खिचड़ी के तरीके से बिरयानी नहीं बनती : गांधीजी से इतना तो सीखा ही जा सकता है

एक रोज रसोई में जाकर हमने चावल धोये, प्याज काटे और भुना, आलू उबाल-छील कर तैयार कर लिए. फिर एक कुकर चढ़ा कर हमें उसमें तेल, मसाले और प्याज भुना. इतने में पहले से काटकर तैयार किया मुर्गा भी धो लिया था. उसे चावल के साथ कुकर में बंद किया और सीटी लगा दी. अफ़सोस कि जो बनकर तैयार हुआ वो कुछ खिचड़ी जैसी बेकार सी चीज़ थी. बिरयानी बनी ही नहीं!

ये तरीका हमने मुर्गे के बदले, सब्जियां, पनीर वगैरह डाल कर भी कई बार दोहराया और हर बार खिचड़ी ही बनी, नॉन-वेज या वेज किसी किस्म की बिरयानी नहीं बन पाती थी. ईश्वर की असीम अनुकम्पा से लोगों की नजर मेरी इस हरकत पर पड़ गई. फिर कुछ ने तमीज़ से, और कुछ ने बेबाकी से समझाया कि गधे ! अगर हर बार एक ही तरीका इस्तेमाल करोगे तो नतीजे अलग अलग कैसे आ सकते हैं? खिचड़ी के तरीके से बनाओगे खिचड़ी बनेगी, उसी को बदलो तो तहरी जैसी चीज़ बनेगी, तरीका और बदलो तो बिरयानी भी बनेगी.

नतीजे अलग चाहिए तो काम के तरीके बदलने पड़ते हैं. ये चीज़ काफी पहले भारत के राष्ट्रवादियों को समझ में नहीं आ रही थी. या कह लीजिये, समझ तो रहे थे, मगर सार्वजनिक तौर पर मान लेने में मान जाता रहता. कई साल बाद विदेशों से भारत लौटे एक भूतपूर्व और कम कामयाब वकील को ये बात पता थी. उन्होंने लड़ाई का तरीका बदल दिया. गाँधी को पता था कि आम भारतीय स्पष्ट प्रतिरोध, या टकराव की स्थिति से परहेज रखता है. सम्मुख युद्ध के बदले, सविनय अवज्ञा का तरीका इस्तेमाल होते ही नतीजे भी बदले हुए नजर आने लगे. कुछ तीसेक साल बाद जब स्थितियां फिर से बदली तो सुभाष चन्द्र बोस का तरीका बेहतर होने लगा. अब फिर से अलग नतीजे चाहिए थे, तो फिर से तरीके बदले भी जाने लगे.

अलग नतीजों के लिए अलग तरीके इस्तेमाल करने पड़ते हैं, ये समझाने वाले पहले नेता के तौर पर भी गाँधी को याद किया जा सकता है. समय के साथ पुरातनपंथी, अड़ियल होने, कांग्रेस से अलग होने, और फिर आजाद भारत के निर्माण में अप्रासंगिक की तरह भुलाये जाने के लिए भी याद रख सकते हैं. अस्सी के दशक में जोर शोर से वर्धा (महाराष्ट्र) को भारत का गांधीवादी जिला बनाने के लिए खूब सरकारी फण्ड निकला था. उस सौ पैसे का पंद्रह पैसा भी वर्धा पहुंचा कि नहीं पता नहीं. हाँ, लेकिन ये जरूर कहा जा सकता है कि वर्धा आज महाराष्ट्र का इकलौता शराबबंदी वाला जिला है, और उसके अलावा नाम मात्र को भी गांधी के सिद्धांतों पर आधारित इस देश में कुछ नहीं दिखता.

आज गाँधी जयंती के नाम पर कुछ लोगों की काम से छुट्टी होगी, कुछ की नहीं भी होगी, लेकिन रविवार की छुट्टी ख़त्म होते ही जब आप काम के मूड में वापस आयेंगे तो आप साल की चौथी और आखरी तिमाही में भी प्रवेश कर चुके होंगे. साल का 75% बीत चुका है, और अब सिर्फ एक ही तिमाही बची है. हो सकता है इस साल की शुरुआत आपने भी पांच किलो वजन कम करने, सिगरेट-गुटखा-तम्बाकू छोड़ने, कुछ हज़ार-लाख की बचत करने जैसे इरादों से की हो. ऐसे किसी टारगेट में कुछ कामयाब हुए हैं? सही रास्ते पर हैं, या उम्मीद से बेहतर काम किया है? वो सपने पूरे होंगे क्या?

आपकी-मेरी तरह ही दुनिया में और भी लाखों लोगों ने ऐसे ही टारगेट सेट किये होंगे. उनमें से कई शायद कभी पूरे नहीं होंगे. कुछ अगले साल फिर से नए साल की योजनाओं में शामिल भी हो जायेंगे. अगर ऐसा कुछ होता महसूस हो तो रूककर जरा एक मिनट सोचिये. कैसी योजनायें बनाई थीं? पक्का पक्का सोचा था कि पांच या सात किलो वजन कम करना है या सिर्फ वजन कम करूँगा/ करुँगी, या तला-भुना और चीनी कम जैसा कुछ अस्पष्ट सा प्लान था?

