मिलकर हम एक पुल तो पार कर नहीं सकते, वैश्विक खतरों के सामने कैसे खड़े होंगे?

पिछले दिनों मुम्बई की दुर्घटना पर आप मृतकों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दे कर निकल सकते हैं… या मोदी-फडणवीस, कांग्रेस-भाजपा को गाली गुफ्तार कर सकते हैं… पर यह दुर्घटना अगले सप्ताह फिर से नहीं होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं देगा…

मुम्बई में ऐसी अपेक्षा नहीं थी. इतनी भीड़ के बावजूद यह भारत का सबसे सभ्य और नागरिक संस्कारों वाला नगर है, इसमें भी शक नहीं है. पर ऐसी भगदड़ अगर मुम्बई में हो सकती है तो इसके दो अर्थ हैं… भीड़ बढ़ी है, और सिविक सेंस घटा है… और इन दोनों ही स्थितियों में कोई सुधार नहीं होने वाला. भीड़ और बढ़ने ही वाली है… सिविक सेंस घटने ही वाला है…

मुम्बई में जिस दिन यह घटना घटी, उस दिन सेंट्रल लंदन गया था. विक्टोरिया स्टेशन पर सुबह 9 बजे पहुंचा. विक्टोरिया ट्रेन स्टेशन से निकल कर अंडरग्राउंड में जाने के लिए भयानक भीड़ लगती है. कोई बाकायदा लाइन नहीं लगती, पर लोग अपने आप ही एक दूसरे के पीछे कई सारी कतारों में लग जाते हैं. फिर धीरे धीरे आगे सरकते हैं.

कोई पुलिस वाला सामान्यतः नहीं होता. उस कतार को पार करके अंडरग्राउंड की सीढ़ियों तक पहुंचने में कुल 17 मिनट लगे. किसी का किसी से कंधा भी छू नहीं गया. उस दिन मुझे ख्याल आया, अगर मैं इन कतारों के बगल बगल से सरक के आगे निकल जाऊँ तो कोई मुझे कुछ बोलेगा क्या? शायद नहीं… अधिक से अधिक कोई थोड़ा घूर कर देख लेगा… क्या बिगड़ जाएगा? पुलिस तो नहीं पकड़ेगी… कोई सज़ा तो नहीं हो जाएगी, पेनल्टी तो नहीं लगेगी… फिर भी कोई ऐसा करता तो नहीं दिखाई देता…

क्या लंदन में सभी महात्मा हैं? क्या लोगों को कोई लालच छल नहीं सूझता? क्या, व्यक्तिगत रूप से वे हमसे ज्यादा सुसंस्कृत हैं?

फिर भी कोई लाइन तड़प कर या दूसरे को धकिया कर आगे भागता नहीं दिखता. हड़बड़ी किसी को कम हो, ऐसा भी नहीं है… पर कोई करता नहीं है… किसी दिव्य ज्ञान के कारण नहीं… सिर्फ इसलिए, कि कोई दूसरा नहीं कर रहा…

इसे सभ्यता, सद्गुण, परमज्ञान नहीं कहते… इसे कहते हैं सोशल कॉन्ट्रैक्ट… यानि एक समाज में व्यक्तियों के बीच एक आपसी समझ कि कैसे व्यवहार करना है… कोई नियम कानून नहीं है यह, पर इसे कोई तोड़ता नहीं है…

भारत में यह सोशल कॉन्ट्रैक्ट गायब है. ऐसा नहीं है कि भारत में लोग ज्यादा स्वार्थी हैं… स्वार्थी होने में आप अंग्रेजों की बराबरी नहीं कर पाएंगे. पर लोगों के बीच एक एग्रीमेंट नहीं है, एक साझा समझ नहीं है कि कैसे व्यवहार करना है. लोगों का व्यवहार उनके अपने विवेक से, या विवेक के अभाव से संचालित होता है.

भारत में लोगों के बीच बेसिक सामाजिक कम्युनिकेशन गायब है… यह बीमारी मूलतः हिन्दू आत्मकेन्द्रन की बीमारी है. किसी को किसी की आवाज सुनाई नहीं देती… सिर्फ अपनी ही प्रतिध्वनियाँ सुनाई देती हैं.

एक समाज की तरह मिलकर हम एक सीधी सड़क, एक पुल नहीं पार कर सकते… वैश्विक खतरों के सामने कैसे खड़े होंगे? संवेदनाएं 20-25 लोगों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देने में मत खर्च कीजिये… दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता अपने गूंगे-बहरेपन से घुट कर मर रही है.

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