जीवन के रंगमंच से : मज़दूर की मज़दूरी और सर्वोच्च न्याय

मजदूर की मजदूरी में कश्यप किशोर मिश्र कहते हैं – “आज न जाने क्यों, एक ऐसी कहानी सुनाने का जी कर रहा है, जिसका मुझसे कोई संबंध नहीं. यह मेरी कहानी नहीं है, पर न जाने कब, न जाने कैसे बहते बहते मेरे जीवन के किसी घाट पर आ लगी यह कहानी, मुझे अपनी कहानी … Continue reading जीवन के रंगमंच से : मज़दूर की मज़दूरी और सर्वोच्च न्याय