ये सज़ाएं सही थीं या गलत!

दो कहानियाँ साझा कर रहा हूँ. अंत में एक प्रश्न है, उस पर अपनी राय अवश्य दीजियेगा. पहिली कहानी है Sun Tzu की. किंवदंती है, लेकिन उसमें एक बड़ी सीख है इसीलिए प्रसिद्ध है.

Sun Tzu प्रख्यात थे सैन्य प्रशिक्षण देने के लिए. तो वहाँ के राजा ने बुलाकर पूछा कि क्या आप मेरे जनानखाने की औरतों को भी सैन्य प्रशिक्षण दे सकते हैं? Sun Tzu ने हामी भरी, और बोले कि महाराज मेरी एक शर्त है. वहाँ मेरा हुक्म चलेगा, मुझे जो ज़रूरी लगेगा मैं करूंगा, आप किसी भी तरह से दखल नहीं देंगे. यह वचन मिले तो ही यह दायित्व स्वीकार है.

राजा ने वचन दे दिया. स्थान, दिन, समय तय हुआ, राजा खुद देखने उपस्थित हुआ. सभी औरतों को दो कतारों में खड़ा किया गया, शस्त्र दे दिये गए और फिर Sun Tzu ने कहा कि अब झांज और ड्रम बजेंगे, उस लय पर आप को कवायद करनी है. कवायद समझाई गयी, पूछ लिया, कोई शक? कोई नहीं? ठीक, शुरू करते हैं.

झांज बजी, ड्रम बजा लेकिन कवायद करने के बजाय सभी औरतें ही-ही-ही करके हंस पड़ी. सौध से देखता राजा भी हंसा, लेकिन Sun Tzu विचलित नहीं हुए. शांत भाव से बोले कि पहली बार समझाया गया तब हो सकता है कि समझ नहीं आया हो, दुबारा समझा रहा हूँ, ध्यान दीजिएगा.

दुबारा समझाया गया लेकिन परिणाम वही हुआ. कवायद करने के बजाय सभी औरतें फिर से ही-ही-ही करके हंस पड़ी. अब Sun Tzu ने ताली बजाई. दो कोनों से दो जल्लाद परशु लिए चले आए और दोनों कतारों में सब से आगे जो दो स्त्रियाँ थी उनको खींचकर गिराया और परशु उठाए. सौध से देखता राजा दौड़ा आया, क्या कर रहे हो? उन दो में से एक उसकी तत्कालीन फ़ेवरिट थी.

Sun Tzu ने उसे रोका और शांति से उसे उसके वचन का स्मरण करा दिया. राजा हताश हो कर लौट गया, वचन का बंधा था. Sun Tzu ने इशारा किया और उन दोनों के सर धड़ों से अलग कर दिये गए. वहीं रखे गए, सब को बहता रक्त, फड़फड़ाते धड़, सब दिखाई दे रहे थे.

जब वे धड़ शांत हुए, Sun Tzu ने पूर्ववत गंभीर मुद्रा से कहा, चलिये, हमें कवायद शुरू करनी है. झांज, ड्रम बजाया जाएगा, सब सावधान रहें.

जल्लाद वहीं धड़ों के पास खड़े थे, बिना कोई भाव के अपनी अपनी कतारों को देख रहे थे.

झांज, ड्रम बजाए गए और सब ने कवायद इस ढंग से की जैसे कवायद करने का लंबा अभ्यास हो. कोई हंसा नहीं, सभी का ध्यान कवायद में था.

दूसरी कहानी है लाछित बोरफुकन की.

लाछित महान अहोम (आसाम) सेनापति थे जिन्होने बड़ी मुग़ल सेना को सराइघाटी के युद्ध में मात दी थी. मुग़ल सेना से लड़ने के लिए एक गढ़ बांधने के आवश्यकता थी जिसका काम उनके मामा को दिया गया था. दिन-रात श्रम से काम होना था, हर क्षण महत्व का था. लेकिन रात को मामा को नींद आ रही थी और उन्होने बाकियों को भी सोने की अनुमति दी. सब सो गए.

यहाँ बीच रात लाछित उठाकर काम देखने आए तो देखा सब सो रहे हैं. उनका पारा चढ़ गया, मामा को डांट पिलाई तो मामा अकड़ गए, ज़रा नींद आई तो क्या हुआ, क्या काम ही करता रहेगा आदमी? सोएगा नहीं?

मामा अपने भांजे को समझे नहीं थे, लाछित ने सीधा तलवार खींचकर उनका सर कलम कर दिया. सभी लोग काम पर लग गए, काम पूरा हुआ. आज भी ये जगह Momaikota Garh नाम से मौजूद है. सर्च कर देख सकते हैं, यह किंवदंती नहीं है.

अब आप बताएं, क्या ये सज़ाएं सही थीं या गलत?

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