अडिग लक्ष्य थे या डांवाडोल से, आज सात से सोचना शुरू किया और फिर पांच से होते होते हफ्ता बीतते तीन पर आ गए थे? कोई योजना भी थी या सिर्फ मुंगेरीलाल के सपने थे? कोई अनुशासन, धैर्य दिखाया या भक्क यार, फिर कभी देखेंगे कहते निकलते रहे? जीतने पर तो सेहरा आपके ही सर आता, नाकामयाबी का जिम्मेदार कौन होगा, ये जवाबदेही तय की थी, या सरकारी योजना जैसा था, जिसमें पचास साल में दस कमेटियां जांच करेंगी, और फिर भी तय नहीं होगा कि जवाबदेह कौन है?

पिछली तीन तिमाहियां बीत भी गई तो कोई बात नहीं, आखरी तिमाही के लिए भी कोशिश की जा सकती है. गाँधी जयंती पर अगर आप ये याद करें कि पूरे देश को एक राजनैतिक आन्दोलन में, एक दिशा देने के लिए गाँधी ने सफलतापूर्वक किसका इस्तेमाल किया था तो आपका ध्यान आसानी से उनके हाथ में पकड़ी किताब पर चला जाएगा. दांडी मार्च में जिन नमक सत्याग्रह पर निकले लोगों को गिरफ्तार किया गया उनमें उस दौर की फिरंगी फ़ौज को भी ये कॉमन चीज़ दिख गई थी. करीब करीब सबके पास भगवद्गीता बरामद हुई थी. बम नहीं, बारूद भी नहीं, गोलियां नहीं, भगवद्गीता !

गाँधी जयंती के पास शुरू हुई तिमाही पर भगवद्गीता की याद इसलिए भी, क्योंकि उन्होंने इसपर एक बार नहीं बल्कि 1920 से 40 के बीच कई बार टीका-टिप्पणी की या लिखी थी. अगर आजादी के दौर के विचारकों का नाम आम आदमी से पूछें तो ज्यादातर लोग श्री अरबिन्दो या गाँधी का नाम ले लेंगे. लाल-बाल-पाल में से तीनों के नाम अचानक ना भी याद आयें तो लोग बाल गंगाधर तिलक कह देंगे. तिलक, अरबिन्दो, गाँधी सबमें ये समानता है कि इन्होंने भगवद्गीता पर लिखा. सावरकर जैसे, या टैगोर जैसे काफी ज्यादा लिखने वालों ने कुछ नहीं लिखा. अब भगवद्गीता पर ना लिखने के कारण ये कम प्रसिद्ध हैं, या नहीं, ये हम पक्का नहीं कह सकते. ये बस एक मामूली कोरिलेशन है, जिसे आप इग्नोर कर सकते हैं.

बहुत से लोगों ने ऐसी एक भी धार्मिक किताबें इसलिए भी नहीं पढ़ी होती क्योंकि उनका ख़याल होता है कि हाय ये तो बहुत बड़ी होती हैं. एक कोरिलेशन ये भी है कि इन सब को गाँधी पसंद भी नहीं होते. इसके पीछे गाँधी की हिंदुत्व की किताबों को पढ़ने की क्षमता होने और हिन्दुत्ववादी की क्षमता कम होने की जलन के कारण होता है कि नहीं ये भी पक्का पक्का नहीं कहा जा सकता. वैसे इसी दिन पड़ने वाले लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिन को भी करीब करीब भुला दिया जाता है. उनके नाम में जो “शास्त्री” है वो संस्कृत भाषा से स्नातक होने का द्योतक है. उन्होंने भी भगवद्गीता पर टिप्पणी नहीं लिखी थी.

कभी कभी एक बार में ही भगवद्गीता को पूरा पढने की कोशिश करने के कारण भी लोग नाकाम होते हैं. ऐसे में ये भी याद रखना चाहिए कि जब कोई गुरु सिखाता तो आपको स्कूल के किताब जैसा पेज वन से पढ़ाना नहीं शुरू करता. कहीं से भी एक श्लोक उठाकर उसका मतलब और उसके सन्दर्भ में दूसरा, फिर दूसरे वाले श्लोक के सन्दर्भ में तीसरे को दिखाते हुए उसे पूरा बताया जाता.

जैसे अगर अचानक तीसरे अध्याय का पैतींसवां श्लोक उठा लें (पर धर्मो भयावह) वाला तो उसके सन्दर्भ में आपको 18वें अध्याय में 41, 45, 48 श्लोक देखने होंगे. फिर वहां पहुँचने पर आपको वापस आकर दूसरे अध्याय में 33वां, 38वां या छठे अध्याय में 23वां श्लोक देखना पड़ेगा. एक पेन्सिल लेकर, कहीं से भी पढ़ने बैठिये और जिस श्लोक को पढ़ लिया वहां निशान लगा दीजिये. एक बार में दो-चार श्लोक करके भी थोड़े ही दिन में पूरा ख़त्म हो जाएगा.

बाकी गाँधी जयंती पर शुरू हुई आखरी तिमाही में ये भी याद दिला दें कि भगवद्गीता होती तो छोटी सी (सात सौ श्लोक) की ही है. भगवद्गीता पर लिखने वाले “धर्मनिरपेक्ष” गाँधी जितना पढ़ सकते हैं या नहीं, खिचड़ी वाले तरीके से बिरयानी पकानी है या अलग तरीके से, ये सब फुर्सत में सोचियेगा.

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