झाबुआ : विषमताओं के मध्य अपने सम पर ठहरी एक संस्कृति

Jhabua

झाबुआ क्या है..
झाबुआ हवा के बिस्तर पर तैरता रूई का सफेद फाया नहीं है..
ना ही धूप के दूकूल में आकाश सा नीला रत्न..
झाबुआ कदली से बादलों के नीचे फरफराता हरित मडंल भी नहीं..
हाँ यदा कदा आपकी आँखों के झरोखों को यह अपने सौंदर्य से भरमा सकता है मगर असल झाबुआ नग्न तिखी घाटी में शुष्क मगर मखमल सी वनडाली पर उगा गुदाज मासंल पलाश है..

अगर आपने वन देवी वनदेवियों के रूप के बारे में सुना है तो और अगर मैं आपसे कहूँ कि साक्षात वे अपने वस्त्र त्याग पृथ्वी पर विचरण कर रहें हैं तो जो तस्वीर आपके जेहन में बनेगी वह झाबुआ की नहीं..

मगर जब आप देखेंगे कि फसल गोडते अपनी धोती को किसी साँवले पुरूष ने अपनी कमर में खोंस लिया है और स्वेद से लदकद उसकी माँसपेशियों का ताम्र वर्ण धूप की सौंध से सिंझा सिंझा सा हो गया है..

तब कोई पत्नी अठारहवें वर्ष में ही अपने दुधमुहें बच्चे की नग्न काया को उसके भाई बहनों को सौंप ..बैल को साध बुवाई कर रही है.. स्तनों से दूध चू कर मिट्टी पर धवलित बिंदिका बना रहा है…

तब आप उस पुरूष नारी के शुद्ध देवत्व में झर रहे सौंदर्य को शायद ना समझ पाएँ.. कुछ पहनावे और स्वच्छता के मूलभूत नियमों का वह लंघन आपमें मुँह फेरने लायक एक जुगुप्सक घृणा सी पैदा कर दे..

ठीक पलाश की तरह.. जिसमें कोई गंध नहीं ना ही किसी पुष्प सा प्रफुल्लित कर देने वाला पल्लवित विकास .. वह किसी पारिजात के समक्ष आपके सौंदर्यबोध का एक गर्वीला प्रतिमान नहीं हो सकता.. तुलना हुई तो आप कहेंगे तोते की चोंच सा पुष्प और पारिजात से तुलना..

मगर तब आप अनजाने ही अपना एक अलग वर्ग चुन लेते हैं..
मानिए कि अगर दर्शन में जुगुप्सा या घृणा आ गई तो वह दर्शन कहाँ रह गया..
जिस तरह विष्णु की कल्पना में तमाम सौंदर्यविद् अपने रूपक ढूँढ ही लेंगें.. लेकिन अगर आप विष्णु की एक कोढ़ी के रूप में कल्पना नहीं कर सकते ..
तब ठीक तभी ..
आपके और विष्णु के सर्वरूप के बीच एक लकीर आ जाती है.. जो भेदी नहीं जा सकती..
झाबुआ की घाटियों का नग्न सौंदर्य अगर आपको आकर्षित नहीं करता तब आपको अपने मन को टटोलने की जरूरत है कि क्या सौंदर्य के हर प्रतिमान के प्रति आप तटस्थ है..

आपकी तुलना के बंध लिए झाबुआ जाएँगे तो झाबुआ आपके पास से एक समांतर नदी की तरह बहता चला जाएगा ..यह तब भी होगा अगर आप मकई की गंध वाली पीली दो बलिश्त की रोटियों से परहेज करते हैं ..
खाखरे के पत्तो के बीच पकती आटे की गूँथली और खड़े मसाले में खेत के नवपके टमाटर प्याज लहसुन की उड़द अगर आपकी जबान पर नहीं टिकती, तब झाबुआ के भीतर भी आप झाबुआ से दूर रहेंगे..

