अखंड भारत से बाहर नहीं जा पाई ताजियेदारी, शुरू करने वाले तैमूर लंग के मुल्क में भी नहीं

अभी कुछ दिन से घर आते-जाते मालकिन कुछ कहना चाह-चाह कर रह जा रही थी. मैंने सोचा भी कि पूछूं क्या बात है लेकिन भूल जाता… पर आज मालकिन ने वो बात कह ही दी.

बड़े अचरज की बात थी कि हर समय चंडी-मोड में फिक्स रहने वाली मालकिन बड़ी सहमी और रिरियाती सी आवाज में बोल रही थी, “चिल्लाऔगे तौ ना? बात तौ तुमारे गुस्सा की ई ऐ, पर जा समय रोक लियों….”

‘बोल….’
“एक मिर्च बनवा कै ला दो”
‘एक मिर्च ! बनबा कै !! का मतलब?’
“हाँ एक चांदी की मिर्च बनबा कै ला दो… झंडी निकलंगी… पिछली साल कौ कर्ज उतारनौ ऐ”.

अब मामला समझ में आ गया था… अंदर से गुस्से का उबाल बाहर निकल कर फटने को हो रहा था… लेकिन मालकिन ने पहले ही रिरिया कर गुस्सा ना होने का आदेश दे रखा था… आदेश ही था क्योंकि इधर मेरा गुस्सा फूटता उधर उसका चंडी-मोड रिस्टोर हो जाता…

मामला यूं था कि पिछले मोहर्रम पर मालकिन ने अपनी किसी मनौती के लिए मोहर्रम की अलम से सजावट वाली हरी मिर्च तोड़ के रख ली होगी… ताजिये के जलूस में अलम पर लटकती चीजों को तोड़ कर ताजिये के नीचे से निकल कर मनौती मांगने की परंपरा है.

क्यों? कुछ आश्चर्य हो रहा है ना… ये कैसी परंपरा… बिलकुल हिन्दू पूजा वाली जैसी?

लेकिन एक आश्चर्य ये भी हो सकता है कि जब मालूम पड़े कि दुनिया के 56 मुस्लिम और अन्य मुस्लिम आबादी वाले देशों में केवल भारत, पाकिस्तान, बंगला देश और म्यांमार में ही ताजिये निकाले जाते हैं.

इस्लाम जगत की सबसे बड़ी हिप्पोक्रेसी है भारतीय उप महाद्वीप के मुसलमानों की ये ताजियेदारी… भारत में ही पैदा हुई ये परंपरा अखंड भारत से बाहर नहीं जा पायी… यहाँ तक कि भारत में ताजियेदारी शुरू करने वाले तैमूर के उज्बेकिस्तान और तजाकिस्तान में भी नहीं.

1398 में भारत को लूटने आया तैमूर लंग, यहाँ आने से पहले हर मोहर्रम माह में इराक स्थित कर्बला में बनी हुसैन साहब की कब्र पर जाता था… लेकिन भारत से जब वह कर्बला नहीं जा पाया तो यहाँ उसके सामने कर्बला में बनी हुसैन साहब की कब्र की प्रतिकृति बना कर पेश की गयी… तैमूर ने उस प्रतिकृति के सामने ही अपना फातिहा पढ़ कर 800 वर्ष पहले इस्लाम से खारिज मूर्ति पूजा को पुनर्जीवित कर लिया.

मोहर्रम नाम का कोई ना तो त्यौहार है, ना पर्व… ये मुस्लिम कलैंडर का पहला महिना है… इस महीने में ही उनके नबी ‘नूह’ की किश्ती किनारे आकर जमीन से लगी थी. और इसी महीने की दसवीं को इराक के आततायी बादशाह यजीद ने मोहम्मद साहब के प्रिय नवासे और उनके चौथे उत्तराधिकारी हुसैन साहब को उनके भूखे प्यासे 72 परिजनों सहित युद्ध में शहीद कर दिया था.

इन्हीं कारणों से मुसलमान इस महीने को पवित्र मानते हैं. इनकी मान्यता है कि इस महीने का एक रोजा कई-कई रोजों का फल देता है… हुसैन साहब की शहादत के बाद से पहले दस दिन आशुरा के नाम से विशेष पवित्र माने जाने लगे.

पूरे इस्लाम जगत में भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़ मुसलमान इस दौरान रोजे रखते हैं और हुसैन साहब को याद करते हैं… लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में यह मौका दुर्गापूजा या गणेश महोत्सव जैसा ही होता है.

दुर्गा माँ और गणेश जी की प्रतिमाओं की तरह इनके ताजिये बन कर रखे जाते हैं… ताजिये तो हुसैन साहब की कब्र की प्रतिकृति है लेकिन बुर्राख तो मोहम्मद साहब की बेटी, हुसैन साहब की माँ ‘आमना’ की प्रतिमा ही होती है.

हमारे यहाँ फल, फूल, अभ्रक, सितारे आदि से हमारे गणेश और दुर्गा प्रतिमा और पंडाल सजाये जाते हैं, वैसे ही इनके ताजिये सजा कर रखे जाते हैं. हमारे यहाँ धूप बत्ती, तो इनके यहाँ सारा माहौल अगरबत्ती और लोबान से महकता है.

हमारे यहाँ नए और धुले साफ कपड़े, तो इनके यहाँ भी ऐसे ही धुले कपड़े और नहाना धोना… हमारे यहाँ व्रत उपवास, तो इनके यहाँ भी रोजा… और हमारे यहाँ अपनी मनौती मांग कर प्रसाद आदि का वादा, तो ताजिये और अलम के सामने मन्नत यहाँ भी मांगना.

हमारे यहाँ दुर्गा और गणेश जी आदि के भक्ति भजन आदि तो इनके यहाँ भक्ति पूर्ण मरसियों का गायन… हमारे यहाँ कानफोडू डैक, मदिरा में मस्त ढोल बजाते नाचते मतवाले …… तो इनके गम के मौके पर भी कानफोडू डैक और ढोल फाड़ते शराब में धुत लौंडे.

हमारे यहाँ जयकारे, तो इनके यहाँ नारे… यहाँ हाथ उठा कर ‘जय जगदम्बे, गणपती बप्पा मोरैया’, तो इनके यहाँ छाती पीट-पीट कर ‘हाय हुसैन हम ना हुये’

ढ़ोल नगाड़े हमारे यहाँ, तो इनके यहाँ भी वे ही ढ़ोल ताशे… हमारे जलूसों में पटेबाजी और करतब, तो समान दृश्य इनके जलूसों में…

और समापन हमारे यहाँ भी उत्साह और नम आँखों से जल विसर्जन के साथ, तो इनके यहाँ भी जोशपूर्ण गमगीन वातावरण तालाब और नदी के किनारे बने कर्बला मैदानों में दफन…

समझ में नहीं आता जब हमारे यहाँ के मुसलमान ताजियेदारी करते नजर आते हैं तो कहाँ चला जाता है इनका बुतपरस्ती को गुनाह समझने वाला सिद्धान्त… और जब ये पूरे विश्व के इस्लाम जगत को धता बता कर पूर्णतया भारतीय और सनातनी तरीके से अपने त्यौहार को व्यापक रूप से मना सकते हैं, तो क्यों नहीं ये उस त्यौहार को हमारे साथ मना पाते…

क्यों होते हैं दंगे… क्यों ममता-नितीश को अलग-अलग दिन रखने पड़ते हैं… क्यों यहाँ की तमाम मान्यताओं से नफरत करते हुये हमेशा उल्टे चलते हैं… यहाँ तक कि रोटी तक भी उल्टे तवे पर बनाते हैं…

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