व्यक्ति बनाम वस्तु : अभाव में रहते हुए भाव में जियो, प्रभाव के लिए अ-भाव में नहीं

Ashutosh Rana

माना जाता है कि हमारी पसंद बदलती है और प्रेम बढ़ता है.

जब हम छोटे थे

पहले हम वस्तुओं को पसंद करते थे और व्यक्तियों से प्रेम करते थे. इसलिए हम अपनी सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, शिक्षा, जीवनमूल्यों को ही नहीं बल्कि रिश्तों को भी बहुत सम्हाल कर रखते थे, माता-पिता, भाई-बहन, हमारे शिक्षक, हमारे पड़ोसी, हमारे मित्र- हमारे प्रेम, आदर, मान और पहचान का विषय होते थे.

हमारे पास मित्र बहुत होते थे और वस्तुएँ कम.

हमें दोस्ती करनी भी आती थी और निभानी भी.

हमें वफ़ादारी भी याद रहती थी और ग़द्दारी भी.

हम विश्वास भी मन से करते थे और अविश्वास भी होश में करते थे.

तब हम पेड़ों से फलों को तोड़ने में विश्वास रखते थे लोगों के सरों को नहीं.

हम कम पढ़े लिखे थे लेकिन फिर भी अधिक समझदार थे.

हमें किसी का भाषण पसंद नहीं आता था तो हम बीच भाषण उसे गालियाँ नहीं देते थे बल्कि हम बीच भाषण में बहुत ज़ोर से तालियाँ बजाते थे, हमारी अशिष्टता में भी एक क़िस्म की शिष्टता होती थी.

हम अभाव में रहते हुए भी भाव से जीते थे.

हम लड़ते हुए भी जुड़ कर रहते थे.

क़ीमत से अधिक महत्व मूल्यों का था।

जब हम बड़े हुए

अब हम व्यक्तियों को पसंद करते हैं और वस्तुओं से प्रेम करते हैं.

वस्तुओं का बाहुल्य हमारे मान, सम्मान, प्रतिष्ठा, पहचान का विषय है.

व्यक्ति नहीं, वस्तुओं के प्रति हमारी निष्ठा है.

अब हम प्रभावपूर्ण होते हुए भी अभावपूर्ण जीवन जी रहे हैं.

अब हम जुड़े होते हुए भी लड़ते रहते हैं.

अब हम अधिक पढ़े लिखे होने के बाद भी कम समझदार हैं.

अब हमारी शिष्टता में एक क़िस्म की अशिष्टता है.

अब तालियों की जगह गालियों ने ले ली है.

परिवार बाज़ार में बदल गए और बाज़ार ने परिवार का रूप ले लिया.

अब हम मूल्यों से नहीं क़ीमत से अधिक प्रभावित होते हैं.

बाज़ार में वस्तुओं ख़रीदते बेचते हम स्वयं का ही सौदा कर बैठते हैं.

पूरा विश्व हमारा परिवार है की विचारधारा को मानने वाले हमने, वसुधैव कुटुम्बकम को ग्लोबल मार्केट में बदलकर रख दिया.

सम्भवत: इसलिए आज व्यक्तियों को बदलना हमारी आदत हो गई है और वस्तुओं को बढ़ाना हमारी फ़ितरत.

शायद यही कारण है कि पहले से अधिक सम्पत्तिवान होने के बाद भी हम पहले से अधिक दरिद्र हैं.

पहले से अधिक शिक्षित होने के बाद भी हम आज अशिक्षित सा व्यवहार कर बैठते हैं.

पहले से अधिक सुविधासंपन्न होने के बाद भी हम असुविधा महसूस करते हैं.

हम बाहर से तो बहुत बड़े हो गए किंतु अंदर से बेहद छोटे रह गए.

हमने दुनिया को तो जीत लिया किंतु ख़ुद से हार गए.

हम संसार से तो जुड़ जाते हैं किंतु स्वजनों से कट जाते हैं. दुनिया को मुट्ठी में करने के चक्कर में हम ख़ुद ही दुनिया की मुट्ठी में आ जाते हैं.

दुनिया को पैरों तले लाने की हमारी इच्छा ने पता नहीं कब हमें ही दुनिया के पैरों के नीचे डाल दिया.

दूसरों को मिटा देने की इच्छा के चलते हम अपनों के साथ-साथ अपने को ही मिटा बैठे.

दूसरे को खंडित करने के प्रयास में हम स्वयं ही खंडित हो गए.

स्वयं को विशिष्ट सिद्ध करने की चाहत ने हमें कब अशिष्ट बना दिया हमें पता ही नहीं चला.

सत्ता सम्पत्ति की चाह ने हमें सहजता और सम्मति से विलग कर दिया.

दुनिया को अपनी कूटनीति का लोहा मनवाने के चक्कर में हमने अपने घर को ही कूटनीति का अड्डा बना लिया.

अपने शत्रुओं को मित्र बनाने के चक्कर में, हम अपने मित्रों से ही शत्रुता ठान बैठते हैं.

चिंतन करने का विषय यह है कि- जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं वैसे-वैसे हम छोटे क्यों होते जाते हैं ?

“हे प्रभु आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए॥
लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें।
ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक, सत्यव्रत धारी बनें॥”

जय हो शुभ हो
– आशुतोष राणा

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