आखिर भारत राष्ट्र-राज्य के लिए क्यों अनर्थकारी सिद्ध हो जानी थी मनमोहनी अर्थव्यवस्था

वरुण जायसवाल. 2007 से 2013 तक भारत की अर्थव्यवस्था में गाँवों में माँग में तीव्र उछाल बनी रही थी. इस उछाल ने सब कुछ सही होने का एक भ्रम पैदा किया था. दरअसल यह तेज़ी भ्रष्टाचार से पैदा हुए धन के रिसावट से उत्पन्न हुई थी.

इस उछाल ने भ्रष्टाचार के समर्थक आर्थिक विद्वानों को ऐसी माँग आधारित अर्थव्यवस्था रचने के लिए सोनिया एंड कम्पनी की तारीफ़ हेतु श्रृंखलाबद्ध जुमले जैसे ‘इंक्लूसिव डेवलपमेन्ट’, ‘आम आदमी का विकास’ उपलब्ध कराए.

इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था में दो प्रकार से तरलता में वृद्धि हुई. पहले प्रकार में डॉ मनमोहन सिंह कैबिनेट के ईमानदार प्रयासों से आई तरलता को रख सकते हैं. इसके अंतर्गत मनरेगा, कृषि जिंसों के समर्थन मूल्य में बढोत्तरी आदि प्रमुख कारण रहे. दूसरे प्रकार में किसान कर्ज़ माफी औऱ संस्थागत भ्रष्टाचार के पैसों के निवेश को रख सकते हैं.

आज की परिस्थितियों में भ्रष्टाचार समर्थक आर्थिक विद्वानों की टीम फ़िर से मनमोहनी अर्थव्यवस्था के गुण गाने लगी है और समाजवादी अनर्थव्यवस्था के सपनों में डूबी हुई जनता भ्रष्टाचार समर्थक विद्वानों के सुर में कुछ पल सुकून के ढूँढने में लगी हुई है.

हमें समझना होगा कि मनमोहनी अर्थव्यवस्था आखिर क्यों भारत राष्ट्र-राज्य के लिए अंततः अनर्थकारी सिद्ध हो जानी थी ….

1. 2007 से 2013 तक भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिर्फ़ माँग आधारित अर्थव्यवस्था बनी रही. इसका मूल फ़ायदा बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों तक सीमित था.. हिंदुस्तान यूनिलीवर, कोला कंपनियाँ, सिगरेट-तंबाकू की कंपनियां और ऑटोमोबाइल सेक्टर में आये उछाल को देख लें.

2. इस दौरान ग्रामीण श्रम मूल्य में जबरन बढोत्तरी का एक नया ट्रेंड देखने को मिला (प्रतिस्पर्धात्मक वृद्धि नहीं). जिसके कारण भारतीय गाँवों में कृषि एवं अन्य उत्पादक कार्यों हेतु दी जाने वाली मजदूरी की लागत इतनी बढ़ गई कि गाँवों से उत्पादन ठप करके उसे शहरों में शिफ़्ट करना अनिवार्य हो गया. शहरों में बड़े खिलाड़ी पहले से जमे हुए थे. अतः उन्होंने ऐसी प्रतिस्पर्धा की संभावनाएं भी खत्म कर दी थीं.

3. एक मोनोपॉली मार्केट सिस्टम का जन्म हुआ था जिसमें शहरी उत्पादकों की ग्रामीण उत्पादकों पर अनिवार्य श्रेष्ठता ही सुनिश्चित हो गई थी.

4. चूंकि अब शहर उत्पादक थे और ग्राम सिर्फ़ उपभोक्ता, अतः इस स्थिति से भयानक पूंजीगत असंतुलन कायम हुआ. शहरों में जमीनों की माँग में अति वृद्धि हुई जिसके कारण शहरों में पहले से रह रहे सामान्य आर्थिक स्थिति वाले लोगों के लिए ज़मीन खरीदना लगभग असंभव हो गया और वो ज़मीन मालिकों के शोषण पर निर्भर हो गए.

5. उत्पादन की गतिविधियां शहरों तक सीमित हो जाने के कारण ग्रामीण भारत से कुशल श्रमजीवियों का एकतरफा पलायन हुआ औऱ इससे शहरों पर असाधारण बोझ पड़ा… क्योंकि मनमोहन सरकार संस्थागत भ्रस्टाचार को स्वीकृति देती थी. अतः शहरों में कोई इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाये बिना सिर्फ़ माफियाराज (वोटबैंक मैनेजर्स) ही गाँवों से आये हुए लोगों को शोषण आधारित सुविधाएं उपलब्ध कराता था.

6. मनरेगा या कृषि जिंसों के मूल्य में बढोत्तरी से सिर्फ़ अकुशल श्रमजीवियों के पलायन में कमी आई थी. गाँवों की मूल माँग आधारित अर्थव्यवस्था तब भी मूलतः मनीऑर्डर या रेमिटेंस बेस्ड ही थी.

7. संस्थागत भ्रष्टाचार के कारण शहरी उत्पादकता के भी अवसर बहुत कम समय के लिए उपलब्ध थे क्योंकि इसमें भी आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर न होने के कारण मैन्युफैक्चरिंग अन्य विकासशील देशों की तरफ़ शिफ़्ट हो जानी थी, और होती चली भी गई.

8. शहरी उत्पादकता में आये इस शॉर्ट टर्म उछाल ने भारत के बैंकों को अनियंत्रित कर्ज़ बाँटने के लिए ललचाया जिसकी परिणति आज हम बेक़ाबू अनुत्पादक अस्तियों (NPAs) के रूप में देख रहे हैं. एनपीए समस्या के मूल में संस्थागत भ्रष्टाचार के बराबर ही शहरों से इस उत्पादन प्रक्रिया का अन्य विकासशील देशों में शिफ़्ट हो जाना है.

9. इस ओवर-रेटेड अर्थव्यवस्था की कलई मनमोहन सिंह के कार्यकाल के उत्तरार्द्ध में ही खुलने लगी थी. 2013 की शुरुआत से 2014 के मध्य तक के सभी आंकड़े इसे सिद्ध करते हैं.

10. मनमोहनी अर्थव्यवस्था से देश का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि कुशल श्रमजीवी अपनी ग्रामीण जड़ों से लंबे समय के लिए कट गए, और शहरों में तो उनके लिए सिर्फ़ शोषणतंत्र ही उपलब्ध है.

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