हम भी ऐसे ही मारे जाएंगे, यदि हमारी पीढ़ी ने न बदलीं प्राथमिकताएं

मैंने कई बार इस बात की चर्चा की है कि मुझे इतिहास में बड़ी दिलचस्पी है और मैं अक्सर वर्तमान के सवालों को इतिहास में ढूंढता हूँ. मुझे याद आता है कि जबसे मैंने इतिहास को पढ़ना और उसे समझना शुरू किया है तभी से मुझे अमेरिकी इतिहास ने ज्यादा आकर्षित किया है. वैसे तो मैंने माया, इंका, रोमन, ब्रिटिश, फ्रेंच, ऑटोमन साम्राज्य भी पढ़ा हुआ है लेकिन भारत के परिप्रेक्ष्य में जो सवालों के जवाब अमेरिका के इतिहास में मिलते है वो मुझे कोई इतिहास नही देता है.

आज जब मैं 19वीं व 20वीं शताब्दी के भारत के उन राजनैतिक विचारकों को पढ़ता हूँ तो यह देख कर मुझे यह बेहद आश्चर्य होता है कि ज्यादातर इन लोगों के दर्शन और नीतियों पर सिर्फ योरोपियन इतिहास, फ्रेंच रेवोलुशन और योरप के रेनासें काल का ही प्रभाव पड़ा है.

इन लोगो की लेखनी और विचारधारा पर दासप्रथा के अंत के अलावा, अमेरिका के 18वीं शताब्दी में हुए सृजन से लेकर 19वीं शताब्दी में हुये गृहयुद्ध के बाद अमेरिका के उत्थान का कोई विशेष प्रभाव नही पड़ा है. मुझे इसका कारण यह लगता है कि शायद हमको सबसे पुरानी सभ्यता का, या तो अहंकार था या फिर अमरीका का युद्ध कर के ग्रेट ब्रिटेन से स्वतंत्र होना हमारी भीरु मानसिकता पर भारी था.

खैर, इस सबसे परे जाकर मेरे लिये तो, अमेरिका के इतिहास पुरुषों ने अपने नव सृजित राष्ट्र व उसके समाज के लिये जो कथानक तय किये थे, वह हमेशा प्रेरणा स्रोत रहते है. भारत मे लोग जॉर्ज वाशिंगटन, थॉमस जैफरसन, अब्राहम लिंकन को जानते है और उनको पढ़ कर प्रभावित भी हुये है लेकिन मुझे इनके अलावा, अमेरिका के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति जॉन एडम्स और एक समय अब्राहम लिंकन के विरुद्ध राष्ट्रपति पद के प्रत्याक्षी के रूप में प्रबल दावेदार और फिर लिंकन के कैबिनेट में सेक्रेटरी ऑफ एस्टेट विलियम सीवर्ड ने बेहद प्रभावित किया है और इसका मुख्य कारण यह है कि ये दोनों व्यक्तित्व भारत के लिये बड़े प्रासांगिक है.

आज मुझे जॉन एडम्स की उनके पेरिस प्रवास के दौरान कही गयी एक बात याद आ रही है जिसे यदि भारत की नस्लों को अपने नवसर्जन काल में सिखा दिया गया होता तो आज भारत का पूरा समाज ही बदला हुआ होता.

1776 में अमेरिका की कॉन्टिनेंटल कांग्रेस द्वारा स्वाधीनता की घोषणा के बाद फ्रांस से एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता प्राप्त व सन्धि करने के लिये बेंजीमन फ्रैंकलिन को मिनिस्टर ऑफ फ्रांस (फ्रांस के राजदूत) बना कर भेजा गया. कालांतर में कांग्रेस ने जॉन एडम्स को, फ्रांस के साथ ‘ट्रीटी ऑफ एमिटी एंड कॉमर्स एंड द ट्रीटी ऑफ अलायन्स’ को पक्का करने के लिये, फ्रैंकलिन की सहायता करने के लिए पेरिस, फ्रांस भेजा गया. लेकिन फ्रांस में लुई 16 के दरबार और उसके सभ्रांत वर्ग में, एडम्स ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाए क्योंकि उनको फ्रेंच भाषा नहीं आती थी जो उस काल की कूटनीतिक भाषा थी. इस कारण जॉन एडम्स को अक्सर सार्वजनिक रूप से लज्जित भी होना पड़ता था.

एक बार लुई 16 के एक भोज में एक सभ्रांत वर्ग की महिला ने एडम्स से पूछा, ‘क्या आपने ऑपेरा सुना है?’ इस पर जॉन एडम्स ने जवाब दिया कि, ‘मेरे कान को संगीत की समझ नहीं है और मेरा काम मुझे ललित कला के लिए समय नहीं देता है.’ उनके इस वक्तव्य पर टेबल पर बैठा हुआ फ्रेंच अभिजात वर्ग हंसने लगा.

एडम्स ने उस हंसी के पीछे उनकी खिल्ली उड़ाए जाने को समझ लिया था और फिर उन्होंने यह अमर वाक्य बोले, ‘आज मेरे पास सिर्फ युद्ध और राजनीति पढ़ने और समझने का वक्त है ताकि मेरे बच्चे को यह स्वतन्त्रता मिले कि वह गणित और दर्शन पढ़ सके. मेरे बच्चों को नेविगेशन (जहाजरानी), खेती, व्यपार अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि उनके बच्चों को यह अधिकार हो कि वह चित्रकारी, कविता और संगीत सीख सके’.

हमारे पुरखों ने अपनी स्वतंत्रता के लिये जो मार्ग चुना उसके पीछे उनका दर्शन तो था लेकिन अपनी आगामी पीढ़ी के लिये कोई दर्शन नही था. उन्होंने अपने को 1947 में स्वतन्त्र करा लिया लेकिन अपने बच्चों को अपनी ही प्राथमिकता का गुलाम बना कर छोड़ दिया. उन्होंने ‘युद्ध’ को अपने दर्शन से विमुक्त रखा जिसका परिणाम यह हुआ है कि हमारी नस्ल अपने होने की कीमत ही नहीं जानती है. हम इसी लिये हर जगह काटे और मारे जाते हैं लेकिन विलाप और आक्रोश से ज्यादा कुछ नही कर पाते है.

आज 2014 की पीढ़ी को एक स्वर्णिम अवसर हाथ लगा है जब हम अपना ध्यान ‘युद्ध’ और उसकी ‘राजनीति’ की तरफ केंद्रित कर सकते हैं ताकि हमारे आगे आने वाली नस्ल जो आगे करे उसको उसकी कीमत का पता हो.

आज यह मैं युद्ध और राजनीति की बात इसलिये कह रहा हूं क्योंकि अभी एक वीडियो देख रहा हूँ, जिसमें लोगों को खोदी गयी कब्रों में धकेल कर, मार कर, जलाया जार हा है. यह कब्र हमारे लिये ही बनाई गई है और हम ऐसे ही ढकेले जाएंगे यदि हमारी पीढ़ी ने अपनी प्राथमिकताओं को बदलने में ज्यादा देर कर दी.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY