गोडसे और गांधी दोनों मेरे हैं क्योंकि मैं हिन्दू हूँ

हम कई बार इतिहास को महज इसलिए बंद नज़रिये से पढ़ते हैं या देखते हैं कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे. गांधी-गोडसे प्रकरण भी इतिहास की ऐसी ही त्रासदी है. हममें से अधिकांश ऐसे हैं जो गांधी-गोडसे प्रकरण के सामने आते ही निरुत्तर, असहज, शर्मिंदा और मौन हो जाते हैं परन्तु क्या इतिहास और तथ्यों को सिर्फ इसलिए झुठला दिया जाए कि ये हमारी छवि के खिलाफ जायेगी? हमें सांप्रदायिक बना देगी?

क्या उस वक़्त गोडसे ही अकेले थे जो गांधी को पसंद नहीं करते थे? इतिहास तो ऐसा नहीं कहता. उस वक़्त के कांग्रेस का हर राष्ट्रवादी नेता चाहता था कि अब अप्रासंगिक हो चुके गांधी अलग और मौन रहें, यही बेहतर है.

पटेल से नेहरु तक की मंशायें ऐसी ही थी, पाकिस्तान से लूट-पिट कर आने वाला हर हिन्दू और सिख गांधी के लिए बद्दुआ ही निकाल रहा था. बाकी लोग बस बापू के मौत की कामना ही करते रह गए और गोडसे ने पहल कर दी, एक गलती कर दी, अपनी भावनाओं पर नियंत्रण न रख सके और बापू की हत्या कर दी, जो निंदनीय हैं.

पर सवाल ये भी है कि क्या गोडसे को सिर्फ “गांधी के हत्यारे” की संज्ञा देकर इतिश्री कर ली जाए? उन वजहों की तफ्सीश न की जाए जिसने गोडसे को इस कृत्य पर उकसाया? अदालत में गोडसे के द्वारा दिए अकाट्य तर्कों को भी भुला दिया जाए?

क्या ये भी भूल जाया जाये कि गोडसे ने न्यायालय में अपने कृत्य का जो स्पष्टीकरण दिया उससे प्रभावित होकर न्यायधीश श्री जे. डी. खोसला ने अपनी एक पुस्तक में लिखा था –

“नाथूराम का अभिभाषण दर्शकों के लिए एक आकर्षक दृश्य था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ कि लोगों की आहें और सिसकियाँ सुनने में आती थीं और उनके गीले नेत्र और गिरने वाले आँसू दृष्टिगोचर होते थे। न्यायालय में उपस्थित उन मौजूद आम लोगों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि उन्होंने अधिकाधिक सँख्या में यह घोषित किया होता कि नाथूराम निर्दोष है।”

क्या इस बात पर भी चर्चा न हो कि गांधी के एक निरर्थक अनशन का विरोध गोडसे ने क्यों किया था?

कहते हैं जब इंसान का अंतिम वक़्त करीब हो तो उसकी हार्दिक आकांक्षा उसके मुख से अभिव्यक्त होती है, गांधी ने अंतिम वक़्त में कथित तौर पर राम का नाम लिया जो मोक्ष कारक माना जाता है यानि बापू की आकांक्षा मोक्ष प्राप्त करने की थी जबकि गोडसे फांसी के फंदे पर झूलते वक़्त भारत माता की स्तुति ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि’ गा रहे थे!

गांधी ने अपनी वसीयत नेहरुओं के लिए छोड़ी तो गोडसे ने कहा कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे जीवन बीमा से इतने पैसे सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए दिए जाएं. गांधी ने जहाँ अपने मानस पुत्र के लिए भारत माँ का विभाजन मान लिया वहीँ गोडसे की आत्मा आज भी अपने अस्थियों के विसर्जन के लिए भारत के अखंड होने और पवित्र सिन्धु नदी के पूरी तरह भारत भू से बहने की प्रतीक्षा कर रही है.

भारत भूमि के विभाजन के प्रतिस्वरूप हुए व्यापक हिन्दू संहार, हिन्दू ललनाओं के वैधव्य और लूटी गई हिन्दू अस्मिता ने गोडसे को व्यथित कर दिया था पर बापू की आत्मा तो हिन्दू संहार पर नहीं रोई और न ही उनके विस्थापन पर कुछ किया.

अगर गांधी के चरित्र और महानता का आकलन उनके दागदार किरदारों को छोड़कर किया जाता है तो गोडसे के किरदार में गांधी वध के अलावा और कौन सा दाग था? गोडसे का भी सम्रग मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाए? ये क्यों न देखा जाए कि गोडसे नाम का वह युवा एक विचारक, पत्रकार एवं सच्चा राष्ट्रभक्त भी था, समाज सुधारक भी था. उन्होंने ऐसे कई सहभोज कार्यक्रमों का आयोजन करवाया था जिसमें समाज के हर तबके के लोग आते थे.

आप पूछेंगे गांधी और गोडसे के बारे में मेरी राय क्या है? गांधी सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ हिन्दू भले ही हों पर राजनीतिक रूप से हिन्दू और आज़ाद हिन्दुस्तान के शत्रु थे. भारत की आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व गांधी ने भी किया पर आज़ाद भारत और हिन्दू समाज को क्लीव बना कर घुटने पर लाने वाले गांधी ही थे.

उधर वध करने के अधिकारी न होते हुये भी गांधी की हत्या करने वाले गोडसे सांस्कृतिक रूप से भले ही श्रेष्ठता के मानदंडों पर खरे न उतरते हों पर राजनीतिक रूप से हिन्दुओं के सबसे बड़े मित्र थे.

यही मेरी दृष्टि है, मेरा हिन्दू मानस इस सोच के साथ दोनों का मूल्यांकन करता है.

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