हमको शल्य कहे तब तो गर्व है ही, लेकिन गर्व करने के लिए हमारे पास विकर्ण भी है

इससे पहले ये शल्य पर्व अब से लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व फेसबुक पर कुछ फेसबुकियों ने चालू किया था… हम समझ नहीं पाये कि वे फेसबुकिए अपनी ही पार्टी की कमियों को गिनाने वाले शुभचिंतकों को शल्य बोल कर दुर्योधन या कर्ण किसको सिद्ध करना चाहते थे.

अब एक बार शल्य को नरेंद्र मोदी जी ने पुनः स्मरण किया है… जिस संदर्भ में मोदी जी ने शल्य को याद किया है वो बड़ा आश्चर्यजनक है कि आखिर क्या मोदी जी के थिंक टैंक बौद्धिक स्तर पर इतना दिवालिया हो गया कि उसको अपने उद्धरण के लिए फेसबुक के मूर्खतापूर्ण पोस्ट्स का सहारा लेना पड़े…

और हाँ! वे राकेश सिन्हा, वे ही JNU वाले राकेश सिन्हा जो कि संघ विचारक के रूप में टीवी चैनल्स पर आते हैं, वे तो CNBC Awaaz पर विपक्षी दलों को ही शल्य बता शल्य के उदाहरण को जस्टीफ़ाई कर रहे थे.

लेकिन मोदी जी का इशारा तो अपनों के लिए ही था… यदि डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी, यशवंत सिन्हा, एस गुरुमूर्ति, अरुण शौरी शल्य हैं तो फिर निश्चित ही अरुण जेटली जी कर्ण और स्वयं मोदी जी दुर्योधन की भूमिका अपने लिए फिक्स नजर करते आते हैं.

आखिर शल्य जैसे अतुलनीय वचनबद्ध योद्धा जैसा कोई पॉज़िटिव पात्र महाभारत या रामायण में कहीं अन्यत्र भी मिलते है क्या?

क्या मोदी जी के थिंक टैंक को पता नहीं कि शल्य को किस प्रकार दुर्योधन द्वारा छला गया तब, जबकि वो महाभारत के युद्ध में धर्म के पक्ष में लड़ रहे अपने भांजे पांडवों का साथ देने आ रहे थे…

दुर्योधन ने उनको भ्रमित कर अपने पक्ष में होने का वचन मांग लिया… वचनबद्ध शल्य के पास आखिर विकल्प ही क्या था उस धर्म अधर्म की लड़ाई में अधर्म को परास्त करने का…

शल्य ने अधर्म को परास्त करने का भरसक प्रयत्न किया लेकिन अपने वचन से एक पल को नहीं डिगे… और अंत तक दुर्योधन का साथ दे युधिष्ठर के हाथों वीरगति को प्राप्त हुये…

तो क्या मोदी जी दुर्योंधन हैं? यदि हैं तो किसी भाजपाई का भी शल्य होना उनके लिए गर्व का विषय हो सकता है… अंततः छला तो ये शल्य भी गया है… 2013 में सम्पूर्ण भगवा जगत की सेना को येन केन प्रकारेण अपने पक्ष में करके, आज राजा अपने सेनापतियों को ले अपने मार्ग से च्युत है तो क्या किसी शल्य को अपनी भूमिका पर गर्व नहीं होना चाहिए…

आखिर शल्य क्या कोई राज्य या वैभव पाने के लिए मद्रदेश छोड़ कुरुक्षेत्र में थोड़े ही आए थे…. वे तो धर्म युद्ध में अपने को होम करने ही आए थे… वो बात अलग है कि अधर्म का साथ देने के वचन की मजबूरी में उनको अधर्म की ओर से हत होना पड़ा…

और अधर्म का साथ देते हुये क्या अकेले शल्य जैसे धर्म योद्धा को ही प्राण गँवाने पड़े?… मोदी जी के थिंक टैंक ने क्या विकर्ण का नाम नहीं सुना है… वो ही दुर्योधन और दु:शासन के बाद तीसरे नंबर के कुरु कुमार… जो कि सत्य में युधिष्ठर से कम ना थे तो धनुर्विद्या में अर्जुन, कर्ण, अश्वत्थामा, एकलव्य के समकक्ष थे…

द्रोपदी चीर हरण पर जब सम्पूर्ण कुरु सभा दृष्टि नीचे किए हुये दु:शासन और दुर्योधन के नीच कर्म पर मौन थी, तब ये विकर्ण ही थे जिन्होंने कि अपने दुष्ट अग्रजों का खुल कर विरोध किया…

और महाभारत युद्ध में भी युद्ध शुरू होने तक दुर्योधन को हर संभव सही मार्ग दिखाने की कोशिश करते रहे… युद्ध से अलग रहने का विकल्प होते हुये भी अपने सहोदर पक्ष के लिए ही युद्ध लड़ा और…

और जब सारे कौरवों की हत्या का प्रण लिए पांडु कुमार भीमसेन के सामने जब वे पड़े तो भीमसेन ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ते हुये विकर्ण को मारने से मना कर उनको अभय दान दिया तो विकर्ण ने भीमसेन को अपना प्रण पूर्ण करने का पूरा अवसर दे वीरगति प्राप्त की.

सो यदि कोई मोदी जी के थिंक टैंक को जाने-अनजाने मोदी जी को दुर्योधन बना कर पेश करने में कोई गुरेज नहीं तो… यहां भी कोई हीनभावना नहीं… हमको कोई शल्य कहे तब तो गर्व है ही… लेकिन गर्व करने के लिए हमारे पास विकर्ण भी हैं कि हम भले ही अपने पक्ष को सही गलत का ज्ञान दें लेकिन अंत में हमको होम तो अपने इसी पक्ष के नेता की इच्छा के लिए ही होना है.

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