Selective Outrage : लंकेश की हत्या अन्य पत्रकारों की हत्या से अलग क्यों?

5 सितम्बर की शाम एक कम्युनिस्ट पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्‍या कर दी गई. गौरी बेंगलुरु की रहने वाली थीं और कन्‍नड़ साप्‍ताहिक अखबार ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ की संपादक रही थी, जिसे खुद ने ही शुरू किया था. गौरी लंकेश कुछ वर्षो तक अंग्रेजी में भी लेखन करती रही है शायद यही कारण भी है एक तो अंग्रेजी पत्रकार ऊपर से कम्युनिस्ट और हिन्दू-संघ विरोधी विचारधारा की कट्टर धुरी होने के नाते आज उनकी हत्या पर सारा वामी तंत्र हंगामा मचाये हुए है और सीधे सीधे संघ को कातिल घोषित कर दिया गया. यही पूरी कम्युनिस्ट बिरादरी ने प्रधानमंत्री को इसका सीधा-सीधा आरोपी तक घोषित कर दिया है जबकि पूरा देश जानता है गौरी लंकेश और उनके तमाम पत्रकार जो इसी कम्युनिस्ट विचारधारा से मेल खाते है उनका अनेक देशविरोधी तत्वों के साथ सीधा रिश्ता रहा है.

बेशक उनकी हत्या की जीतनी निंदा की जाए कम है क्यूंकि एक इंसान को अपनी जिंदगी जीने का पूरा हक़ है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं की उनके अंतिम संस्कार को पूरे राजकीय सम्मान से नवाजा जाये और उनका ग्लोरिफिकेशन किया जाए तथा उनकी हत्या के नाम अपनी राजीनीति चमकाई जाए. सरकार को चाहिए की हत्याकांड की निष्पक्ष जांच हो और सच दुनिया के सामने आये. क्यूंकि जिस तरह गौरी की हत्या के आधे घंटे के भीतर-भीतर पूरा कम्युनिस्ट तंत्र विरोध करने में जुट गया था इसे जरुर संदेह की नजर से देखा जाना चाहिए. आधे-एक घंटे के भीतर कैसे इतने बड़ी तादाद में वामी पत्रकार बिरादरी इकठ्ठी हो सकती थी? कैसे इतने बैनर, पोस्टर्स प्रिंट कराये जा सकते थे? यह जांच का विषय हो सकता है अगर सरकार इसकी निष्पक्ष जांच कराये.

खैर, गौरी लंकेश चाहे जिस भी विचारधारा की पत्रकार रही हो उनकी इस तरह हत्या होना एक दुखद घटना है यह उतना ही दुखद है जितना गौरीलंकेश की हत्या के दो दिन बाद ही बिहार के अरवल कस्बे में पंकज मिश्र नामक एक पत्रकार की गोली मार कर हत्या कर देना. दोनों ही पत्रकार क्षेत्र से थे दोनों की हत्याए एक ही तरीके से हुई है बावजूद इसके गौरी का हमारे मीडिया द्वारा गुणगान करना और पंकज मिश्र की कोई खबर तक नहीं बनना तमाम तरह की साजिशों का संदेह करने पर मजबूर कर देता है. आखिर कहा से यह जायज है की सिर्फ गौरी लंकेश का केस पंकज के केस से अलग है? गौरी लंकेश की हत्या क्या हुई दिल्ली में प्रेस क्लब में वामी पत्रकारों ने गला फाड़कर रोना चालू कर दिया था. गौरी लंकेश की हत्या बीते वर्ष हुई सीवान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या से अलग कैसे है? राजदेव रंजन की हत्या पे प्रेस क्लब में कोई कार्यक्रम क्यों नही हुआ था?

