चुनिए अपना जामवंत, जो आपको करा दे आपकी शक्ति का एहसास

Rahul Singh Rathore

भृगु-संहिता के अनुसार मेरा जन्म “कर्मसागर योग” में हुआ है. भृगु और शुक्र के संवाद में शुक्र कहते हैं कि “कर्मसागर योग” में जन्म लेने वाला जिस काम में पूरे मनोयोग से हाथ डालता है उसमें सफलता प्राप्त करता है अथवा अपना लक्ष्य हासिल करता है.

2004-05 में मेरी रूचि ज्योतिष की तरफ बहुत तेज़ी से बढ़ी थी. बिना किसी गुरु या मार्गदर्शक के मैंने इस विधा को सीखना आरंभ किया और कई-कई कुंडलियों पर घंटों अभ्यास किया. फिर धीरे-धीरे ज्योतिष कार्य से संबद्ध कई संस्थाओं से भी जुड़ने का मौका मिला जिसके बाद ज्योतिष संबंधी शोध-पत्रों और पत्र-पत्रिकाओं की कभी कमी नहीं रही.

मैं दिल्ली के “सौभाग्य दीप” और “फ्यूचर पॉइंट इंडिया” और जयपुर के “ज्योतिष सागर” से लगातार जुड़ा रहा और 2006 के बाद से लगभग नौकरी मिलने तक मेरे आलेख और शोध-पत्र उन पत्रिकाओं में छपते भी रहे. “फ्यूचर पॉइंट इंडिया” से प्रकाशित पत्रिका “फ्यूचर पॉइंट” में “प्रश्न जन्मपत्री” स्तंभ के अंतर्गत कुंडली विश्लेषण के लिये कई बार पुरस्कृत भी किया गया और उनके द्वारा मुझे “ज्योतिष और व्यवसाय” विषय पर एक शोध-पत्र के लिये “ज्योतिष मर्मज्ञ” की उपाधि दी गई.

फिर अप्रैल, 2008 में दिल्ली के “हिन्दू महासभा” भवन में 23 साल की उम्र में “सौभाग्य दीप” के द्वारा सबसे युवा ज्योतिष-लेखक के रूप में सम्मानित भी हुआ. इसके साथ-साथ झारखंड और राजस्थान की कई ज्योतिष संस्थाओं की तरफ से बराबर आमन्त्रण आते रहते थे.

“सौभाग्य दीप” ने जब “सौभाग्य टीवी” नाम से भारत का प्रथम ज्योतिष चैनल आरंभ किया था तो उन्होंने मुझे भी उस पर अपने कार्यक्रम के लिये आमंत्रित किया था पर ज्योतिष मेरे लिये केवल कौतुहल, रोचकता, शोध और अपने ऋषि-महर्षियों के उन्नत मस्तिष्क पर गर्व करने का हेतु मात्र था इसलिये मुझे इसे कभी भी व्यवसाय रूप में नहीं अपनाना था.

मेरा मन हमेशा दो विपरीत ध्रुवों के बीच खिंचता रहता है इसलिये एक समय ऐसा आया जब मुझे इस पूरे विषय से विरक्ति हो गई. विरक्ति की एक वजह ये भी थी कि अधिकाँश ज्योतिष किसी घटना के घटित हो जाने के बाद येन-केन-प्रकारेण उसे ज्योतिषीय सूत्रों से साबित कर देते थे या फिर किसी कुंडली को देखते ही बोलना शुरू कर देते थे (जो संभव ही नहीं है). ये चीजें मुझे अजीब लगती थी.

मज़े की बात ये है कि विरक्ति की उस लंबी अवधि में भी मैंने ज्योतिष के ऊपर किताबें खरीदना नहीं छोड़ा. कुछ समय बाद “भविष्य दर्शन” की दूसरी विधियों पर मैंने ध्यान केन्द्रित किया. बाद में मेरे एक आत्मीय ने कहा कि कोई विधा इंसान बड़ी कठिनाई से सीखता है इसलिये इसे इतनी आसानी से भुलाओ मत.

फिर भी कुंडली विश्लेषण से तब भी कोफ़्त ही होती थी पर मैंने इतना निश्चय कर लिया था कि इतना अपडेट और जाग्रत तो हमेशा रहना है कि कोई मुझे ज्योतिष के नाम पर बेवकूफ न बनाये. आप इसे अहंकार कह सकते हैं पर मुझे हर ज्योतिष को देखकर यही लगता था कि ये मुझे क्या बतायेगा इससे ज्यादा तो मैं खुद जानता हूँ और इसलिये किसी ज्योतिष से मैं इस विषय पर चर्चा से भी बचता था.

पिछले वर्ष फेसबुक के माध्यम से मित्र बने राहुल सिंह राठौर से परिचय हुआ. ज्योतिष के ऊपर इनकी एक पोस्ट पढ़ी थी, पढ़कर लगा कि ये “ज्योतिष-शास्त्र” जानने वाला पहला इंसान है जो ये मानता है कि कोई भी कितना भी कुशल ज्योतिष क्यों न हो, हर चीज़ उसकी दृष्टि में नहीं आ सकती और किसी एक कुंडली का विश्लेषण ही इतना क्लिष्ट और विस्तृत होता है कि इंसान सारी जिन्दगी उसपर शोध कर सकता है.

फोन पर बात हुई, सामान्य बात-चीत के बाद ज्योतिष पर चर्चा हुई तो मैं स्तब्ध रह गया कि इस उम्र में किसी की ज्योतिष के ऊपर इतनी भी पकड़ हो सकती है? फोन पर तो कई दिनों तक उनकी ज्योतिषीय व्याख्याओं को बस सुनता ही रहा और उनके साहचर्य का नतीजा है कि इस ज्योतिर्विधा में मेरी रूचि दुबारा लौट आई है.

राहुल भाई के बहुआयामी व्यक्तित्व के कई आयाम हैं जिसमें एक ज्योतिष भी है, उनके व्यक्तित्व के बाकी पहलुओं से उनसे परिचित लोग अवगत हैं. राहुल भाई से जुड़िये पर मुफ्त में कुण्डली दिखवाने के लोभ के लिये नहीं बल्कि इस क्लिष्ट विषय को सहजता और सरलता से समझने के लिये (अगर रूचि है तो). शास्त्रों में कहा गया है “मुफ्त में कुण्डली” दिखवाना शुभ-फलदायक नहीं होता.

इतना लिखने के पीछे का उद्देश्य एक छोटा सा संदेश देना भी है. वो संदेश है: –

“परमात्मा ने हर इंसान को कुछ विधाओं और कलाओं से सु-संस्कृत किया है पर कोई उस विधा या कला का जागरण करवाने वाला नहीं मिलता. संदेश ये है कि अपने मित्रता की परिधि को बढाइये, क्या पता किसी और का साहचर्य आपने अंदर छिपे किसी विशिष्टता को बाहर लेकर आ जाये.

उर्दू शेर-शायरी और गज़ल की मेरी समझ बनी इसकी वजह मोहम्मद आबिद से मित्रता भी थी और ज्योतिष को लेकर नई दृष्टि राहुल सिंह राठौर से मिली. आप अपना जामवंत चुनिये आखिर हनुमान जी को उनकी शक्ति का एहसास जामवंत ने ही तो कराया था.

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