जीवन से संवाद : ये भोग भी एक तपस्या है, तुम त्याग के मारे क्या जानो

ma jivan shaifaly poem

मैं… ये मैं ही थी जिसके लिए चेहरे की सुन्दरता और देह की सुडौलता ही मायने रखती थी…. बिना काजल, बिंदी, लिपस्टिक के घर से नहीं निकलती थी… सौन्दर्य प्रतियोगिता, टीवी कार्यक्रम, रंगमंच… क्या-क्या नहीं किया इस जीवन में उस तलाश के पीछे लेकिन जो तलाश रही थी वो उस राह पर था ही नहीं, तो संतुष्टि कैसे मिलती….

प्रेम की तलाश और प्यास इतनी उत्कंठ कि दोस्तों से पूछती थी… तुमसे प्यार कर लूं? लेकिन प्यार कोई करने की वस्तु है??? नहीं…. जानती भी थी… लेकिन क्या करूं, कहाँ जाऊं, कोई तो, कुछ तो ऐसा मिल जाए जहां मेरी प्यास…. मेरी तलाश फना हो जाए….

फिर ऊपर से सामाजिक बंधन और दुनियावी रिश्ते…. क्या इतना आसान होता है इस जन्म के रिश्तों को छोड़ पिछले जन्मों के धागे से जुड़ना? इतने लांछन सहना कि जो इस जन्म के रिश्ते नहीं निभा सकी वो पिछले जन्मों की बात करती है?

मेरा पूरा जीवन ही उस तलाश का फल है, जो न जाने कितने जन्मों से मैं कर रही थी… अपने जीवन की कहानी की मैं एक रहस्यमयी नायिका हूँ, लेकिन व्यक्तित्व के इस रूपांतरण की प्रक्रिया आसान नहीं थी …. सब कुछ मिलता है जब आप सबकुछ छोड़ देने के लिए तैयार हो जाते हो…. ऊपर वाला पूरी-पूरी परीक्षा लेता है…. इस नायिका की तलाश और तड़प, मरने तक की कगार पर पहुँच चुकी तब नायक का जीवन में आविर्भाव हुआ, तब मेरे जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ…

मैं जानती थी दुनियावी रिश्तों में जीने वालों को कायनाती रिश्ते स्वाकार्य नहीं होते….. तो मैंने यह रहस्य छुपा लिया… लेकिन मैं इतनी सराबोर थी कायनात के इस आशीर्वाद से कि मेरे शब्दों में, मेरी कविताओं में, कहानियों में यह रहस्य रिस-रिस कर बहने लगा….

इस जन्म के सभी रिश्ते छूट गए… अज्ञातवास जीया मैंने 5 साल तक…. जादुई दुनिया के गर्भ में छुपी रही… क्योंकि सारे रिश्ते छोड़ते हुए मैंने कायनात के सामने एक शर्त रख दी थी… कि तुम्हारी दुनिया चाहे कितनी भी रहस्यमयी हो, कितनी भी गहरी हो, कितने भी जादू दिखा दो… लेकिन उन सबसे ऊपर है गर्भनाल से जुड़ा रिश्ता…. उसके बिना मैं तो कुछ भी नहीं…..

इस जन्म के खोए रिश्तों के बिना मुझे ये जादुई दुनिया स्वीकार नहीं, तब जाकर मुझे 7 साल की और तपस्या का श्राप मिला… पिछले जन्मों के रिश्तों के साथ मुझे इस जन्म के सारे रिश्ते चाहिए थे तो मुझे 7 साल की प्रतीक्षा को स्वीकार करना पड़ा…. सात साल पूरे हो चुके हैं और मैं अपनी झोली फैलाए कायनात के सामने खड़ी हूँ कि कब वो मेरी झोली में इस जन्म की मेरी ज़िंदगी डाल दे…

तो मेरा अतीत, वर्तमान, सबकुछ छूट गया तब पकड़ में आए पिछले जन्म के धागे….. एक आशीर्वाद नायक के रूप में…. उसने सुनाए पिछले जन्म के वो सारे किस्से और अपनी आँखों के सामने मैंने इस सामान्य-सी दिखने वाली दुनिया को जादुई होते देखा…

बकौल नायक स्वामी ध्यान विनय – “एक भीषण युद्ध लड़ने जा रहे हैं हम और सामने अपने ही लोग खड़े हैं, जिनके खिलाफ जाकर हमें उन्हीं के लिए संभावनाओं के नए रास्ते खोलना है… हो सकता है वो सारे लोग इस समय हमारे विरोध में खड़े हो लेकिन इस कहानी के अंत में सब लोग हमारे साथ होंगे… वसुधैव कुटुम्बकम.

मुझे नायक जितना ज्ञान तो नहीं लेकिन फिर भी इतना जानती हूँ कि पिछले जन्मों के धागे पकड़ने के लिए ध्यान की गहराइयों में उतरना होता है…. कुछ अतीन्द्रिय शक्तियों को प्राप्त करना होता है… मैं तो अभी नौसिखिया हूँ….. बस जादू दिखाई देता है… जादू करना नहीं आता अभी मुझे नायक की तरह…

आज तक जीवन को सिर्फ भोग की वस्तु समझ कर जीती रही… लेकिन ध्यान बाबा कहते हैं… भोग का दूसरा अर्थ जानती हो ना आप? हम ईश्वर की पूजा करते समय भोग का प्रसाद चढ़ाते हैं. तो जब हम इस भोग को भी प्रसाद समझकर ईश्वर के चरणों में अर्पित करना शुरू कर देते हैं उस दिन ये भोग भी तपस्या हो जाता है, जो हम अपने स्वार्थ के लिए नहीं दूसरों के हित के लिए, उनकी पीड़ा को दूर करने के लिए अर्पित करते हैं. मैं तो प्रार्थना पूजा करता नहीं, आप करती हैं तो ये “भी” एक मार्ग है.

ईश्वर की ओर जाने के लिए सारे मार्ग खुले हैं. आप जिस मार्ग से जाना चाहे जा सकते हैं, चाहे लेखन हो, नृत्य हो, संगीत हो, पूजा हो, जीवन के सारे रास्ते उसकी ओर ही जाते हैं. आपको अपना मार्ग खुद चुनना है और गौर से देखेंगी तो आपको आपके “स्व”भाव के अनुसार उसी मार्ग पर रखा गया है… आवश्यक नहीं कि मैं जिस मार्ग पर हूँ आप भी उसी मार्ग पर चलें.

उनका यह कहना हुआ और उधर मुरारी बापू ने टीवी पर प्रवचन देते हुए हामी भरी… “नृत्य की नक़ल हो सकती है कृत्य की नहीं. साधना में आप किसी की नक़ल नहीं कर सकते, प्रेरणा पा सकते हैं, और फिर हँसते हुए कहते हैं मेरे मार्ग पर चलोगे तो मेरी तरह सर मुंडवाना पड़ेगा.”

लेकिन इन सब के पीछे जो मुख्य वस्तु काम करती है वो है “ध्यान”. और आपको अपने स्वभाव के अनुसार ही ध्यान विधि चुनना होगी. चाहे योग से या भोग से ईश्वर तक पहुंचना ही मुख्य उद्देश्य है. मन पर जबरदस्ती संयम रखकर आप कोई भी वस्तु त्याग सकते हैं. लेकिन संयम सध न सका तो उस पर लौटकर आना अधिक पीडादायी है. इसलिए त्याग को अवतरित होने दीजिये. और आपका तो नाम ही “जीवन” है. इसलिए जीवन के सारे आयामों से गुज़रना ही आपकी नियति है. और इन आयामों से गुज़रकर जो आप पाएंगी वैसा जीवन हर किसी को नसीब नहीं होता, आप खुशकिस्मत है आप चुनी गईं जीवन की पीड़ा के लिए ताकि प्रेम का वास्तविक स्वरूप पा सके.

मित्रता ईश्वर के दूत से

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