ओशो पर लिखना खतरे से खाली नहीं

पिछले कुछ समय से रोज ओशो को सुन रहा हूँ. कम से कम रोज सुबह-शाम एक एक घंटा, ड्राइविंग टाइम का सदुपयोग करता हूँ. ओशो इतने बहुआयामी व्यक्ति हैं कि महीने भर में उनकी विशेषज्ञता का भ्रम नहीं पाल रहा हूँ. पर उनकी सोच का ड्रिफ्ट क्या है, वह कुछ कुछ समझ में आ रहा है.

संयोग से इसी बीच फेसबुक पर ओशो पर एक बहस दिखाई दी. उसमें कुछ लोगों ने ओशो को दुष्टात्मा, पापात्मा, हिन्दू समाज का पथभ्रष्टा, शंकराचार्य का शत्रु… सब कह दिया… तो मेरी उत्सुकता कुछ और बढ़ गई… कि आखिर विद्वजन इन निष्कर्षों पर कैसे पहुंचे…

ओशो पथप्रदर्शक नहीं थे… दावा भी नहीं किया. बल्कि एक चेतावनी ही दी कि आपको कोई दूसरा पथ नहीं बता सकता. पाथेय दे सकता है, यात्रा पर विदा कर सकता है… पर ईश्वर दूसरों के खोजे बताये पथों पर नहीं मिलते… उन्होंने बुद्ध को बार बार उद्धृत जरूर किया है – अपदीपो भवः… अपने दीपक खुद बनो…

ओशो की कई बातें चमत्कारिक लगीं, तो कुछेक बातें बकवास भी लगीं. खास तौर पर जब वो विज्ञान की दुहाई देते हैं, और अध्यात्म को विज्ञान सम्मत बनाने की कोशिश करते हैं तो बड़े छिछले सुनाई देते हैं. कोई भी आध्यात्मिक व्यक्ति जब विज्ञान से पनाह माँगता दिखता है तो बड़ा ही दयनीय लगता है.
पर ओशो सहमत होने के लिए नहीं बने, फॉलो करने की चीज नहीं हैं… सुने, पढ़ें, कुछ अटक गया तो ठीक है नहीं तो बह जाने दें. जो अच्छा लगे, रख लें… बहुत कुछ अच्छा या सही नहीं भी लगेगा… उसे जाने दें…

ओशो पर लिखना खतरे से खाली नहीं है. आदमी ज्ञानी होने की गफलत पाल लेता है.. ओशो ज्ञान का भ्रम देते हैं… पर ज्ञान भ्रम ही है… ओशो के भ्रम इस वैधानिक चेतावनी के साथ आते हैं कि यह ज्ञान नहीं, भ्रम ही है… समस्या ओशो में नहीं है. समस्या उनमें है जिन्हें एक गुरु चाहिए, एक ट्यूशन मास्टर चाहिए जो पूरा पूरा सिलेबस कवर कर दे. सारे सवालों के जवाब रटा दे. एक ऐसा व्यक्तित्व चाहिए जिसे सुनने पर अपना विवेक न लगाना पड़े… बन्दे ने सही कहा या गलत, यह सोचने की दुविधा ना हो. लोगों को कही हुई बातों से भी मतलब नहीं है… बस व्यक्ति पूजा से मतलब है…

ओशो का कहा कविता है, संगीत है… शास्त्रसम्मत कितना है पता नहीं, क्योंकि शास्त्र तो मैंने पढ़ा नहीं. पर कविता का क्या सही और गलत. कविता मधुर होती है, सुंदर होती है… सही होने नहीं होने से परिभाषित नहीं हो सकती. ओशो को सुनना बारिश में भीगने जैसा है. आप बाल्टी लेकर भरने पहुंचे हैं तो किसी नलके से भर लें. बादल से उतना ही मिलेगा जितना तन और कपड़ों को गीला कर जाएगा. जिसने ज्यादा बुद्धि लगाई, समझो बरसाती पहन कर गया… सूखा सूखा ही लौटेगा…

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