए दूसरे सबसे प्रधान देवता इंद्र माने गए. यज्ञ में इन दोनों का आह्वान किया जाता था. सूर्य से सभी ऊर्जा प्राप्त होती है तो उनका भी आह्वान किया जाता था. अर्थात इन देवताओं को आमंत्रित किया जाता था.

अब जब अपने आराध्य को बुलाएंगे तो उन्हें उचित स्थान भी देंगे और फिर उनके स्थान पर विराजमान हो जाने पर ही उनका पूजन करेंगे, उनकी अर्चना कर सकेंगे. तो ऐसा करते ही हम उस अदृश्य शक्ति के प्रतीक स्वरुप विभिन्न देवताओं को आमंत्रित करते हैं. यहाँ फिर उस प्रतीक, उस आकृति का ही तो पूजन हुआ.

सच तो ये हैं कि अब जब उन्हें बुला ही लिया जाता होगा तो उनको किसी ना किसी रूप में बिठाकर ही उनका पूजन किया जाता होगा. अर्थात उन्हें कोई ना कोई मूर्त रूप देना ही पड़ता होगा. आज भी हम पूजन में कलश स्थापित करते हैं. यहाँ यह कलश भी तो ब्रह्माण्ड का ही प्रतीक है. क्योंकि इसमें धारण करने की क्षमता है, पात्रता है. यहाँ भी तो हम पूरे ब्रह्माण्ड को केंद्र में रखकर उसके प्रतीक का पूजन करते हैं. क्या यह मूर्ति पूजन नहीं है?

पूजन क्या है? जिसके प्रति वास्तविक श्रद्धा भाव हैं उसकी पूजन का मन करता है. पूजन में सम्मान के भाव को क्रिया रूप में प्रगट किया जाता है. श्रद्धा सक्रिय बनाना ही पूजन है. पूजन में हम कुछ अर्पित करते हैं, जिसको हम श्रद्धा से नमन करते हैं, हम चाहते हैं कि उसका प्रभाव क्षेत्र बढ़े, और फिर हम फलस्वरूप यही कामना करते हैं कि उनकी हम पर विशेष कृपा बनी रहे.

साधना से उपासना करते हैं अपने आराध्य की आराधना करते हैं. ऐसा करने के लिए अपने आराध्य का रूप स्वरुप हो तो साधना करना आसान हो जाता है, विशेषरूप से आम आदमी के लिए. उसका आराध्य अगर उसके जैसा ही है तो वो उससे संबंध बनाने में अधिक कामयाब हो जाता है. अगर यही हम निराकार आत्मा का अशरीर परमात्मा से संबंध स्थापित करने की बात करेंगे तो यह सामान्य जन को समझना और उसे जीवन में उतारना मुश्किल होगा.

हमारे ऋषि मुनि इस मानवीय स्वभाव को जानते और समझते थे इसलिए उन्होंने अग्नि, वायु, जल सबका मानवीय रूप देकर उनका पूजन करवाया और इस तरह से प्रकृति के महत्व को स्थापित किया. मगर हमने उनके भावार्थ को हटा कर सिर्फ शब्दार्थ को पकड़ लिया और कर्मकांड में फंस कर रह गए. और जब मूर्तिपूजा का वर्तमान स्वरुप प्रचलन में आकर जीवन का अंग बन गया तो हमने यज्ञ से पूजन के क्रमिक विकास को पूरी तरह से भुला दिया.

इसका नुकसान यह हुआ कि हममें और हमारे पूर्वजों में भेद करने का खेल खेलने वालों के लिए यह एक बिन्दु मिल गया. और यह कहा जाने लगा कि आर्य मूर्तिपूजक नहीं थे. जिससे यह समझ आये कि आर्य हमसे अलग थे. जबकि सच यह है कि यज्ञ से लेकर मंदिरों में स्थापित देवताओं की मूर्ति आर्यों के प्रकृति पूजन का क्रमिक विकास है. इसके साक्ष्य हड़प्पा-सरस्वती सभ्यता की खुदाई में भी मिलते हैं.

सच कहे तो हमें गर्व करना चाहिए कि यही एकमात्र संस्कृति है जो धीरे-धीरे अनुभव के आधार पर विकसित हुई! इसलिए यह प्राकृतिक है और व्यवहारिक भी. वेद और उपनिषद वो ग्रंथ नहीं है कि आसमान से किसी ने कहा और धरती पर किसी ने इसे उतार दिया. ये हवाहवाई किताबें नहीं हैं बल्कि आदिमानव के अनुभव का लेखाजोखा है.

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