जिस तरह गौरी लंकेश की हत्या के बाद रविश कुमार प्रेस क्लब के पत्रकारों से मिलने और उनकी बात को सामने कर अपना एजेंडा बतियाने सड़को पर उतर गए थे उसी तरह दो दिन बाद हुई पंकज मिश्र की हत्या को कवर करने NDTV का कोई पत्रकार अरवल क्यों नही गया ? पंकज मिश्रा की हत्या पे नेशनल चैनल पर कुल कितने मिनट चर्चा हुई ? कितने डिस्कशन पैनल बनाये गए? न्यूज़ चैनलों का, कम्युनिस्ट पत्रकारों का, बाकि मीडिया हाउसेस का जो आउटरेज गौरी लंकेश के लिए दिख रहा है वो पंकज मिश्रा या राजदेव रंजन के लिए तब क्यूँ नही दिखा? क्या ये सेलेक्टिव आउटरेज इसलिए कि पंकज मिश्रा या राजदेव रंजन कोई वामपंथी विचारधारा से प्रेरित नहीं थे थे, क्या इसीलिए की यह दोनों हिन्दू विरोधी मानसिकता नहीं रखते थे और संघ को गलिय नहीं देते थे या इसीलिए की ये दोनों ही निष्पक्ष पत्रकारिता करते थे. कहते है पंकज मिश्रा लालूप्रसाद यादव के बेटों के घोटालें उजागर करने में अहम् रोले निभा रहे थे और खुल कर लिखा करते थे. लेकिन अबतक कोई न्यूज़ चैनल ने लालूप्रसाद यादव को कातिल नहीं घोषित किया है. यही सवाल अनेक अंदेशो का जन्म देता है और यही कारण है की देश का इनकी हर एक घटना पर संदेह करना लाजमी हो जाता है.

गौरी जब तक अंग्रेजी के लिए लेखन करती रहीं तब तक वे अपने नियमों के प्रति दृढ़ रहीं. लेकिन कन्नड़ पत्रकारिता में जाने के साथ ही उनका झुकाव कम्युनिस्ट एक्टिविज़्म की तरफ होने लगा. फिर चाहे माओवादियों , नक्सालियों को मुख्यधारा में शामिल करने की बात हो, मुस्लिम संगठनों का समर्थन करना हो या फिर आरएसएस की विचारधारा के ख़िलाफ़ लिखना हो, गौरी लगातार हिंदुत्व ताकतों के सामने एक कड़ी आलोचक बनके ही रही वे कभी निष्पक्ष पत्रकार या पत्रकार तक नहीं बन पाई. वे हमेशा ही कम्युनिस्ट कार्यकर्ता बनकर ही रही. अपनी बात, अपनी विचारधारा ही हमेशा उन्होंने अख़बार के माध्यम से जनता पर थोपा.

लंकेश पत्रिका में शायद ही ऐसा कोई भी अंक हो जिसमें हिन्दू, आरएसएस या बीजेपी नेताओं की खिंचाई करते हुए कवर स्टोरी या अभद्र टिप्पणियां करते हुए हुए संपादकीय न छपा हो. गौरी लंकेश ट्विटर और सोशल मीडिया पर खासी सक्रीय रही है और जब भी उन्होंने कोई पोस्ट किया हमेशा उनके शब्द पत्रकार बिरादरी को शर्मशार करनेवाले रहे. उन्होंने कभी हिन्दू और संघ के लिए भद्र या इज्जतदार शब्दों का प्रयोग नहीं किया. वे हमेशा संघियों को ‘चड्डी’ कहकर संबोधित करती रही अपने लेखो में भी. उन्होंने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में भी गाली-गलोच करने से कभी परहेज नहीं किया है. एक ऐसी ही भद्दी गालियों से सजी उनकी एक पोस्ट मीडिया में काफी वायरल हो रही है.

