कहानी गाँधी के आज़ादी आंदोलन की शुरुआत की

हमारे देश में बहुत से महान लोगों ने जन्म लिया. मोहनदास गाँधी भी बहुत महान इंसान थे. उन्होंने आजादी दिलाई. चरखा काता. उन्हें प्रणाम.

गाँधी के सबसे महान नेता यानी महात्मा हो जाने से पहले लोकमान्य तिलक सबसे बड़े नेता थे. 1920 में उनका निधन हो गया. फिर गाँधी सत्तासीन हुए. पुराने नेता को श्रद्धांजलि देने की रीत भी निभानी थी.

तिलक जी का नारा था स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है. गाँधी ने तिलक जी की इच्छा पूर्ण करने की कसम खायी. उन्होंने देश से कहा कि हमें स्वराज प्राप्त करना है. लेकिन स्वराज पाने के लिए उन्होंने कुछ शर्ते रखी.

उसमें पहली शर्त थी पूरे देश को 9 महीनों के अंदर एक करोड़ रुपया जमा करना था. गाँधी ने तिलक स्वराज फंड की स्थापना की. जिसका घोषित उद्देश्य स्वराज की प्राप्ति था.

गाँधी ने स्पष्ट सन्देश दिया, उन्होंने अपने अख़बार यंग इंडिया में लिखा “जो देश अपने स्वराज के लिए एक करोड़ रुपया जमा नहीं कर सकता उसे स्वराज मांगने का कोई अधिकार नहीं है.”

तिलक स्वराज मेमोरियल फंड में कलेक्ट हुए पैसो का उपयोग शिक्षा, चरखा कातने में किया जाना था. वैकल्पिक न्यायालय बनाने में किया जाना था.

गाँधी ने देशवासियों से अपील की कि वो अपने मुकदमें अंग्रेजों की अदालत में न ले जाएँ, वकीलों से अदालतों का बहिष्कार करने को कहा गया. विद्यार्थियों से स्कूल कॉलेज छोड़ने का.

गाँधी ने 21 राज्यों में प्रत्येक से 5 लाख रूपये जमा करने को कहा. ये छूट उन्होंने जरूर दी कि छोटे राज्यों से पैसा कम आएगा जिसकी भरपाई, बंगाल, महाराष्ट्र, बॉम्बे पंजाब जैसे बड़े राज्य करेंगे.

एक करोड़ की रकम… आज से सौ साल पहले… कल्पना कीजिये… आज के समय उस 1 करोड़ की क्या वैल्यू होगी… सौ करोड़, हजार करोड़, दस हजार करोड़, लाख करोड़.

आज के हिसाब से ये कितना पैसा होता? ध्यान रखियेगा, आज देश लाख करोड़ भी जरूरत पड़ने पर जमा करके दे देगा. लेकिन 1920 में लोगों के तन पर कपड़े नहीं होते थे. जमा पूँजी नहीं थी. मध्यम वर्ग नहीं था, कुछेक धनी अमीर थे, तो लगभग सभी नंगे, गरीब.

लेकिन उन्ही गरीब लोगों ने स्वराज के लिए, आज़ादी पाने के लिए, अपने सपनों को पाने के लिए एक करोड़ जमा किये. बल्कि लोगों ने गाँधी को एक करोड़ से कहीं ज्यादा दिया.

पूर्वांचल, जो देश के सबसे निर्धन इलाकों में तब भी था, आज भी है. गोरखपुर, बलिया, बनारस इन इलाकों ने अकेले 20 लाख रूपये दिए थे.

ये पैसा कैश नहीं था. उन गरीबों के पास नकद कहाँ था. महिलाओं ने अपने शरीर पर पड़े जेवर दिए, लोगों ने बर्तन दे दिए. जो कुछ हो सकता था दिया, ताकि स्वराज आ सके.

बॉम्बे, आज का मुंबई, उस एक शहर ने 37 लाख रूपये दिए. जिनमें 3 लाख गोदरेज कंपनी के मालिक गोदरेज साहब ने दिए. उन्होंने ये तीन लाख स्पेशल पर्पज़ के लिए दिए.

3 लाख जो आज शायद 300 करोड़ से ज्यादा ही होते, गोदरेज ने अछूत कल्याण, छुआछूत हटाने के लिए दिए.

किशोरों ने स्कूल छोड़े, वकीलों ने अदालत. सभी के मन में नए सपने थे.

लोगों को उम्मीद थी गाँधी, जिन्होंने हिन्द स्वराज पुस्तक लिखी है, अर्थव्यवस्था का एक समानांतर मॉडल दिया है, वो उसे पूरा करेंगे.

फिर गाँधी ने आंदोलन की शुरुआत की. खिलाफत आंदोलन के साथ असहयोग आंदोलन. जो एक साल में वापस हो गया. चौरी चौरा कांड के बाद गाँधी ने इसे वापस लेने के लिए खुद अनशन किया.

जमा हुए एक करोड़ रूपये से कुछेक विद्यालय जरूर खुले. लेकिन अधिकांश पैसों का उपयोग आगे चलकर कांग्रेस के प्रचार में हुआ. कांग्रेस ने इसके बाद पेड वर्कर रखने शुरू किये. चुनाव लड़े गए.

गाँधी पर फंड के मिस-मैनेजमेंट के आरोप लगे. जिसे गाँधी ने अपने ऊपर आरोप माना. और नाराजगी प्रकट की.

स्वयं मोतीलाल नेहरू ने अपने बेटे को चिट्ठी लिख कर कहा “तुम अपने पैसों को अपने घर के अख़बार इंडिपेंडेंट में लगाओ. I see people doing all sorts of fantastic things under cover of this fund”.

आप मोतीलाल नेहरू के सुपुत्र को अच्छे से जानते होंगे, छोटे नेहरू ने फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के समय बांड लिए थे जिसे वो तिलक स्वराज फंड में दान कर रहे थे.

जनता द्वारा हिसाब मांगने पर कांग्रेस कमेटियों ने चोरी की रिपोर्टे दर्ज करा दी. कहीं पैसा चोरी हुआ, कहीं हिसाब की किताबें.

अंत में 1924 में गाँधी ने तमाम आरोपों को झुठलाने के लिए डिटेल्ड फाइनेंशियल रिपोर्ट पब्लिश की. जिसमें पता चला कि अधिकांश फंड अभी तक खर्च नहीं किया गया है. गोदरेज जी से प्राप्त 3 लाख में महज 46 हजार अछूत उद्धार में खर्च हुए.

इसी बात को लेकर बाबा साहेब आंबेडकर ने महात्मा गाँधी पर एक समय दलित कल्याण के लिए मिले पैसों के गबन का आरोप लगाया था.

तो ये कहानी थी गाँधी के आज़ादी आंदोलन की शुरुआत की.

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.

रघुपति राघव राजा राम

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