क्रांतिकारी स्‍वतंत्रता सेनानी श्‍याम जी कृष्‍ण वर्मा की जयंती : प्रधानमंत्री का एक पुराना वीडियो

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नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने भारतीय क्रांतिकारी और स्‍वतंत्रता सेनानी श्‍याम जी कृष्‍ण वर्मा के जन्‍मदिन के अवसर पर उन्हें नमन किया है. अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा –

‘‘मैं श्‍याम जी कृष्‍ण वर्मा की जयंती पर उन्हें नमन करता हूं. राष्‍ट्रभक्ति से परिपूर्ण उनका उत्‍साह एवं भारत की स्‍वतंत्रता के लिए उनके प्रयासों को कभी भुलाया नहीं जा सकता.” प्रधानमंत्री ने कहा, “मैं अपने एक पुराने भाषण को साझा करता हूँ- जिसमें मैने श्‍याम जी वर्मा और उनकी महानता के बारे में विस्‍तार से बताया है.’’

श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात प्रान्त के माण्डवी कस्बे में श्रीकृष्ण वर्मा के यहाँ हुआ था. यह कस्बा अब मांडवी लोकसभा क्षेत्र में विकसित हो चुका है. उन्होंने 1888 में अजमेर में वकालत के दौरान स्वराज के लिये काम करना शुरू कर दिया था.

मध्यप्रदेश के रतलाम और गुजरात के जूनागढ़ में दीवान रहकर उन्होंने जनहित के काम किये. मात्र बीस वर्ष की आयु से ही वे क्रान्तिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे. वे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित थे.

श्यामजी कृष्ण वर्मा क्रान्तिकारी गतिविधियों के माध्यम से भारत की आजादी के संकल्प को गतिशील करने वाले अध्यवसायी एवं कई क्रान्तिकारियों के प्रेरणास्रोत थे. वे पहले भारतीय थे, जिन्हें ऑक्सफोर्ड से एम॰ए॰ और बार-ऐट-ला की उपाधियाँ मिलीं थीं.

पुणे में दिये गये उनके संस्कृत के भाषण से प्रभावित होकर मोनियर विलियम्स ने वर्माजी को ऑक्सफोर्ड में संस्कृत का सहायक प्रोफेसर बना दिया था. उन्होंने लन्दन में इण्डिया हाउस की स्थापना की जो इंग्लैण्ड जाकर पढ़ने वाले छात्रों के परस्पर मिलन एवं विविध विचार-विमर्श का एक प्रमुख केन्द्र था.

इंग्लैण्ड से भारत लौटने के बाद 1905 में उन्होंने क्रान्तिकारी छात्रों को लेकर इण्डियन होम रूल सोसायटी की स्थापना की. उस समय यह संस्था क्रान्तिकारी छात्रों के जमावड़े के लिये प्रेरणास्रोत सिद्ध हुई. क्रान्तिकारी शहीद मदनलाल ढींगरा उनके प्रिय शिष्यों में थे. उनकी शहादत पर उन्होंने छात्रवृत्ति भी शुरू की थी. वीर सावरकर ने वर्माजी का मार्गदर्शन पाकर लन्दन में रहकर लेखन कार्य किया था.

31 मार्च 1930 को जिनेवा के एक अस्पताल में वे अपना नश्वर शरीर त्यागकर चले गये. उनका शव अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के कारण भारत नहीं लाया जा सका और वहीं उनकी अन्त्येष्टि कर दी गयी.

वर्माजी का दाह संस्कार करके उनकी अस्थियों को जिनेवा की सेण्ट जॉर्ज सीमेट्री में सुरक्षित रख दिया गया. बाद में उनकी पत्नी भानुमती कृष्ण वर्मा का जब निधन हो गया तो उनकी अस्थियाँ भी उसी सीमेट्री में रख दी गयीं.

22 अगस्त 2003 को भारत की स्वतन्त्रता के 55 वर्ष बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने स्विस सरकार से अनुरोध करके जिनेवा से श्यामजी कृष्ण वर्मा और उनकी पत्नी भानुमती की अस्थियों को भारत मँगाया.

बम्बई से लेकर माण्डवी तक पूरे राजकीय सम्मान के साथ भव्य जुलूस की शक्ल में उनके अस्थि-कलशों को गुजरात लाया गया. वर्मा के जन्म स्थान में दर्शनीय क्रान्ति-तीर्थ बनाकर उसके परिसर स्थित श्यामजीकृष्ण वर्मा स्मृतिकक्ष में उनकी अस्थियों को संरक्षण प्रदान किया.

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