वहीं दूसरी तरह एक आम इंसान द्वारा उनकी हत्या पर गलत शब्दों का इस्तेमाल करने पर रविश कुमार जैसे तमाम पत्रकार इसे संघ की विचारधारा और प्रधानमंत्री के शब्दों से जोड़ देते है. कितना विरोधाभाष है वामपंथी पत्रकारों की सोच में एक तरफ गौरी खुद पूरी जिंदगी संघ जैसे राष्ट्रवादी संघठन को गलियों से नवाजती रही है आज उन्ही के बिरादरी के लोग दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे है. लेकिन नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए रविश कुमार इतने अमर्यादित हो जाते है की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के, लोकतंत्र से चुने हुए प्रधानमंत्री को ‘गुंडा’ कह देते है. मतलब सारी नैतिकता आम इंसानों के लिए है, रविश कुमार जैसे पत्रकारों को नैतिकता के दायरे से बहार रखा जाए.

एक छोटे से छोटे कामरेड की न्यूज़ पूरे देश में बवाल मचा देती है माने मतलब साफ़ है गौरी लंकेश जिसे एक निष्पक्ष पत्रकार का चोला जबरन पहनाया जा रहा है, इतनी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करनेवाला कोई पत्रकार कैसे हो सकता है? हर पत्रकार के सरकारों से मतभेद होते है और इतिहास में भी ये देखा गया है लेकिन पत्रकारों ने हमेशा कलम से वार किया है. पत्रकार तो समाज का आइना होता है वही लिखता है जो सच है और समाज में घटित हो रहा होता है. उसे सच्चाई परोसने के लिए गालियाँ देने की जरुरत तो नही पड़ती.

इसी देश में जयप्रकाश नारायण जैसे लोगों ने आन्दोलन और भाषणों से सरकारे पलट दी थी तब किसी को गलियां देनी नहीं पड़ी थी. उम्मीद करता हूँ अगर ये दौर बुरा भी है तो देश में इमरजेंसी जितना बुरा और काला तो नही हो सकता. जब पत्रकारों, विपक्षी नेताओं को हर किसी को जिसने सर्कार के खिलाफ लिखने की या बोलने की कोशिश की हो उसको चुप करा दिया गया हो तब भी उस वक्त देश के तमाम बड़े छोटे पत्रकारों ने अपनी कलम को झुकने नहीं दिया और अपने शब्दों से प्रहार करते रहे तो इस दौर में गलियां देने तक नौबत कैसे आगयी ? क्या यह नहीं दर्शाता है की विचारधारा थोपने या अपनी विचारधारा का पतन होता देख वामपंथी किस कदर तक जा सकते है.

यह दर्शाता है कि किस कदर नफरत है इन्हें उस सरकार से जिसे जनता ने पूर्ण बहुमत से चुना है. कम से कम सरकार की नहीं लेकिन उस जनता का आदर तो करना ही चाहिए जिसने कांग्रेस को 2004 में मात्र 145 सीटें देकर सरकार बना दी तब तो विपक्ष इस तरह नहीं बिलबिलाया था. फिर इतना असंतोष क्यूँ उस सरकार के प्रति जिसने पूर्ण बहुमत अपने दम पर हाशिल किया हुआ है. जनता में गुस्सा नही समर्थन है सरकार के प्रति फिर देश में असंतोष कैसे हो सकता है. अगर असंतोष है तो जनता इस सरकार को उखाड़ क्यों नहीं फेक रही चुनाव दर चुनाव एक ही पार्टी को प्रचंड बहुमतों से क्यूँ नवाजा जा रहा है? यह रोमित वेमुल्ला, अख़लाक़, कलबुर्गी, दाभोलकर, गौरी लंकेश के नामों का इस्तेमाल कर सरकार पर हमला करना जनता समझ रही है. इधर से सरकारे इनकी जड़ें उखाड़ रही है उधर से जनता इनके झांसे में आ नहीं रही इसी बात को आज गौरी लंकेश का नाम दिया गया कल किसी और का नाम दिया जायेगा. एक बार फिर गौरी लंकेश की हत्या की कड़ी निंदा करता हूँ. इसे कही से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता.

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