जीवन के रंगमंच से : मज़दूर की मज़दूरी और सर्वोच्च न्याय

Ma Jivan Shaifaly human brain nervous system Making india

मजदूर की मजदूरी में कश्यप किशोर मिश्र कहते हैं – “आज न जाने क्यों, एक ऐसी कहानी सुनाने का जी कर रहा है, जिसका मुझसे कोई संबंध नहीं. यह मेरी कहानी नहीं है, पर न जाने कब, न जाने कैसे बहते बहते मेरे जीवन के किसी घाट पर आ लगी यह कहानी, मुझे अपनी कहानी लगती है, लिहाजा इसे मेरी ही कहानी मान सुना जा सकता है.”

और मैं कहती हूँ अब मैं जो कहानी सुनाने जा रही हूँ वो मेरी अपनी कहानी है, वास्तविक कहानी, लेकिन इस कहानी के घाट पर आकर आप में से बहुत सो को लगेगा अरे ये तो मेरी ही कहानी है…

बात करीब 16- 17 साल पुरानी है, घर में उन दिनों पैसा सिर्फ सासुमा की सरकारी नौकरी से आता था, मात्र 3000 रुपये महीना, जिसमें 1000 रुपये घर के किराए में चला जाता था, 500 रुपये बिजली पानी में, 1500 रुपये में हमें घर चलाना होता था, हफ्ते में तीन दिन सब्जी बनती थी बाकी दिन दाल चावल से काम चलाना पड़ता था… उन्हीं दिनों सीख लिया था कि कम तेल मसाले में खाना कैसे बनाया जाता है जो आज काम आ रहा है जब स्वास्थ्य की दृष्टि से या सात्विक भोजन की दृष्टि से कम तेल मसाले वाला भोजन पकाना होता है… जीवन इसे ही कहते हैं जो चीज़ किसी ज़माने में मजबूरी होती हैं वो समय बदलते अनुशासन हो जाती है…

उस समय बड़ी बेटी गर्भ में थी, गर्भकाल के दौरान वैसे भी खाने की तलब बढ़ जाती है… वो भी हम इन्दौरी लोग… चटपटा और नमकीन खाने के शौक़ीन, और उन दिनों 5 रुपये की सेंव खरीदने के लिए भी दस बार सोचना पड़ता था… मैं जो पिता के घर में नॉन-वेज खाने की शौक़ीन और यहाँ दाल रोटी में भी काम चला लिया… अपनी मर्ज़ी से शादी की है इतना तो करना ही था मुझे….

लेकिन घर की खराब आर्थिक स्थिति से उबरने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा ये सोचकर घर के बाहर एक बोर्ड लगा दिया… यहाँ सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, मेहंदी, क्ले वर्क सबकुछ सिखाया जाता है…. मेरी तरकीब देखो और उससे अधिक आत्म विश्वास कि जो भी सीखने आएगा उसको भी कौन सा आता होगा. मुझे जो भी टूटा-फूटा आता है वो सिखाते सिखाते खुद भी सीख ही जाऊंगी…

दो-चार लोग सीखने आए… 100-150 रुपये महीना में मैं उन्हें वो सब सिखाने लगी जो मुझे भी ठीक से नहीं आता था… साथ में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी तो 500-1000 रुपये वो मिल जाते थे. थोड़े पैसे इकट्ठे कर 4500 रुपये में एक 486 कम्प्युटर खरीद लिया, शादी से पहले कम्प्युटर सीखा हुआ था तो वो काम आ गया… जिस जगह हम रहते थे वहां कम्प्युटर सीखने के लिए एकदम से कोई राजी नहीं हुआ तो 50 रुपये महिना के हिसाब से गरीब लड़कियों को कम्प्युटर सिखाने लगी… एक कम्प्युटर पर 3 से 5 लड़कियों को बिठाकर महीने के 250-300 रुपये वो कमा लेती….

दूसरी बेटी के गर्भ में आने के बाद ये मकान मेरे कहने पर छोड़ दिया क्योंकि हम यहाँ किराए से थे और शहर के दूसरे कोने में दो कमरे का अपना खुद का मकान था…. हालांकि वो इतना छोटा था कि सासुमा की बरसों की जमी जमाई गृहस्थी का पूरा सामान भी उसमें न आ पाता लेकिन मेरा बस यही सोचना था कि छोटा है तो क्या हुआ वहां रहकर हम किराए के 1000 रुपये और बचा सकेंगे…

बड़ी बेटी पौने दो साल की थी और छोटी गर्भ में … हम अपने मकान में चले गए… थोड़े दिन बेटी के पिता पुराने घर पर जमी कम्प्युटर क्लास संभालते रहे लेकिन वो बहुत दूर पड़ता था सो वो भी बंद… उन्होंने नए घर के पास में एक स्कूल में नौकरी कर ली.

