नवरात्रि पर विशेष : कन्या पूजन का महत्व

हमारे देश मे नवरात्र के समय के व्रत के उपरांत लोगों मे कन्या पूजन या कंजकों का महत्व अपना ही है. लोग इसे अष्टमी या नवमी तिथि को व्रत तोड़ कर करते थे. नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व पर मैं पहले भी अपने विचार प्रकट कर चुका हूँ. आज कुछ कन्या पूजन या कंजकों को समझने का प्रयास करें. इस कन्या पूजन से हमारे समाज मे नारी के पूजन विशेषतया छोटी बच्चियों का पूजन किया जाता था जिन्हें देवी का रूप माना जाता है.

अब पहले लोग नवरात्र के नौ या आठ दिनों का सात्विक अन्न भक्षण करके व्रत मनाते थे. अब समय बदल गया और बहुत से लोगों ने व्रत रखने तो बंद कर दिये. इस लेख में मैं उन्हीं लोगों से विशेषतया एक विचार साझा कर रहा हूँ. जब यह व्रत इत्यादि प्रारम्भ हुए थे आदिकाल में तो समाज सक्षम था अर्थात अधिकांश लोगों के पास भर पेट भोजन था, संयुक्त परिवार होते थे और आपको परिवार में ही कन्याएँ होती थीं. और फिर उन कन्याओं का पूजन किया जाता था. तब नारी पूजन की यह एक झलक थी कि हमारे समाज में नारी या स्त्री का विशिष्ट स्थान है.

अब समय बदल चुका है अब जो लोग व्रत मात्र एक या दो दिन के रखते हैं और बहुत लोग तो रखते भी नहीं पर अब वह लोग पूजन करते हैं तो अष्टमी या रामनवमी के दिन कन्याओं को बुला कर पूजा जाता है. अब एकल परिवार होने के नाते कन्याएँ घर परिवारों में ही अधिक नहीं है तो लोग अपने आसपास के तनिक निर्धन परिवारों की कन्याओं को भोजन करवा कर अपने धर्म का पालन करते हैं. उन्हे किंचित यह विचार भी आता है कि इसी बहाने हम निर्धनों को भोजन करके समाज में दान के रूप में कुछ दे रहे हैं. यह विचार अति उत्तम है और मैं इसका स्वागत करता हूँ. इसी प्रकार कुछ मंदिरों में और सामाजिक संस्थान भी नवमी या अष्टमी को निर्धन लोगों के लिए भंडारा करते हैं और उन्हें भोजन करवाते हैं. लगभग सभी लोगों का कन्या पूजन में पूरी, काले चने और हलवा का प्रसाद होता हैं और भंडारों में पूरी आलू और कद्दू का प्रसाद तैयार किया जाता है. अन्न का दान हमारी मान्यता और संस्कृति में बहुत महान है.

परंतु आइये समझें इससे क्या हो रहा है ? अब कई परिवार मैं, अपने इलाके से सोचूँ तो लगभग 15 से 20 परिवारों में एक ही समूह की कन्याएँ घूमती रहती हैं. अब आप कल्पना करें कि यह बच्चे इतना भोजन तो कर नहीं सकते, सब घर पर ले जाएंगी. अब वह परिवार इसी भोजन को अगले दो या तीन दिन खाएगा या फिर यही भोजन कहीं फेंक दिया जाएगा. यदि तीन दिनों तक यही भोजन खाये तो उनके स्वस्थ्य के लिए उपयुक्त नहीं है और यदि भोजन कहीं फेंका जाता है तो भोजन का निरादर हुआ वह अलग और जिस देश में करोड़ों लोगों के पास भोजन नहीं है उनके लिए आपने यदि राष्ट्र द्रोह शब्द का उपयोग नहीं भी किया जाये तो भी अच्छा नहीं किया गया. इससे कम से कम मेरी व्यक्तिगत राय में अष्टमी या राम नवमी का भंडारा एक प्रकार से बेहतर है कि उस भोजन में कम से कम अपव्यय नहीं होता है. परंतु फिर भी एक बात तो हैं एक ही दिन आप सब उन लोगों को भोजन करवाते हैं.

इसी का एक और रूप श्राद्ध के दौरान देखने को मिलता है. लोग एक पंडित जी को भोजन करवाना अपना कर्म समझते हैं. कोई गलत नहीं यदि आपका धर्म ऐसा करने को कहता है. (इस पर मैं कोई विवाद नही कहता क्योंकि यह आस्था का प्रश्न है) परंतु मात्र उसी समय सबको भोजन करवाना है. अब वह पंडित जी भी उसी समय के दौरान इतना भोजन कैसे करेंगे? उनके स्वास्थ्य पर इसका दुष्प्रभाव भी पड़ सकता है.

इसके लिए मेरी मात्र व्यक्तिगत राय है कि ऐसा क्यों न किया जाये कि नवरात्र के दिनों में यदि आपको भोजन करवाना ही है और उन लोगों से विशेष जिन्होने व्रत सम्पूर्ण नहीं रखे हैं (क्योंकि फिर आपकी आस्था है) क्यों न आसपास के लोग मिल कर दिन बाँट लें. कोई पंचमी को खिलाये, कोई तृतीय को और कोई सप्तमी को करवा दे. इसी प्रकार भंडारे पर भी सोच सकते हैं. और यही श्राद्ध पर. सर्वनियन्ता, ईश्वर, मां जगदम्बे कहिए, ने सब दिन एक से बनाए हैं कभी भी किसी को भजन करवाएँ यदि आपके कर्म में सात्विक्ता है तो उस परम पिता का आशीर्वाद आपको अवश्य मिलेगा. दूसरे जिन्हे भी आप भोजन करवाएँ उन्हे कभी भी निर्धनता का एहसास न करवाएँ. हमारी संस्कृति के अनुसार यदि आपको दान का अवसर मिलता तो देने वाला भी कृतज्ञता का नुभाव करे कि मुकजे अपनी संपत्ति के सदुयोग का अवसर प्राप्त हुआ है. इसलिए दान देने वाल भी कृतज्ञता अनुभव करे और देने वाला भी.

इसके अतिरिक्त आप समाज सेवी द्वारा संचालित दादी की रसोइ को देखें. जिसमें लोग आकर उत्साह वर्धन भी करते हैं परंतु वहाँ पर भोजन बिना किसी को निर्धनता का एहसास करवा के न्यूनतम मूल्य पर भोजन करवाया जाता है. इसमें सबसे बड़ी बात है न तो देने वाले को अभिमान हैं और ही लेने वाले में हीं भावना. कुछ समय के लिए प्रयोगात्मक रूप से शुरू की गयी इस रसोई, अब अनवरत रूप से दो वर्षों से अधिक समय से चल रही है.

इस पूरे लेख का अर्थ किसी की धार्मिक भावना को आहात करना नहीं है. किसी की यदि आहत हो तो क्षमा चाहता हूँ. इसी प्रकार यदि और पौष्टिक भोजन या उनके काम की कोई और वस्तु आपको लगे उसे उफार स्वरूप दें. मेरे यहाँ कुछ बहनों को प्लास्टिक के डब्बों मे भोजन देने का विचार बनाता है. मैं उस भावना का स्वागत करते हुए कह रहा हूँ कि एक तरफ तो पर्यावरण का प्रश्न है दूसरे आपका धन मात्र कुछ दिनों तक काम आएगा

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