यहाँ अगर आप किसी फिल्मी धुन पर किसी नशे में पान चबाते युवक को समझ नहीं पाते तो उस युवती की आँखे जरूर देखिएगा जिसका सुडौल रतिसम सौंदर्य उसकी ढलकती चाल पर मोहित है.. इस विडंबना के मर्म में निहित है उनका आपस में सम पर होना …उनके समक्ष हम अपनी विषमता पर हैं..
क्यों ना हो वे देव जो हैं …

गंधर्वों की भाँति स्त्रियाँ अपने सर्वस्व को किसी नदी किनारे अपने प्रेमी को सौंप देती है.. और प्रेमी के बिसारते ही खुद बिसार देती है वह प्रणय निशा ..या कभी अँत तक दोनों साथ रहते हैं ठीक किसी पुरातन निश्चिंतता के तहत.. देह यहाँ गौण है बेहद गौण.. इतनी कि मानो मुक्ति बस इनसे एक बलिश्त दूरी पर खडी है..

मगर ठीक इसी एक बलिश्त पर ये देव देवी रास की एक गोल आँकडी भर पुन: अपने समूह में खो जाते हैं.. और मुक्ति इस छद्म पर मुँह बाँए ठगी सी रह जाती है.. और देव भूमि अपनी संस्कृति की धरोहर को साफ बचा ले जाती है.

यह देवभूमी है ..इसे समझने के लिए अपना मानस त्यागना होगा.. यहाँ पहले खुद को जीतना होगा..
महुए की गंध वाली यहाँ की भूमि की सौंध में रमना इतना आसान नहीं ..
हम इन देवों के लिए अस्पृश्य ही है..
अस्पृश्यता जिसकी सीमाएँ जो खुद हमने तय कर रखी है…
इन सीमाओं के बाहर जो स्वर्ग है बस वही झाबुआ है…

कविता : झाबुआ के पठार पर…

भाषा नहीं कुछ और है..
ओ साँवले सौंदर्य..
कुछ और है जो मैं तुमसे दूर हूँ.. तुम्हारे बीच भी..
आमों की शाखों के बीच.. महकते..
फूस के मचान.. पर
समीर के सबसे बेहतरीन झोंकों में.. ठहरी नींद लिए तुम..
देह नहीं कुछ और है जो मैं तुमसे दूर हूँ.. तुम्हारे बीच भी…

तुम्हारे बारिशों में महकते मिट्टी के सौंधे घर..
भीगी.. खुले बाल, मेड़ ठीक करती कृषया..
बारिशों.. में लहकता दहकता..
मांसल, गुदाज पलाश..
महुओं की पकती गंध..
तुम्हारी अँग खेंच सटती.. और..
रंगों को देह पर छोड़ ..प्रेम सुवास को भीतर खेंचती होली..
मादंल पर थिरकते पाँव..
कमर भींचते हाथ..
वो उर्जा, वो उल्लास…

तुम्हारें बल्लम बाँस पर लरजते होंठ.. जैसे हो कृष्ण..
बाँसुरियों के स्वरों पर बहलती वृंदावनी गोप बालाओं सी ललनाएँ..
भगोरियों की उन्मुक्तता ठहरी रातों पर..
किसी पूनम चाँद.. और दो साँवली देह..
नदी के नम किनारों पर निस्तब्ध चट्टानों के मध्य सुवासित गन्धर्व विवाह.. के ठहरे पल..
भोर के पहले प्रहर तक.. मध्यरात्रि के बाद उठते प्रेयस के मंजुल राग..
फाग पर प्रेयसी का रतजगा.. अधीर, लाल अबीर सा कच्चा प्रेम..
ओ साँवले सौंदर्य..
मैं विलग हूँ क्यों..??
अस्पृश्य सा..तुमसे..

देखो हे वनराज, वनदेवियों..
तुम्हारें उन्मुक्त प्रेम से इस फाग.. विहान लोलित हैं..
मैं किसी आकाशगंगा से पिछड़े तारे सा उदास हूँ..
अपनी सत्ता के नियमों से
तुम्हारी उन्मुक्त छटा निहारता..
अत्यंत क्षुद्र सा..
झाबुआ के पठार पर..
अवगुंठित निराशा के आसन्न बोझ से..
अपने आस्तित्व पर तुम्हारे विलगन से हतभागी..
उदास आर्यजाति का अँतिम अवशेष..
अपने दर्प से मुँह मोडता हूँ..
तुममें शेष, प्रेम मुझे सीखा दो..
और इस अस्पृश्य को मुक्त होने दो.

– किंशुक शिव

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