एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों, छेद कैसे नहीं होगा आसमान में

Ajit Singh With Wife Monica Singh

लीक पे चलना बहुत आसान होता है. अपने लिए नया रास्ता बनाना बहुत मुश्किल. बहुत कांटे होते हैं नए रास्ते पर, ऊबड़ खाबड़ होता है. पर दुनिया का हर रास्ता जिस पर आज सब चले जा रहे हैं एक दिन नया ही था. कोई था जो उस पर पहली बार चला था. शेर अपना रास्ता खुद ही बनाते हैं.

मेरी पत्नी एक स्कूल की प्रिंसिपल है. स्कूल आजकल शिक्षा की दुकान बन चुके हैं जहां बच्चे को सिर्फ exam में ज़्यादा से ज्यादा नंबर लेना सिखाया जाता है. सवाल रटा दो और बच्चे को सिखा दो कि वहाँ answer sheet पर बढ़िया से vomit कर दे …….. बस यही शिक्षा है. सवाल का जवाब सिर्फ वही लिखना है जो मैडम ने लिखाया रटाया है. क्या मजाल कि बच्चा अपने मन से, अपनी कल्पना से खुद को express करे. मैडम काट के zero दे देती है. खबरदार जो अपना दिमाग लगाया.

पर अपनी मैडम जी ज़रा हट के हैं. national champion रहीं हैं weight lifting की. BA में थीं तो भूल गयी कि exam भी है. फिर याद आया तो भागी. वहाँ यही नहीं पता था कि subjects क्या क्या हैं. खैर किसी तरह college के अन्य छात्रों और प्राध्यापकों के सम्मिलित सामूहिक प्रयास से 33% अंक ले कर BA में शानदार सफलता प्राप्त की.

बाद में करेला नीम पे चढ़ गया. मुझ जैसे निखट्टू से ब्याह रचा के पहुँच गयी माहपुर, जिला गाजीपुर, उत्तर प्रदेश. वहाँ पेड़ के नीचे बैठा के गाँव के बच्चों को पढ़ाया 20 बरस. वहीं पढ़ते पढ़ाते ही टीचर बन गयी. पर चूँकि वो स्कूल कुछ अलग किस्म का था तो शिक्षा, सचमुच की शिक्षा को समझने का मौक़ा मिला. वो स्कूल शिक्षा की दुकान नहीं था. कोई व्यापारिक दबाव भी न था. न किसी के प्रति कोई जवाबदेही. स्वयं ही कर कर के सीखना था और कुछ नया करने की आजादी थी. गाँव के बच्चों के साथ लम्बे समय तक काम करने का अनुभव बहुत कुछ सिखा गया. जो सीखा पढ़ा के ही सीखा.

अब यहाँ तो शिक्षा का शोरूम हैं. दुकानों के दिन लद गए, अब तो शोरूम हैं. पर लीक से हट के नया करने की ललक अब भी है. और चूंकि वास्तविक शिक्षा और शिक्षा में personality development का महत्व देखा समझा है इसलिए काम करने का तरीका भी अलग है. और sports किस तरह व्यक्तित्व को तराश निखार देती है ये भी देखा है. सो लीक से अलग हट के स्कूल में sports पे ध्यान दिया है. पर कहना बहुत आसान होता है. आज के स्कूल में sports के लिए समय निकाला ही नहीं जा सकता क्योंकि पूरा जोर तो rote education पे है.

9 subjects हैं, 8 पीरियड हैं, syllabus हर हालत में पूरा होना ही चाहिए वरना आजकल के parents सिर पे चढ़ जाते हैं, कॉपी काली करने पे ही पूरा जोर है. ऐसे में sports कब हो? सो बच्चों ने स्वयं ही निर्णय लिया, सुबह जल्दी आयेंगे …….. 6.30 बजे ……कैसे आयेंगे ……स्कूल बस तो 8 बजे आती है …….. कुछ अपने से आने लगे कुछ के parents छोड़ते हैं ……. track सूट पहन के आते हैं ……. स्कूल यूनिफार्म अलग से लिफ़ाफ़े में …… साथ में दूध की बोतल और दिन भर के लिए भोजन.

इसके लिए माँ सुबह 5 बजे उठ के बना के देगी खाना? निगरानी कौन करेगा? sports टीचर सुबह 6.30 पे आयेगा ……. फिर वो यहाँ सारा दिन क्या खायेगा? लड़कों के साथ लडकियां भी हैं …….उनकी सुरक्षा? निगरानी? इतने बड़े स्कूल में कौन करेगा निगरानी? कौन लेगा जिम्मेवारी? कल कोई ऊक चूक हो गयी तो? तो प्रिंसिपल साहिबा जिनका आवास सौभाग्य से स्कूल परिसर में ही है, वो सुबह 6.30 पे हाजिर ……. जो बच्चा सुबह 5.30 पे घर से चला और शाम 4 बजे घर पहुंचेगा, और वो जिसने सुबह दो घंटे पसीना बहाया है वो सारा दिन खायेगा क्या?

sports क्या पानी पी के होगी? सो पेरेंट्स सुबह जो भोजन और दूध दे के जाते हैं उन्हें एक आंटी दिन में गरम कर के बच्चों को परोसेगी …..इसके लिए स्कूल में एक pantry चाहिए ….और एक आंटी …….. पश्चिम के विकसित देशों में तो स्कूल में एक भरी पूरी pantry होती है जहां बच्चों को भरपेट भोजन मिलता है स्कूल की तरफ से ……पर यहाँ वो व्यवस्था कहाँ? अलग से करनी पड़ती है …….. कौन लेगा इतनी मुसीबत मोल? इतना झंझट? ऊपर से निगरानी? सावधानी हटी दुर्घटना घटी और प्रिंसिपल मैडम जेल में? हटाओ साले को …..बंद करो …….. हमको क्या ज़रुरत है? हम क्यों ले मुफ्त का बवाल अपने सिर पे? 4 लाइन का answer रटाओ, exam लो, report कार्ड में excellent लिखो ……..हो गयी पढाई?

पर हमारा शेर बच्चा हार मानने को तैयार नहीं है. जुट जाता है सुबह 6 बजे ही… कहता है कि नहीं, sports के बिना अच्छा स्कूल नहीं चलाया जा सकता…

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों, छेद कैसे नहीं होगा आसमान में.

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