कामना, कृतज्ञता और जादू – 2 : आकर्षण का नियम

प्रकृति का आकर्षण का नियम कहता है कि आप जैसा सोचते हैं, वैसी वस्तु और परिस्थितियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे होते हैं. अब आप कहेंगे कि कौन ऐसा होगा जो परेशानियों और दुखों की कामना कर उसे आकर्षित करना चाहेगा.

इसे यूं समझिये कि आपको आज बन्दर के बारे में नहीं सोचना है क्योंकि आप बंदरों को पसंद नहीं करते. ऐसे में आप मन में यही दोहराते हैं, कि आज मैं बन्दर के बारे में बिलकुल नहीं सोचूंगा. तो ऐसा सोचते हुए भी आप बन्दर के बारे में ही सोच रहे हैं.

हम, जीवन भर यही करते हैं, जो हम चाहते हैं उसके बारे में सोचने के बजाय जो नहीं चाहिए उसके बारे में अधिक सोचते हैं. प्रकृति नकारात्मकता को नहीं पहचानती. वो पहचानती है आपके मस्तिष्क के विचारों और बोले गए शब्दों को इसलिए दुनिया भर की उन किताबों में जिनमें ‘सकारात्मक सोच का जादू’ बताया गया है, उनमें किसी हाथ की सफाई या अंधविश्वासी चमत्कार के बारे में नहीं कहा गया है. इन सारी किताबों में आपके विचारों से होने वाले जादुई परिवर्तनों के बारे में ही कहा गया है.

कुछ लोग मुझसे “जादू” के बारे में व्यंग करते हुए कहते हैं कि आप जो हमसे जानना चाहती हैं, वो अपने जादू से क्यों नहीं जान लेती. अक्सर मैं जवाब नहीं देती, इसलिए नहीं कि मेरे पास उनकी बातों का जवाब नहीं होता बल्कि इसलिए कि जिनको इस जादू पर विश्वास नहीं, उनके सामने वो जादू घटित होते हुए भी दिखाई नहीं देगा.

पहली बात, यह उसी तरह है कि किसी को ग्लास पानी से आधा भरा दिखाई देता है, किसी ग्लास को आधा खाली. यहाँ एक बात और जोड़ लीजिए कि उस ग्लास के पूरे भरे होने की कामना के साथ जो आधा भरा हुआ ग्लास मिला है उसके प्रति कृतज्ञ हो जाइए. जैसे ही आप प्राप्त वस्तु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना शुरू करते हैं, आपका गिलास जादुई रूप से पूरा भरने लगेगा.

साहित्यकार गुरुदत्त कहते हैं – यहाँ कामना शब्द को लालसा समझने की भूल कदापि न करें. कामना बुद्धि का विषय है और लालसा मन का. इन दोनों की प्राप्ति इंदियों द्वारा तथा इन्द्रियों के लिए होती है, परन्तु इनके प्राप्त होने पर तुष्टि भिन्न भिन्न कारणों को होती है. बुद्धि से विचार कर जो लक्ष्य निश्चय किया जाता है, उसे कामना कहते हैं. बुद्धि उदात्त भावनाओं से प्रेरित होकर अथवा निकृष्ट इच्छाओं से प्रेरित होकर भी लक्ष्य का निश्चय करती है. परन्तु जब बिना विचार किए केवल संस्कारों के धीन लक्ष्य निश्चय किया जाता है, तो उसे लालसा कहते हैं यह भी उदात्त भावनाओं और निकृष्ट भावनाओं से प्रेरित हो सकती है.

तो यहाँ कामना शब्द को नकारात्मक अर्थों में न लें क्योंकि किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के आपके अनुकूल होने की कामना के साथ यदि कोई ऐसा स्वार्थ जुड़ा है जो आपकी आत्मोन्नति के साथ प्रकृति की व्यवस्था के अनुकूल है तो उसका परिणाम अवश्य रूप से सकारात्मक होगा. लेकिन धन को पाने का लोभ, किसी स्त्री या पुरुष को पाने की लालसा या किसी परिस्थिति के आपके अनुकूल हो जाने के पीछे किसी दूसरे की जानबूझकर की जाने वाली हानि या अज्ञानतावश पहुँचने वाली चोट शामिल है तो, प्रकृति आपकी मदद तो कर देगी लेकिन उन हानियों के कारण उत्पन्न होने वाली अव्यवस्था और दुष्परिणामों का प्रभाव अंतत: आप ही को भुगतना होगा.

दूसरी बात, किसी और के मन की बात जानना भी कोई मुश्किल काम नहीं है. हमारी प्राचीन ध्यान विधियों में इसका भी ज़िक्र है लेकिन जब मैं किसी मामूली बात की जानकारी केवल पूछकर हासिल कर सकती हूँ, उसके लिए इतना अधिक परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं समझती. हालांकि बाद में ये भी हुआ कि दोबारा उन व्यक्तियों से मेरे पूछने से पहले ही वो जानकारीयां मुझ तक स्वत: ही आ गईं. कुछ बातें स्वप्न रूप में, कुछ जागृत अवस्था में “vision” के रूप में कुछ सुगंध और संकेतों की भाषा के रूप में.

और जब कभी ऐसे संकेत आप तक पहुँचते हैं, उसे पूरे अस्तित्व के साथ और अहोभाव के साथ स्वीकार कीजिये, उसके प्रति ऐसे कृतज्ञ हो जाइए जैसे आप इसी खजाने के तलाश में जीवन भर भटक रहे थे, और अस्तित्व ने उसे आप तक पहुंचाकर अपने जादुई स्वरूप के दर्शन करा दिए.

अपनी छोटी से छोटी कामना की पूर्ति पर पूरी तरह कृतज्ञ हो जाइए, होना है, केवल दिखाना नहीं है. ध्यान रहे जब तक अपना पूरा-पूरा समर्पण नहीं करेंगे जादू नज़र नहीं आएगा.
इसका प्रयोग आप छोटी से छोटी बात से शुरू कर सकते हैं, चाहे स्त्रियों की सुन्दर काया, चमकती त्वचा और परिजनों से प्रेम की कामना हो या पुरुषों को अच्छी नौकरी, पैसा, प्रेम और सर पर दोबारा बाल उग जाने की कामना हो.

पहली बार जैसे ही जादू घटित होता दिखाई पड़ेगा आप उसकी जादुई दुनिया में उपस्थिति दर्ज करवा देंगे. यहाँ जादुई दुनिया में प्रवेश नहीं कहूंगी क्योंकि उसमें तो आप पहले से ही है लेकिन बस ये जादू उसी को दिखाई देगा जो इस जादू पर विश्वास करेगा.

कामना, कृतज्ञता और जादू – 1 : पश्चिम तुम्हें देख अचंभित है, तुम कब झांकोगे अपने मन में पूरब वालों!!

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