छोटी बेटी के जन्म के बाद भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी तो सवा महीने की छोटी बेटी को सासुमा के पास छोड़कर उसी पुराने कम्प्युटर इंस्टिट्यूट में नौकरी कर ली जहां से शादी से पहले कम्प्युटर सीखा था…

कम्प्युटर इंस्टिट्यूट के मालिक मेरे भैया के मित्र थे, और जानते थे कि मैं कम्प्युटर से सम्बंधित कोई भी चीज़ सुबह सीखकर शाम को उसी चीज़ को दूसरों को सीखा सकती हूँ…
उन्होंने 8 हज़ार देने का वादा किया… उस ज़माने में वो 8000 मेरे लिए अस्सी हज़ार से कम न थे….

मुझे आज भी याद है…. नौकरी करते हुए ऑफिस के खाली समय में मैं घर के सारे खर्चे निकाल लेने के बाद मेरे हाथ में जेब खर्च के कितने रुपये बचने वाले हैं इसका हिसाब निकालकर मैंने उन वस्तुओं की लिस्ट बनाई… उस लिस्ट में बच्चों के नए जूते, घर की छोटी मोटी ज़रूरतों की चीज़ों के साथ लिखा था अपने लिए काजल, बिंदी, आई लाइनर और लिपस्टिक…. चेहरे को लीपने पोतने का शौक उन दिनों अपने उरूज़ पर था… जिसे मैंने आर्थिक स्थिति के चलते दबा दिया था… और वही लिपा पुता मेरा अपना चेहरा आज मुझे भूतहा लगता है… एक बार फिर साबित हुआ कि मजबूरी समय बदलते ही अपना रूप बदल लेती है…

खैर, मैं बहुत खुश थी… चलो घर की स्थिति कुछ तो मजबूत होगी… क्या हुआ जो सवा महीने की मेरी बेटी कुछ दिन मेरे दूध से महरूम रहकर ऊपर का दूध पी रही है… तो क्या हुआ इस बीच माँ की दूध भरी और सुरक्षित छाती से दूर उसे अंगूठा चूसने की आदत हो गयी है… तो क्या हुआ मुझे अपनी छाती से रीसते दूध से कपड़े खराब होने से रोकने के लिए ब्रा में पैड्स लगाना पड़ते थे…

मैं फिर भी खुश थी शाम को घर पहुँचते ही उसे छाती से लगा लेती थी… दिन भर रुके दूध के कारण दूध पिलाते हुए दर्द से कराह उठाती थी… लेकिन फिर भी सब ठीक था…

हमारे देश में एक सुशील कुशल गृहणी ऐसी ही होती है…वो मैं थी… और फिर सबसे बड़ी बात जो मैं जानती थी वो यह कि अपनी मर्ज़ी से शादी की है तो इतना तो करना ही पड़ेगा…

तीन साल में दो बेटियाँ और दूसरी बेटी के जन्म के सवा महीने बाद की गयी नौकरी ने शरीर को बुरी तरह तोड़ कर रख दिया था…. ऊपर से सुबह शाम के घर के काम और किसी काम के न कर पाने के कारण सासुमा का व्यवहार जो हर घर के लिए बहुत आम बात होती है….. लेकिन घर के लिए मुझे ये सब करना था…. अपनी दोनों बेटियों की अच्छी परवरिश के लिए मुझे ये सब करना था…

कम्प्युटर इंस्टिट्यूट में शाम को मेरी बेटियों के पिता लेने आते थे, एक दिन मैं क्लास ले रही थी वो कांच के केबिन से बनी मेरी क्लास के बाहर बैठे मेरा इंतज़ार कर रहे थे… मैंने इशारे से उन्हें थोड़ी देर रुकने को कहा और क्लास लेने लगी… थोड़ी देर बाद मुड़कर देखा तो वो वहां नहीं थे, मैं क्लास निपटा कर बाहर आई तो वो गुस्से में बाहर खड़े थे, मैंने उनके चेहरे के भाव पढ़कर पूछा क्या हुआ? यहाँ क्यों खड़े हो? कहने लगे तुझे ज़रा सा भी होश नहीं… पढ़ते हुए तेरे पाँव स्टूडेंट्स के पाँव से टच थे… मुझे तो देखकर ही शर्म आ रही थी… इसलिए चला आया…

