मेरी कविता एक पब्लिक लाइब्रेरी है

जो शब्द न सुहाए वह बदल देना
काट देना लाइन नई जोड़ देना
छंद की चाल सुधार देना

बिगाड़ देना अगर दिन ख़राब हो और तुम ग़ुस्से में हो
हिचकना मत, मेरी कविता एक पब्लिक लाइब्रेरी ही है
यहाँ तुम ला सकते हो अपनी प्रेयसी
बुर्क़ेवालियाँ यहाँ बुर्क़ा उतार स्कर्ट पहन सकती है
यहाँ आदमी आदमी से प्रेम कर सकता है
औरत औरत को लिख सकती है प्रेमपत्र

हिचकना मत, मेरी कविता को बदल देना इतना
कि लौटकर आए तो मैं पहचान भी न पाऊँ
प्यासे हो तो मटका बना लेना
शराबी हो तो सुराही, बीमार हो तो दवा की बोतल

कभी उपनिषद का गूढ़तम श्लोक मिलेगा
और कभी उचटी उचटी तुकबंदी कभी सिनेमा का गीत
कभी नौटंकी का चौबोला कभी सूर का पद
आख़िर मैं भी तो हाड़-माँस का पुतला हूँ

मैं भी तो चंवालीस डिग्री सेल्सीयस तापमान की दोपहरी में कई कई बार
वासना से भरकर निकल पड़ता हूँ गलियों में भटकता
मुझे भी स्त्रियों ने गाली दी
दुश्मन ने मेरी भी बाँह उमेठी है

तुम हिचकना मत, जैसा चाहे अर्थ निकालना, बदल देना अर्थ जो अनुकूल न हो
यहाँ कुछ भी शुद्ध नहीं यहाँ सब मिलाजुला है

मेरी कविता टेंटहाउस का तकिया
भाँत भाँत के मस्तक यहाँ विश्राम पा चुके
अश्रुओं से यह इतनी बार भींजा है कि भय लगता है
कोई दिन गाने न लगे
उन कंठों के गीत जो गाना नहीं जानते थे केवल रोना जानते थे,
जिनके लिए रोना ही गाना था.

अम्बर पाण्डेय की अन्य रचनाएं पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY