गोरी चमड़ी पर दाग दिखते हैं, काले-भूरों पर तो ख़ून भी खो जाता है

आज के लास वेगस की शूटिंग में 53 मरे, 200 से ज्यादा घायल हैं. ये लोन वूल्फ अटैक था. यानि कि इसे एक व्यक्ति ने अकेले अंजाम दिया. इससे पहले मई में मैन्चेस्टर में सलमान अबेदी ने आत्मघाती में क़रीब 25 लोगों की जान ले ली. बहुत घायल हुए. उससे कुछ ही समय पूर्व लंदन के संसद के पास ख़ालिद मसूद नामक आतंकी ने कार से चार लोगों को रौंद कर मार दिया. इस हादसे में 50 लोग घायल भी हुए. ख़ालिद ने एक पुलिस अफ़सर को चाकुओं से गोदा भी. ये सब बातें महज़ 82 सेकेंड में हुई और आतंकी मार दिया गया.

ऐसा ही एक आतंकी हमला, कहीं बड़े स्तर पर, भारत के संसद भवन पर 2001 में हुआ था जिसमें आरडीएक्स से लदी एक पूरी कार से संसद को तबाह करने का मंसूबा था. हलाँकि दिल्ली पुलिस और संसद सुरक्षा के लिए कार्यरत जवानों ने इसे विफल कर दिया. इसमें पाँच आतंकियों समेत, दिल्ली पुलिस के छः जवान, संसद सुरक्षा गार्ड के दो जवान और एक माली की मृत्यु हो गई. 22 लोग घायल हुए. और मुंबई आतंकी हमला कौन भूल सकता है!

लेकिन आज जितनी चिंता वेगस वाले हादसे पर जताई जा रही है, उतनी चिंता अगर भारत के बार-बार पाकिस्तानी आतंकवाद पर बोलने पर जताई जाती तो वैश्विक आतंकवाद की स्थिति इतनी विकृत ना होती. आप अगर इन्टरनेट के ज़रिए खोजने बैठेंगे तो लगेगा कि सिर्फ यूरोप और अमेरिका ही आतंकवाद से आहत है, भारत की स्थिति को लम्बे समय तक इन देशों ने ‘बायलेटरल कॉन्फ्लिक्ट’ कहकर नकारा है.

फेसबुक के ज़माने में संवेदनाएँ प्रकट करने की सबसे बेहतर तकनीक प्रोफ़ाइल पिक्चर पर फ़िल्टर लगाने के रूप में आई. ये तब हुआ था जब फ़्रांस में नवंबर 2015 में आतंकी हमला हुआ था. उसके बाद ये कुछ दिन तक चला, लेकिन अब गायब हो गया है. ये फ़िल्टर भारत में हो रही लगातार आतंकी हत्याओं में कभी नहीं दिखा. ये फ़िल्टर बोको हराम द्वारा किए जा रहे नृशंस हमलों और हज़ारों मौतों पर नहीं दिखा. ये इटली के लिए दिखा, फ़्रांसीसी के लिए दिखा.

ये मैं क्यों बता रहा हूँ? ये इसलिए बता रहा हूँ कि हम अभी भी तीसरी दुनिया ही हैं जिन्हें अभी भी दुनिया के तीसरे दर्जे का नागरिक ही माना जाता है. आतंकी हमलों में तो सबको, पूरी दुनिया को साथ आना चाहिए. इनके मीडिया संस्थानों को अपने शब्द चुनते वक़्त भौगोलिक सीमाएँ और नाम नहीं देखने चाहिए. लेकिन क्या ऐसा होता है?

जी नहीं. गूगल में जब आप ‘टैरर अटैक’ टाइप करेंगे तो सबसे पहला सजेशन 9/11 का आता है मानो उससे पहले कोई घटना हुई ही ना हो! फिर अगर आप विकिपीडिया पर ‘टेरर अटैक इन …’ करके देशों के नाम देकर खोजेंगे तो आपको हर यूरोपी देश के लिए लगभग 1800 से लेकर आजतक के हर हमले की जानकारी मिल जाएगी. वही हाल अमेरिका का भी है. लेकिन भारत के नाम आपको ये आँकड़ें 1970 के बाद से मिलेंगे. और उसमें भी अगर आपको हमलों के नाम और बाक़ी जानकारी चाहिए तो 1984 के बाद से आँकड़े मिलेंगे.

जब बात आँकड़ों की हो ही रही है तो भारत में 1970 के बाद से 2015 तक कुल 9,982 आतंकी घटनाओं में 18,842 मौतें हुईं, 28,814 लोग घायल हुए. अगर 1984 से 2016 तक के आँकड़ें लें तो क़रीब 80 आतंकी हमलों में 1985 मौतें हुईं, और लगभग 6000 से ज़्यादा घायल हुए. अगर और क़रीब के दिनों को लें, तो 2005 से अब तक हुए आतंकी हमलों में 707, मौतें हुईं, और 3200 के क़रीब घायल हुए हैं.

अब आईए यूरोप पर जहाँ, तुर्की और रूस को छोड़कर, आतंकी हमलों में 2004 से अब तक 615 मौतें हुईं और 4000 के लगभग लोग घायल हुए. अमेरिका में 2000 से अबतक क़रीब 3188 मौतें हुईं जिसमें से 2996 लोग सिर्फ 9/11 वाले हमले में मारे गए. यानि, बाक़ी के हमलों में 192 लोग मरे. अमेरिका के लगभग 90% से ज़्यादा हमलों में ईकाई अंकों में मौतें हुई हैं. यूरोप में आतंकी हमले भी 2004 के बाद से ही शुरू माने जा सकते हैं, क्योंकि उससे पहले वो वैश्विक आतंकवाद से पीड़ित नहीं दिखते.

आज जब यूरोप या अमेरिका के किसी हवाई अड्डे पर पटाखे की भी आवाज़ आती है तो हर चैनल, हर वेबसाइट, हर सोशल मीडिया पर, जिसमें भारत के संस्थान भी शामिल हैं, उसे अपनी पहली ख़बर बनाकर कवरेज करते हैं. लेकिन स्वयं भारत, बांग्लादेश, अफ़्रीका आदि में हो रही मौतों को उतनी तरजीह नहीं दी जाती.

इस्लामिक स्टेट और तालिबान के कट्टर अजेण्डे के कारण यूरोप को आतंक का दंश बार-बार झेलना पड़ रहा है. ‘लोन वूल्फ’ अटैक के ख़तरे से नीस, ब्रुसेल्स, पेरिस, ओरलैंडो, डैलस, ऑस्ट्रेलिया आदि हर आए दिन जूझता दिखता है. अगर अमेरिकन लोन वूल्फ अटैक टेरर डेटाबेस की मानें तो 2000 से अबतक क़रीब 58 हमले अकेले आतंकियों ने अंजाम दिए और इसमें 169 जानें गईं और 258 घायल हुए. ये सारे हमले यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसी जगहों पर हुए.

भारत आतंकी हमलों का शिकार अपनी आज़ादी के समय से ही होता रहा है. सीमा पार से आतंकियों ने हमेशा भारतीय जानें ली हैं. लेकिन यूरोपीय या अमेरिकी मीडिया, और राष्ट्राध्यक्षों ने भी, भारत की इस परेशानी को कभी भी आतंकवाद से जोड़कर नहीं देखना चाहा. इसे वो हमेशा ‘कॉन्फ्लिक्ट’ कहकर बचते रहे क्योंकि उनके लिए ये दो देशों के आपस की बात थी.

सरोजिनी नगर ब्लास्ट हों, मुंबई ट्रेन हमले हों, अजमेर शरीफ़ ब्लास्ट हो, या फिर तमाम आतंकी वारदातें जिसमें दसियों लोग मारे गए, इन सबको पश्चिमी मीडिया और देशों ने ‘झगड़ा कहकर नकार दिया. लेकिन आज वही आतंकवाद उनके घरों पर दस्तक ही नहीं दे रहा, बल्कि हर दूसरे महीने उनके नागरिकों की हत्याएँ कर रहा है तब वो बिलबिलाते नज़र आते हैं.

आज इस्लामिक स्टेट लगभग हर हमले में अपनी ज़िम्मेदारी लेता है और सुनियोजित तरीक़े से या फिर लोन वूल्फ अटैक से, इन देशों को निशाना बनाता रहता है. अगर ये देश, अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर, दूसरे देशों में आतंकी समूहों को, अपने विरोधियों की सरकारों को कमज़ोर करने के लिए, इस्तेमाल करते रहेंगे तो एक दिन यही आतंक इनके घरों में बड़ी-बड़ी तबाहियाँ मचाएगा. आज भारत इन्हें पाकिस्तान को, जो कि आतंकवाद की फैक्ट्री है, आतंकी देश कहने में राजनयिक परेशानी हो रही है.

लेकिन जब इसी फ़ैक्टरी के उत्पाद किसी शार्ली एब्दो के दफ़्तर में, किसी मैड्रिड की ट्रेन में, किसी लंदन के ट्यूब में, किसी नीस के ट्रक में, किसी ऑस्ट्रेलियाई कॉफ़ी हाउस में, किसी ओरलैंडो गे-बार आदि में अपनी पहचान से उन्हें रूबरू कराएँगे तो शायद इन्हें भी भारत का दुःख समझ में आएगा.

भारत तब भी उनके साथ खड़ा था और संयुक्त राष्ट्र संघ में आतंकवाद को मुद्दा बनाकर बोलता रहा, और भारत आज भी उनके साथ खड़ा है जब वो इस कैंसर से जूझ रहे हैं. ज़रूरत है कि पूरा विश्व एकजुट होकर, बिना स्वार्थ देखे कि किस देश की मदद से उसे क्या मिलेगा, आतंक की जड़ पर धावा बोले, तभी इस बीमारी का ख़ात्मा होगा. वरना, हम सब एक ही नाव पर सवार हैं, पानी जब तक नहीं भरता हम सुरक्षित हैं. लेकिन पानी हर दिन बढ़ता जा रहा है, और सिर्फ हाथ से पानी बाहर फेंकने से समस्या ख़त्म नहीं होने वाली.

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