उस दिन मैंने पहली बार जाना चरित्र पर लांछन लगना क्या होता है…. मुझे लगा उन्हें कुछ गलतफहमी हुई है तो प्यार से समझाया अरे वो बच्चे जैसे हैं मेरे.. ग्यारहवीं… बारहवीं के स्टूडेंट्स हैं… लेकिन वो नहीं समझे… उस दिन रिश्ते में, चाहे छोटी सी ही सही लेकिन पहली दरार पड़ चुकी थी…

खैर, ये सब झेलने के बाद भी मैंने नौकरी चालू रखी, कम्प्युटर इंस्टिट्यूट में जब दो महीने बाद भी सैलरी नहीं मिली तो मैं बॉस के केबिन में गयी… उन्होंने 1400 रुपये का चेक पकड़ा दिया….

मैं अचंभित सी देखती रही…. जो कारण उन्होंने बताया वो यह कि मैं पूरी सैलरी दूंगा जब उतने स्टूडेंट्स आएँगे कि आपकी सैलरी निकाल सकूं…

मैंने पूछा और स्टूडेंट्स नहीं आए तो?
वो बात गोल गोल घुमाते रहे…. लेकिन पैसे नहीं दिए… मैं 1400 रुपये का चेक पकड़े जब घर आ गयी, फिर उस जगह नहीं गयी. बल्कि फिर पांच साल तक मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं छोटी-छोटी बेटियों को छोड़कर काम पर जाऊं…

दो महीने की 16 हज़ार की नौकरी के बदले सिर्फ 1400 रुपये हाथ में थे, और साथ में वो लिस्ट जो मैंने छोटी छोटी सी चीज़ों की बनाई थी…. फिर बहुत सालों तक उस लिस्ट को मैं संभाले रही…. एक सबक के तौर पर… ज़िंदगी के सबक के तौर पर…

फिर जीवन में आगमन हुआ स्वामी ध्यान विनय का, एक फ़कीराना जीवन भी कितना समृद्ध हो सकता है ये जाना. फिर भी किस्मत में अभी उपरोक्त तज़ुर्बे का दोहराना आवश्यक था. इस बार कारण उसके प्रभाव को दूसरे नज़रिए से देखने के लिए नियत था. तो 16-17 साल बाद यानी दो साल पहले फिर वैसी ही घटना घटी, जिस ऑनलाइन अखबार में फीचर एडिटर थी उन्होंने हाथ खड़े कर दिए… अब सैलरी नहीं देंगे हम आपको…. समय के अनुरूप रकम में ज़्यादा फर्क नहीं है वो 16 हज़ार थे, ये 50 हज़ार… लेकिन कहा न समय के साथ मजबूरी भी अपना रूप बदल लेती है…

पहला अनुभव जीवन में भौतिक समृद्धता का महत्त्व सिखा गया, दूसरा अनुभव आत्मिक समृद्धता सिखा गया. आज मैं हंसकर कहती हूँ…. जो मेरी किस्मत में नहीं है उसके लिए मैं कितना ही लड़ झगड़ लूं, वो मेरे हाथ में नहीं आएगा… और जो मेरी किस्मत में है उसे दुनिया कितना भी छिनने की कोशिश करें वो मुझसे कोई नहीं छीन सकता… फिर चाहे पैसा हो या रिश्ते.

लोग अक्सर कहते हैं बेटियों के हक़ के लिए क़ानून का सहारा लूं. मैं कहती हूँ. वो पिता हैं, हक़ तो उनका भी बनता है. और फिर मैंने कभी सामाजिक व्यवस्था के लिए बने क़ानून का सहारा नहीं लिया. मेरा न्याय वो ऊपर बैठा कर रहा है. क़ानून का सहारा लेकर बेटियाँ तो पा सकती थी, उनका प्रेम नहीं. जब ऊपर वाले का न्याय पूरा हो जाएगा तब बेटियाँ भी पा लूंगी और उनका प्रेम भी.

लेकिन कश्यप जी की तरह मैं भी यही दुआ करती हूँ – किसी को कुछ मिले न मिले, पर एक मजदूर को उसकी मजदूरी ज़रूर मिले… और हर माँ को उनकी बिछड़ी बेटियाँ.

जीवन के रंगमंच से अन्य लेख पढने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें

Ma Jivan Shaifaly

जीवन पुनर्जन्म-1 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए

Modi Faqir
रे फकीरा मान जा…

रे फकीरा मान जा….

kali mata with ma jivan shaifaly

काली काली अमावस की रात में लिरिक्स
काली काली अमावस की रात में लिरिक्स इन हिंदी

 

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY