तो ये है GST का वो कहर जिससे मचा है हाहाकार

कल अपने एक बालसखा सहपाठी से भेंट हुई. पिछले 25-30 वर्षों से राजधानी के चर्चित चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में उसकी गणना होती है. बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो जिक्र GST का भी आया और उससे मैंने पूछ लिया कि यार ये GST में ऐसी क्या खराबी है कि व्यापारी त्राहिमाम कर रहे हैं?

उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि तुमको तकनीकी भाषा तो समझ में आएगी नहीं इसलिए एक उदाहरण से बताता हूं. उसने कहा कि जैसे बाजार में एक ब्रांडेड आटा, गेंहू या चावल जो बिकता था उसे कम्पनी मुख्यतः सीधे FCI या अन्य स्रोतों से खरीदती थी.

लेकिन जब वही माल पैकिंग होकर ब्रांड नेम के साथ बेचने की बारी आती थी तो कम्पनी अपनी कुल खरीद के माल का 40 से 50 प्रतिशत माल खराब हो जाना या सड़ जाना बताकर अपनी बिक्री 40 से 50 प्रतिशत कम प्रदर्शित करती थीं. इससे उन्हें दो फायदे होते थे.

पहला यह कि 40 से 50 प्रतिशत बिक्री पर किसी तरह का कोई टैक्स नहीं देना पड़ता था और कागजों पर दिखाई गई जो 50-60 प्रतिशत बिक्री से जो शुद्ध लाभ कम्पनी दिखाती थी उस लाभ के भी एक बड़े हिस्से पर आयकर देने से वो बच जाती थी.

क्योंकि जो 40 से 50 प्रतिशत माल उसने सड़ जाने, खराब होने की बात प्रदर्शित की होती थी वो उसके घाटे में दर्ज होती थी, जो उसके द्वारा दर्शाए गए लाभ से घटाई जाती थी. परिणामस्वरूप उसकी शुद्ध आय का आंकड़ा बहुत कम रह जाता था जिस पर उसे टैक्स देना होता था.

मित्र ने बताया कि खराब प्रदर्शित किए गए 40 से 50 प्रतिशत माल की बिक्री का क्रम नीचे तक, शहरों के बड़े स्टोरों तक जाता था. मित्र ने बताया कि यही खेल अन्य उत्पादों के साथ भी अलग-अलग तरह से चलता था. लेकिन अब GST की गणना और भुगतान की जो प्रक्रिया है उसमें यह खेल करना लगभग असम्भव हो चुका है, त्राहिमाम की यही असली वजह है.

मैंने मित्र से यह भी पूछा कि शोर यह भी मच रहा है कि GST की प्रक्रिया ही बहुत जटिल और उलझन भरी है इसीलिए धन्धे पर असर पड़ रहा है. इस पर मित्र ने पुनः कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए मुझसे ही पूछा कि इतने बड़े देश के 75% व्यापारी तो इस प्रक्रिया को केवल 3 महीने में समझ भी गए और उसमें शामिल भी हो गए, फिर शेष 25% प्रतिशत इसको क्यों नहीं समझ पा रहे?

उसके उपरोक्त सवाल का जवाब भी मैंने उससे ही पूछा तो उसने बताया कि अधिकांश लोगों ने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया है कि अब तक जो खेल वो खेलते थे वो अब सम्भव नहीं है. अतः वो प्रक्रिया में शामिल हो गए. लेकिन अभी भी 20-25% ऐसे वीर व्यापारी हैं जिन्हें अभी भी यह उम्मीद है कि वो इस प्रक्रिया में भी कोई जुगाड़ ढूंढ़ ही लेंगे. सारी परेशानी उनको ही है. सारी प्रक्रिया उनकी ही समझ में नहीं आ रही है.

मित्र ने अंत में कहा कि मेरी बात की पुष्टि तुम ऐसे करना कि अपने आसपास में किराने की किसी छोटी दुकानवाले से और किसी बड़े जनरल स्टोर वाले से बात करना तुम्हे अंतर साफ दिखेगा.

उसकी बात की पुष्टि मैंने आज ही की. छोटा दुकानदार बहुत मस्त बेफिक्र अंदाज़ में बोला कि भइय्या हमे कोई फर्क नहीं पड़ा है, ना ही हमारी बिक्री पर कोई फर्क पड़ा है. जबकि बड़े जनरल स्टोर वाले का GST पर मातम लगभग 5 मिनट तक चला.

वो लेकिन मुझे ये नहीं समझा पाया कि GST चाहे 5% हो या 28%, उसे देगी तो जनता ही फिर तुम्हें क्यों परेशानी है. जवाब उसका वही था कि प्रक्रिया बहुत खराब और जटिल है.

उसके इस अंतिम वाक्य पर मुझे अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट मित्र की कुटिल मुस्कान से सजा चेहरा तत्काल याद आ गया.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY