‘राम’ बोलने का पैसा मिले तो नहीं होते मज़हब से खारिज!

कल अलम का जलूस निकलने को था. मेरे संस्थान के इर्द गिर्द बसे मुस्लिम मोहल्ले में खासी चहल पहल थी. पड़ोस में रहने वाले इशाक की लड़की आकर बोली, “ताऊ हजार रूपिये दे दो, बाबू बाहर गए एं, आ के दे दिंगे….”

मैं आश्चर्य से बोला, ‘बाहर गए एं! चों वो ताजिया नाएँ बना रऔ का?’ लड़की के साथ आई उसकी माँ दुपट्टे के अंदर से बोली, “रावण बनाने कू गए एं.”

‘हैं! फिर जे मोहल्ले वाले गुस्सा ना होंगे ताजिया समय पै ना बनौ तौ?’ जवाब मिला – “नाएँ, वो सब खपच्च काट कूट कै रख गए… लौंडे ने बना लिया ऐ… वो जा तौ ना रये पर खर्चे कू कुछ पैसों की जुगाड़ होई जागी अब… जेई सोच कै चले गए.”

वो पड़ौसन रूपिये लेकर चली गयी लेकिन ये मेरे लिए बड़े आश्चर्य की बात थी कि माथे पर नमाज की रगड़ से बने काले निशान वाला इशाक, ताजिया छोड़ रावण बनाने चला कैसे गया.

ये बात मेरे ज़ेहन में बार बार टकरा ही रही थी कि ध्यान गया कि अबकी बार मेरे संस्थान के ठीक सामने वाली खुली जगह में हर बार की तरह बनने वाले ढोल भी नहीं बन रहे थे. मैंने एक लड़के को बुला कर पूछा तो बताया, “ढ़ोल वाला लल्लो बंब बना रिया ऐ… वा पै बीस रावनों का एडवांस आ गिया ऐ बंब फिट करने कू…”

यह मेरे लिए दूसरा आश्चर्य था… सोच रहा था अपने किसी चैनल वाले रिपोर्टर मित्र को बुला कर स्टोरी करवा दूँ… बहुत अच्छी चलेगी… हनीप्रीत को भूल सब इसी में लग जाएँगे – “खंदौली के मुसलमानों ने पेश की सौहार्द्र की मिसाल… अपने रस्मों रिवाज छोड़ अपने को हिंदूओं की रामलीला की तैयारीयों मेँ झोंका…“, वगैरह… वगैरह…

सोच रहा था लगे हाथों इलियास की भी बाइट करवा दूंगा… उसके लड़के ने अभी मथुरा में कृष्णजन्म भूमि की जन्माष्टमी की पोशाकें बनायीं थीं… और वो सईद की भी कि उसके सारे घरवालों ने गणेश जी की कितनी ही प्रतिमाओं पर कितना खूबसूरत पेंट किया था… उस कमरू की भी जो पूजा आरती वाली गरुड घंटियों और लड्डू गोपाल जी की मूर्तियों को ढालता है…

ये सब सोचते सोचते घर आ टीवी पर न्यूज़ लगा कर बैठ गया… एक चैनल पर वहीदा रहमान मंदिर में गा रही थीं ‘मेरे रोम रोम में बसने वाले राम, जगत के स्वामी ओ अंतर्यामी…’

चैनल बदल कर न्यूज़ लगाई तो आज हनीप्रीत नहीं रामलीला की जानकारी दी जा रही थी… फिल्मी कलाकारों वाली रामलीला के मुसलिम कलाकारों के नाम बताए… तो विभिन्न रामलीलाओं के मुस्लिम कलाकारों के बारे में कि ये कितनी लगन से अपने अपने पात्रों को जी रहे थे.

