हिंदुत्व-7 : आडंबर की उपासना

एक प्रश्न हमेशा मन में कौंधता हैं… हिन्दू धर्म में एक अच्छी सी संत-परंपरा रही है. जहां जहां हिन्दू धर्म का फैलाव हुआ है, वहां वहां संत – महंत हुए. इन्होने समाज प्रबोधन का बहुत बड़ा काम किया है. लोगों को न्याय के, नीति के, सत्य के, अहिंसा के मार्ग पर चलने का आग्रह किया. भगवत भक्ति की, समाज को सही दिशा में लेकर जाने की यह बयार अखंड हिन्दुस्थान में सभी जगह बही, ऐसा दिखता है.

और हमारे समाज के नेतृत्व ने, राजा – महाराजाओं ने इस दिशा में चलने का पूरा प्रयास भी किया है. हमने कभी भी किसी पर भी स्वतः होकर आक्रमण नहीं किया. कोई हिन्दू राजा कभी भी आक्रांता नहीं रहा. युद्ध में शत्रु पर क्रौर्य का, बर्बरता का, वीभत्सता का कोई भी उदाहरण, हिन्दू राजा का नहीं मिलता.

[हिंदुत्व-1 : हम ‘हिन्दू’ किसे कहेंगे..?]

हम सहिष्णु रहे. आने वाले विदेशियों का स्वागत करते रहे. धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने वाले हमको क्या मिला..? हमको मिली गुलामी. हमको मिला दारिद्र्य. हमको मिले अत्याचार. हमको मिला अपमान. हमारा ऐश्वर्य जाता रहा. हमारा स्वातंत्र्य जाता रहा. हमारा सम्मान जाता रहा. हमारी बहु-बेटियां भी जाती रही.

इसके ठीक विपरीत, हम पर आक्रमण करने वालों ने क्या किया..? उन्होंने तमाम गलत, अनैतिक रास्ते अपनाएं. छल, कपट, बलात्कार का सहारा लिया. क्रूरता की पराकाष्ठा की. युद्ध के तत्कालीन सारे नियम तोड़ दिए. बलात धर्मांतरण किया. बहु-बेटियों की इज्जत लूटी.

[हिंदुत्व-2 : संगठित हिन्दू समाज]

उन मुस्लिम आक्रांताओं को, उन अंग्रेज / पोर्तुगीज / फ्रेंच आक्रांताओं को क्या मिला..? उनको मिला ऐश्वर्य. उनको मिला स्वातंत्र्य. उनको मिली सत्ता. उनको मिला उपभोग. सारे पाप करने के बाद भी मुस्लिम और ख्रिश्चन आक्रांताओं को यह सब मिला और सारे पुण्य करने के बाद भी हमें गुलामी और दारिद्र्य मिला.

ऐसा क्यों..?

[हिंदुत्व-3 : सामर्थ्यशाली हिन्दू]

मुस्लिम और ख्रिश्चन आक्रांताओं ने केवल एक धर्म निभाया. और हम हिन्दू, धर्म निभाने के आडंबर में धर्म का वही मूल तत्व भूल गए..!

वह हैं – संघ धर्म. समष्टि का धर्म. जिसका अगला भाग है – ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’.

[हिंदुत्व-4 : समरस हिन्दू]

और हम यही भूल गए. सन 1001 में महमूद गजनी के आक्रमण के बाद हम में जो क्षरण आने लगा, उसके कारण हम धर्म का यही तत्व भूल गए. अपने छोटे-छोटे झगड़ों के कारण या फायदों के कारण हम शत्रुओं की मदद करते रहे. गद्दारी करते रहे.

पृथ्वीराज चौहान के साथ कपट करने वाले जयचंद राठौर से लेकर हमारे यहाँ गद्दारों की लंबी परंपरा रही है. विजयनगर साम्राज्य के पराभव में गद्दारी का हाथ था. संभाजी को पकड़वाया एक मराठा सरदार ने. तात्या टोपे के बारे में अंग्रेजों को बताने वाला हिन्दू ही था. चद्रशेखर आज़ाद, चाफेकर बंधु आदि को मरवाने या पकड़वाने वाले हिन्दू ही थे. ऐसे अनगिनत उदाहरण मिलेंगे.

[हिंदुत्व-5 : राष्ट्र सर्वप्रथम]

इसके विपरीत अंग्रेजों में, अंग्रेजों के खिलाफ गद्दारी के कोई उदाहरण नहीं मिलते. मुस्लिम शासक आपस में खूब लड़े. लेकिन हिन्दू राजा के खिलाफ लड़ने के लिए वे एक होते थे.

और इस सारे वातावरण में हम ‘धर्म’ की व्याख्या ही भूल गए. मिर्ज़ा राजा जयसिंह, औरंगजेब के दरबार में सबसे वीर प्रतापी सरदार माने जाते थे. खैबर के दर्रे तक उनके पराक्रम की धाक थी. वे भगवान एकलिंग जी के परम भक्त थे. उनकी पूजा किये बगैर जल भी ग्रहण नहीं करते थे. उनकी दृष्टि में, उनसे धार्मिक कोई नहीं था.

[हिंदुत्व-6 : और विघटन प्रारंभ हुआ…!]

ऐसे राजा जयसिंह किसको परास्त करने लिए औरंगजेब की आज्ञा से दक्षिण में आये..? छत्रपति शिवाजी को… उन छत्रपति को जो हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का प्रयत्न कर रहे थे. हिन्दू धर्म के लिए लड़ रहे थे. लेकिन शिवाजी को पराभूत करने में कुछ गलत हैं, धर्म के विरोध में हैं, ऐसा राजा जयसिंह में मन में भी नहीं आया. क्योंकि उनके धर्म की व्याख्या ही अलग थी. रोज भगवान् एकलिंग जी का अभिषेक करना, उन्हें एक हजार बेल के पत्ते चढ़ाना, गौमाता के दर्शन के बिना भोजन ग्रहण नहीं करना, ब्राह्मण भोज करवाना… यही उनका ‘धर्म’ था.

लेकिन उनके शौर्य, उनके वीरता की मदद से औरंगजेब हिन्दुओं मार रहा हैं, हिन्दू धर्म को समाप्त करने पर तुला हैं, हिन्दू देवस्थानों को नष्ट कर रहा हैं, गायों को काट रहा हैं… यह जानते हुए भी, यह ‘हिन्दू धर्म’ विरोधी है, ऐसा राजा जयसिंह को लगता ही नहीं था…!

समाज में आयी विकृति के कारण, ‘धर्म’ आडंबर बन कर रह गया. शौच के समय जनीव (जनेऊ) कान पर कैसे लगाना, माथे का टीका सीधा लगाना या आड़ा, पूजा के लिए आसन पश्चिम में लगाना या पूर्व में… इसी आडंबर में धर्म उलझता गया. हमारे ऋषियों ने धर्म को संगठित करने का जो माध्यम बनाया था, वह जाता रहा.

धार्मिक आडंबरों की विकृति की पराकाष्ठा देखिये, मुस्लिम आक्रमणों के कालखंड में ‘कालतरंगिनी’ में लिखा हैं –

वरं हि मातृगमनं, वरं गोमांसभक्षणम्
ब्रह्महत्या, सुरापानं, एकादश्या न भोजनम्

अर्थात, दुनिया के अत्यंत नीच और निंदनीय पाप किये तो भी चलेगा. लेकिन एकादशी के दिन भोजन करना नहीं चलेगा..!

इन सब विकृतियों के कारण हिंदुत्व का जो मूलाधार हमारे ऋषियों ने दिया था – ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’, वह कही दूर चला गया…!

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