अपनी ग्रहणशीलता बढ़ाइए, अस्तित्व दे रहा है हर पल संकेत

Soul Connection
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मैं जब भी कोलकाता आता हूँ दक्षिणेश्वर मन्दिर में माँ काली के दर्शन करने जरूर जाता हूँ. महाअष्टमी के पावन अवसर पर माँ ने इस बार भी बुला ही लिया. वहाँ लाखों लोगों की भीड़ लगी थी, लेकिन मैं कुछ मिनटों में ही दर्शन कर लिया. दर्शन के बाद एकांत में बैठकर मैं सोचने लगा कि उसने कई गुनाह किये हैं पर इतने भीड़ में भी दर्शन करना मुझे उसी ने सिखाया था. उसका घर उत्तरपाड़ा में था जो दक्षिणेश्वर मन्दिर से मात्र तीन-चार किलोमीटर ही दूर है. इसलिए वो यहाँ की स्थिति से भलीभाँति परिचित थी.

मैं अपने गालों पर हाथ रखे हुए ये सब सोच रहा था. अचानक से एक बहुत ही प्यारे से अंकल मेरे बगल से गुजरते हुए अधिकार के साथ मेरे हाथ को मेरे गाल से हटाकर मुस्कुराते हुए बोले – “ठाकुरे काचे गाले हाथ दिच्चो, ठाकुरे काचे चिन्ता कोरा जाए ना (ईश्वर के पास गाल पर हाथ रखते हो, ईश्वर के पास चिन्ता नहीं किया जाता है).” वो बिना रुके मुस्कुराते हुए निकल गये. मैं शर्मा गया जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो.

थोड़ी देर ध्यान करने के बाद, मैं उठकर मन्दिर प्रांगण में विचरण करने लगा. तभी अचानक मन को पता नहीं क्या दिल्लगी सूझी, मैं उस सीढ़ी पर बैठ गया जहाँ अक्सर उसके साथ बैठा करता था. वहाँ बैठा-बैठा बारह साल पुरानी बातें सोचने लगा – अगर ये नहीं होता तो कितना अच्छा होता …… अगर वो नहीं होता तो कितना अच्छा होता …… जिन्दगी ने ठहरने नहीं दिया …… ऐसा क्यों हुआ …… वैसा क्यों हुआ …… नियति ने मेरे साथ इतनी कठोरता दिखाई कि मैं हृदय से कठोर ही हो गया …… जिन्दगी में बड़ी से बड़ी चोट का भी दर्द ही नहीं होता है …… कितना निर्मोही हो गया हूँ ……

मन में ये सारे विचार बहुत तेजी से आ रहे थे. अभी मात्र चार-पाँच मिनट ही हुआ था कि एक कबूतर ने मेरे सिर पर विष्ठा कर दी. मार्क्स ने शायद ठीक ही कहा था कि भौतिक स्थितियाँ चेतना का निर्धारण करती हैं. कबूतर की विष्ठा ने जैसे ही मेरे भौतिक स्थिति में परिवर्तन किया, वैसे ही मेरी चेतना में भी परिवर्तन हो गया. मैं प्रेम के रिंगिंग टोन मोड से वैराग्य के साइलेंट मोड में चला गया. पानी से सिर धोकर एक बार फिर माँ के दर्शन करने गया.

इस बार भीड़ और अधिक बढ़ गयी थी लेकिन मुझे पिछली बार की तुलना में और अधिक अच्छे से दर्शन हुआ. पिछली बार मुझे सिर्फ माँ के मुँह का ही दर्शन हो पाया था पर इस बार उनके चारों भुजाओं सहित भगवान शिव पर रखे उनके चरण का भी दर्शन लाभ मिला. ऐसा लग रहा था माँ कह रही है तू सिर्फ मुझे देख और मुझमें ही मन लगा. मेरे अतिरिक्त और कहीं मन लगाया तो मैं तुझसे वो चीज छीन लूँगी, जैसे पहले छिनती आयी हूँ.

हम ऐसी घटनाओं को महज संयोग कह सकते हैं पर जब किसी के जीवन में ऐसी घटनाओं की अनवरत झड़ी लगी हो तो वो इसे मात्र संयोग कहकर अपने आप को कैसे धोखा दे. जो लोग बेहोशी में जी रहे हैं वो यहाँ बात-बात पर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करते नहीं अघाते हैं, और जो जरा भी होश में है वो समझ पा रहा है कि यहाँ हमारी सोच तक पर कायनात के कठोर पहरे हैं. काहे की स्वतंत्रता भईया, हम सब गुलाम हैं, सर्वशक्तिमान नियति के गुलाम.

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