मैं मुसलमानों की इस सेकुलरी से अभिभूत हो रहा था कि मालकिन भड़क कर बोल पड़ी, “इन मरे रामलीला वारेन नें है का गयौ ऐ… इनकू शरम नाएँ जो भगवान की लीला ऐ अपवित्र कर-कर कै टीवी पै बखान और करा रये एं…”

मालकिन यहीं नहीं रुकीं, बोलीं – “कहाँ तौ इन रामलीला कृष्णरास में सबके सब ब्राह्मण यी भाग लै सकते… वो बात तौ दूर, अब जे गईया भैंस खावे वारेन सै लीला और करा रये एं कम्मखत… ब्राह्मण नाएँ तौ कम सै कम हिन्दू तौ होयें… आखिर कू हम सब के सब रामलीला की स्टेज की ओर हाथ जोड़ें… सबन्नें पूजें… और जे अब एसौ भ्रष्टमभ्रष्ट फैला कै रख दयौ.”

मालकिन के इस गुस्से ने मेरा दिमाग एकदम से सेंटर में कर दिया था… झटके से पत्रकारिता दिमाग के बाएँ हिस्से से हट कर दायें हिस्से में आ विराजी थी… दिमाग अब सोच रहा था….

‘अबे आखिर अहसान कर कौन कर रहा है? क्या वो ताजिया छोड़, रावण बनाने वाला ‘इशाक’ या ढोल छोड़, रावण के पटाखे बनाने वाला ‘लल्लो’? कृष्ण जन्मभूमि की पोशाक बनाने वाला इलियास का लड़का या गणेश प्रतिमाओं को सजाने वाला ‘सईद’? क्या घंटी और लड्डूगोपाल ढालने वाला कमरू? क्या वो रामलीला के मुसलिम कलाकार?

आखिर क्या ये सब हिन्दूओं पर अहसान कर रहे हैं या विशाल हिन्दू समाज इन लोगों को अपने सामाजिक तो छोड़िए बल्कि संवेदनशील धार्मिक कृत्यों में इनको मौका देकर, इनको रोजी-रोटी उपलब्ध करा कर, इन पर कृपा बरसा रहा है.

कमाल है हमारे धार्मिक कृत्य इनको कितनी रोजी उपलब्ध कराते हैं और इनका मज़हब हमारे इष्ट की जय बोलते ही भ्रष्ट हो जाता है…

क्या गलती थी बिहार के उस विधायक की जिसने ‘जय श्री राम’ बोल दिया तो तुरंत इस्लाम से खारिज कर दिया गया… लेकिन रामलीला में क्या श्री राम पक्ष और क्या ही रावण पक्ष… मारीच… कुंभकरण… मेघनाद… रावण… आखिर कौन सा पात्र है जो मरते मरते भी कातर और श्रद्धा भाव से श्री राम जी का नाम ना लेता हो.

अजूबा ही है… जो हिन्दू समाज इनको रोजी रोटी दे… इनको हिंदुओं से नकदी मिले तो इनका मज़हब नहीं बिगड़ता लेकिन वही मजहब, श्री राम का नाम लेने पर इनको इस्लाम से खारिज कर देता है.

क्यों नहीं वहीदा रहमान को ‘मेरे रोम रोम में वसने वाले राम’… क्यों नहीं युसुफ खान को ‘रामचन्द्र कह गए सिया से…’ और क्यों नहीं ‘मन तड़pत हरी दर्शन को आज…’ गाने पर मोहम्म्द रफी को और क्यों नहीं जय ‘जय हनुमान’ बनाने वाले संजय खान को… गणेश सीरियल के मुस्लिम बाल कलाकार उजैरर बसर को इस्लाम से खारिज किया!

क्या इसीलिए कि ऐसा करने के लिए ये हिन्दुओं से ही पैसा ले रहे थे और फ्री में गणपती बप्पा मोरिया कहने वाले और आरती करने वाले सलमान खान को इनका इस्लाम गालियों से नवाज़ता है

वैसे हमारा हिन्दू धर्म पैसे के लिए दूसरे के धार्मिक कार्यों को करने को महान अपवित्र और अधार्मिक कार्य मानता है… समझे!

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