कैसे गूंजेगा राम हृदय में : तुम हटो, जगह खाली करो, सिंहासन रिक्त करो

Osho sambhog se samadhi

एक बड़े फर्म का मैनेजर मरणासन्न
अवस्था में पलंग पर पड़ा हुआ था.
फर्म का मालिक उसे अंतिम
विदाई देने के लिए आया हुआ था.

मैनेजर बड़ा धार्मिक व्यक्ति था.
नियमित पूजा-पाठ, ब्रत-नियम,
उपवास, तीर्थयात्रा, सत्यनारायाण
की कथा, यज्ञहवन, जो भी सम्भव है,
सब करता था, करवाता था.

उसकी प्रसिद्धि थी गांव में.
उसका असली नाम लोग भूल गये थे,
उसको लोग भगतजी के
नाम से ही जानने लगे थे.

भगतजी मर रहे थे.
मालिक फर्म का आया हुआ था.
भगतजी ने दुखित स्वर में कहा:
मालिक, मुझे माफ कर देना.
अब मृत्यु के क्षण में आपसे क्या
छिपाऊं क्योंकि अब जब मर ही रहा हूं,

तो आपको बता देना उचित
ही होगा कि मैंने आपकी फर्म
से लाखों रुपये का घोटाला किया है.
और कम्पनी मेरी ही वजह
से घाटे में चल रही थी.

फर्म के मालिक ने कहा:
घबड़ाओ मत भगतजी, तुम्हीं थोड़े ही व्रत,
नियम उपवास करते हो, मैं भी करता हूं;
और तुम्हीं थोड़े ही तीर्थयात्रा करते हो,
मैं भी करता हूं; और तुम्हीं थोड़े ही
सत्यनारायण की कथा करवाते हो,
मैं भी करवाता हूं; तुम्हीं थोड़े ही भगत हो,
मैं भी भगत हूं.

भगतजी ने कहा:
मैं कुछ समझा नहीं.

तो उस मालिक ने कहा:
समझो, अब मरते वक्त
तुमसे भी क्या छिपाना.

निश्चिंत मरो भगतजी, घबड़ाओ मत,
न ही किसी प्रकार का अपराध-भाव
अपने हृदय में लाओ क्योंकि तुम्हें
जहर भी मैंने ही दिलवाया है.

सारा धर्म, सारा
क्रियाकांड पाखंड की तरह ही है,
जब तक कि राम हृदय में न बसे;
जब तक कि राम हृदय में न गूंजे.
और कैसे गूंजेगा राम हृदय में?
तुम हटो, जगह खाली करो,
सिंहासन रिक्त करो |

-ओशो गुरू प्रताप साध की संगति–(प्रवचन–9)

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY