जितना ईमानदार समाज, उतना ही मज़बूत देश, उतने ही उन्नत लोग

सचमुच भारत का समाज एक अजीब समाज है. ज्यादा दिन नहीं हुए, कोई तीन-साढ़े तीन साल पहले उस समय के शासक लूट के अनेक नए आयाम गढ़ रहे थे. तब जनता इससे परेशान थी. नई सरकार इस उम्मीद से लाई गई कि कोई कदम उठेगा जो इन सब लूट को रोकेगा.

नयी सरकार आई और इतने बड़े भूभाग की हर चीज़ को समझ कर कदम उठाने लगी. कभी अन्ना के पीछे पागल हुई जनता पूरी तरह से समाज में ईमानदारी लाने के लिए आन्दोलित थी. फिर नई सरकार बनी. सब तत्काल हर बेईमान को पकड़ कर अंदर करने और ईमानदार समाज बनाने को तत्काल कदम उठाने को बेचैन हो उठे.

नवंबर 2016 से फिर कदम उठाए जाने लगे. शुरू में सबको अच्छा लगा. बुरा तो खैर अभी भी किसी को नहीं लग रहा होगा, लेकिन विमुद्रीकरण (demonetization), आधार लिंकिंग, GST जैसे कदमों को काफी जनता अब बुरी नज़रों से देख रही है. क्यों देख रही है? कारण क्या है? आखिर मामला क्या है? ठीक से देखा जाए तो मामला कुछ नहीं है.

अन्ना की मांग थी कि लोकपाल लाओ, जो हमारे पिछवाड़े लाठी धर-धर के ईमानदार बनाएगा, क्योंकि बिना पिटे हम ईमानदार नहीं बनेगे. अब वही जनता कुछ भी खरीदने पर बिल काटे जाने से परेशान हो गई है. जो व्यापारी बेईमान अफसरों के द्वारा गाहे-बगाहे प्रताड़ित होने पर इनके खिलाफ कदम उठाने की मांग करते थे, वो ही व्यापारी अब ऑनलाइन return भर कर उस सरकारी बाबू के मुंह पर कागज़ फेंकने को बुरा मान रहे हैं.

इसका आसान कारण है कि ईमानदार हों, लेकिन हमको छोड़कर सब हों. हम माल कमाएं और बाकी ईमानदारी से रहें. अगर लतियाने वाला लोकपाल आ गया होता तो क्या होता? खुद ही सोच लें…

Demonetization से पहले जो काला बाज़ारी थी, जिस इकॉनमी को ब्लैक मनी संभालता था, वो काफी रुक गई है. जब पूरी इकॉनमी से कालाबाज़ारी की भारी रकम निकल जाएगी तो उसका असर पड़ना ही है. लेकिन कुछ हिस्से की जनता चाह रही थी कि सब ईमानदार हो जाएं और इसका कोई असर भी न पड़े. उदाहरण के लिए जनता चाह रही थी कि कुछ ऐसा हो कि जब हम प्रॉपर्टी बेचें तो महंगी बिके लेकिन जब खरीदें तो सस्ती मिले. ज़ाहिर है कि लोगों को नुकसान दिख ही रहा है.

आधार लिंक कराने से महाराष्ट्र में 10 लाख गरीब गायब हो गए. उत्तरखण्ड में भी कई लाख फ़र्ज़ी बीपीएल कार्ड धारी गरीब ख़त्म हो गए. 3 करोड़ से जायदा फ़र्ज़ी एलपीजी कनेक्शन धारक ख़त्म हो गए. मदरसों से वज़ीफ़ा पाने वाले 1,95,000 फर्ज़ी बच्चे गायब हो गए. डेढ़ करोड़ से ऊपर फ़र्ज़ी राशन कार्ड धारी गायब हो गए.

इन सबसे सरकारी ख़ज़ाने को चूना लगा रहे लोगों का टर्नओवर ख़त्म हो गया. ये लोग बाजार में मंदी का रोना लेकर रोने लगे. आधार लिंकिंग को बुरा बताने और इस पर खिसियाए इंसान वाला चुटकुला भेजने लगे. साथ में जनता भी खिखियाने और रोने लगी.

खैर मामले तो बहुत हैं… लिखेंगे… तुम चाहो तो सरकार बदल देना… हमको नहीं फर्क पड़ेगा… हम तब भी चेक से काम करने वालों में थे और आज भी बैंक खाते से ही काम करते हैं… आपकी परेशानी हमको समझ आती है.

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