विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु, रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि

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न्यू टेस्टामेंट (यानि बाईबिल का उत्तर भाग) खोल के देखिये कि वहां मसीह ने अपने शिष्यों को क्या प्रार्थना सिखाई थी. मैथ्यू , 6:9-13 में मसीह कहते हैं :-

“अत: तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो: ‘हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में हैं; तेरा नाम पवित्र माना जाए. तेरा राज्य आए. तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो. हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे.”

इसके विपरीत हमारे पूर्वज क्या प्रार्थना करते थे ‘श्रीदुर्गा सप्तशती’ खोल के पढ़ लीजिये. वहां हमारे ऋषि कहते हैं,

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु ।।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥॥

यानि, मां, तुम मुझे विद्वान्, यशस्वी और लक्ष्मीवान करो. मुझे रूप (यानि आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो, जय दो, यश दो और मेरे काम, क्रोध आदि व्याधियों का (शत्रुओं का) नाश करो.

हम लोगों में ज्ञान की अलख जगाने आये हैं मूर्ख मिशनरियों, जिस वक़्त तुम सिर्फ रोटी को ही जीवन का ध्येय मानने थे और केवल उसी के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते थे, उससे सदियों पहले से हम अपनी माँ से विद्या, यश, लक्ष्मी और जय मांगते थे. रोटी हमें हमारा पुरुषार्थ देता था.

हिन्दू धर्म और तुम्हारे अपने मजहब का अंतर अब भी समझ नहीं आ रहा तो ‘द न्यूयॉर्क हेराल्ड’ का वो अंक कहीं से खोज के पढ़ लो जो हमारे स्वामी विवेकानंद के शिकागो उदगार के बाद छपी थी. उसमें लिखा था:-

“Vivekananda is undoubtedly the greatest figure in the Parliament of Religions. After hearing him we feel how foolish it is to send missionaries to this learned nation.”

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