गांधी बेनक़ाब : कंधे श्रवण कुमार के

हरिशंकर परसाई ने “कंधे श्रवण कुमार के” अपने व्यंग्य में इस कथा का विवेचन किया है, वह अत्यंत मार्मिक और रोचक है. उसे पढ़िए और गांधी की संस्कारगत चेतना की नई चेतना से तुलना कीजिए. लिखा है-

“मगर देख रहा हूँ कि श्रवण कुमार के कंधे दुखने लगे हैं. कांवड़ में बैठे अंधे परेशान है. विचित्र दृश्य है. दो अंधे एक आँख वाले पर लदे हैं और उसे चला रहे हैं. जीवन से कट जाने के कारण एक पीढ़ी दृष्टिहीन हो जाती है, तब वह आगामी पीढ़ी के ऊपर लद जाती है.

अंधी होते ही उसे तीर्थ सूझने लगते हैं. वह कहती है- हमें तीर्थ ले चलो. इस क्रियाशील जन्म का भोग हो चुका. हमें आगामी जन्म के लिए पुण्य का एडवांस देना है. आँख वाले की जवानी अंधों को ढोने में गुज़र जाती है. वह अंधों के बताये रास्ते पर चलता है. उसका निर्णय और निर्वाचन का अधिकार चला जाता है. उसकी आँखें रास्ता नहीं खोजतीं, सिर्फ राह के कांटें बचाने के काम आती हैं.

कितने कांवड़ हैं- राजनीति में, साहित्य में, कला में, धर्म में, शिक्षा में. अंधे में अजब काइयांपन आ जाता है. वह खरे और खोटे सिक्के को पहचान लेता है. पैसे सही गिन लेता है. उसमें टटोलने की क्षमता आ जाती है. वह पद टटोल लेता है, पुरस्कार टटोल लेता है, सम्मान के रास्ते टटोल लेता है. बैंक का चेक टटोल लेता है. आँख वाले जिन्हें नहीं देख पाते, उन्हें वह टटोल लेता है.

नए अंधों के तीर्थ भी नए हैं. वे काशी, हरिद्वार, पुरी नहीं जाते. इस कांवड़ वाले अंधे से पूछो, कहाँ ले चले? वह कहेगा- तीर्थ! कौन सा तीर्थ? जवाब देगा- केबिनेट! मंत्री मंडल! उस कांवड़ वाले से पूछो, तो वह भी तीर्थ जाने को प्रस्तुत है. कौन सा तीर्थ चलेंगे आप? जवाब मिलेगा- अकादमी, विश्वविद्यालय!

मगर कांवड़ें हिलने लगे हैं. ढोने वालों के मन में शंका पैदा होने लगी है. वे झटका देते हैं, तो अंधे चिल्लाते हैं- अरे पापी, ये क्या करते हो? क्या हमें गिरा दोगे? और ढोने वाला कहता है – अपनी शक्ति और जीवन हम अंधों को ढोने में नहीं गुजारेंगे. तुम एक जगह बैठो. माला जपो. आदर लो, रक्षण लो. हमें अपनी इच्छा से चलने दो. अनुभव दे दो, दृष्टि मत दो. वह हम कमा लेंगे.”

इत्तफाक़ की बात है कि जिन दिनों गांधी की आत्मकथा प्रकाशित हुई, उन्हीं दिनों प्रेमचंद ने “रंगभूमि” उपन्यास लिखा, जिसका नायक अँधा सूरदास गांधी का ही प्रतिरूप है. यह अंधा भी बड़ा काइयां है खरे-खोटे सिक्के को टटोलकर पहचान लेता है. प्रेमचंद ने उसका कांवड़ ढोने के लिए बड़ी श्रद्धा से अपने कंधे जुटाए. लेकिन उन्हें थोड़ी दूर चलने के बाद महसूस हो गया कि मैं जिस जनवादी चेतना का प्रतिनिधि हूँ, यह अंधा उसका घोर शत्रु है और मैं लूट-खसोट की जिस व्यवस्था को बदलना चाहता हूँ यह उसके टुकड़ों, उसकी दानशीलता पर पलने वाला भिखारी, उसे बनाए रखना चाहता है. इसका संघर्ष नए के खिलाफ और पुराने के हक में है. प्रेमचंद ने चिढ़कर कांवड़े पटक दी और इस अंधे भिखारी को, जिसे वह महापुरुष चित्रित करने चले थे, अपनी हार स्वीकारने पर मजबूर किया और उसने स्वीकारी.

“रंगभूमि” में प्रेमचंद का आदर्शवाद जो टूटना शुरू हुआ तो “गोदान” तक पहुँचते-पहुँचते लगभग टूट गया.

जो लोग प्रेमचंद को साहित्य में गांधीवाद का प्रवक्ता कहते हैं, वे दरअसल प्रेमचंद के व्यक्तित्व में उस विकास-क्रम को नहीं देखते, जिसका गांधी में एकदम अभाव है.

गांधी पौराणिकता के खोल में बंद पैदा हुआ और हम देखेंगे कि वह आजीवन उसी में बंद रहा. उसका “सत्य” इसी खोल के भीतर का सत्य है- सड़ा, बुसा, जन-विरोधी और राष्ट्र विरोधी!

– हंसराज रहबर की पुस्तक “गांधी बेनकाब” से

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