गांधी के सफल होने का रहस्य क्या है?

इस प्रश्न के उत्तर में एक प्रतिप्रश्न रखूँगा कि नेताजी या सावरकर के असफल होने का रहस्य क्या है? जहां तक बात समझ में आती है, नेताजी या सावरकर का अनुसरण सब के बस की बात नहीं थी. इसलिए नेताजी गुमनाम मरे, सावरकर हाशिये पर चले गए. देश की जनता एक ही थी और वे हमारे बाप-दादा ही थे.

आज गांधी को जितनी लताड़ हम लगा रहे हैं उतनी अगर हमारे बाप दादाओं ने लगाई होती तो परिणाम कुछ अलग होते. जितने लोग गांधी के अनुयायी बने उतने वाकई सावरकर या नेताजी के पीछे होते तो बात कुछ अलग होती.

गांधी के पीछे जनता थी क्योंकि उनका अनुसरण करना तुलना में आसान था. गांधी की राह पर ना सावरकर की यातनाएँ थी और ना नेताजी के कष्ट. गांधी के अनुयायी भी जेल हो आए लेकिन अंदमान नहीं. उन्होने भी मार खाई पुलिस की लेकिन साथियों के नाम पते उगलवाने वाली यातनाएँ नहीं सही. जिन्होने यातनाएँ सही वे गांधी के अनुयायी नहीं थे.

अगर निष्पक्षता से देखें तो गांधी हमेशा देखते रहे कि जनता पीछे आ रही है या नहीं. अपने उपोषणों से उसका टेस्टिंग कराते रहे. उनमें marketing और communication का सेंस गज़ब का था. जनता कहाँ तक साथ देगी यह उन्हें पता था इसलिए उन्होने कभी भी ऐसा रिस्क नहीं लिया जहां –

(1) उनके कहने से जनता सशस्त्र विद्रोह करे, मारकाट मचे लेकिन फेल हो और उसका दोष उन पर आए, और

(2) जनता उनका कहना न माने, दुबकी रहे और उनकी जगहँसाई हो जिससे वे हाशिये पर चले जाएँ.

हो सकता है मोपला कांड के बाद उन्हें दूसरे पर्याय की संभावना अधिक बलवती लगने लगी थी. युद्ध लड़ तो रहे थे गांधी, चारा नहीं था लेकिन वे warlord temperament के व्यक्ति नहीं थे. ना वे ऐसे रणवीर थे कि जिसके कहने पर वीरों की सेना खुशी से आत्महुति दे और ना ही जनता भी कोई ऐसे वीरों से ओतप्रोत थी – अन्यथा सावरकर और नेताजी को समर्थन न मिलता? गांधी समझ चुके थे कि उनका म्यान भले चार फीट का हो, उनको कोई शमशीर नहीं दी गयी, छह इंच की कटार ही मिली है. म्यान के दिखावे से जितना हो पाता, उतना वे लड़े.

समाज जैसे जैसे जितना स्थिर होता जाता है, उससे कुछ अधिक ही यथास्थितिवादी होता जाता है. अंग्रेजों ने हिंदुस्तान को स्थैर्य दिया, उस स्थैर्य के साथ उसका हाथ पकड़कर यथास्थितिवाद भी चला आया. गांधी के अनुयायियों को भी घर से ताने मिलते कि बिगड़ रहे हो, गांधी तेरी जिंदगी नहीं बनाने वाला, शिक्षा पूरी करो, सरकारी नौकरी करो. ये चरखे से अंग्रेज़ नहीं जाने वाला, तुम्हें नौकरी नहीं मिली तो भीख मांगनी पड़ेगी, बुढ़ापे में हमारी जान भी अटकी रहेगी, गति नहीं पा सकेंगे तुम्हारे कारण.

यह बिलकुल हो सकता है कि अपनी सेना का अंदाज़ होने के कारण गांधी हमेशा झुकते रहे. मुसलमानों द्वारा उनका इस्तेमाल किया गया और ये केवल हिंदुओं पर दबाव डालते रहे. लेकिन क्या इसमें पूरा दोष उनका है? क्यों किसी की उनके विरोध में विद्रोह कर उठने की हिम्मत नहीं हुई कि आप के इन निर्णयों से आप अपने अनुयायियों के साथ साथ इस देश की इतर जनता को भी हिंसा भोगने के लिए अभिशप्त कर रहे हैं?

और कुछ आत्ममंथन भी आवश्यक है. हिन्दू भी भेड़-बकरियाँ बनते गए तो चरवाहे और कसाई को कहाँ तक दोष दें? भेड़-बकरियाँ पैदा ही होती हैं कटने के लिए. कश्मीर में कौन से गांधी थे कि सामूहिक पलायन हुआ? आज भी शस्त्रसज्जता की बात पर बिदकते क्यों हैं लोग? क्या चार शतकों में हमारा ही खून पानी नहीं होता गया है? नेताओं को कहाँ तक दोष देते रहेंगे हम?

यथास्थितिवाद सब से बड़ा संकट है, उसे पहचाने. उसका स्वांग जिंदा रखकर पूरा समाज नष्ट किया जा सकता है, क्योंकि जो जिंदा है वो खुश है कि वो जिंदा है. वो यह नहीं समझता कि वो दिन ब दिन अकेला हो रहा है, जो उसका साथ दे सकते थे, गायब हुए जा रहे हैं. वो यह समझना ही नहीं चाहता कि एक दिन उसकी भी बारी आएगी.

एक यथास्थितिवादी समाज था गांधी की सफलता का रहस्य. और ऐसे यथास्थितिवादी समाज हमेशा गांधी ही चुनेगा, शायद इसीलिए माता रोम की हिम्मत बढ़ी कि इस देश की आत्ममग्न, आत्ममुग्ध हिन्दू जनता राहुल को भी चुन लेगी, क्योंकि आखिर वो भी तो गांधी है.

अंत में इतना ही कहना है कि आप ने आज फेसबुक पर मेरी टाइमलाइन देखी हो तो पता चल गया होगा कि मैं गांधी भक्त नहीं हूँ और यह पोस्ट किसी भी हिसाब से गांधी का महिमामंडन नहीं है.

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