BHU तो झांकी है, पूरा भारत बाकी है

BHU के वाइस चांसलर गिरीशचंद्र त्रिपाठी जी को मैं नहीं जानता. BHU चर्चा में आया इसलिए उनका नाम सुना. रविश जी के साथ बहस के कारण उन्हें भी देखा और सुना. बाकी उनके बारे में कोई जानकारी कभी हासिल नहीं की है.

अब ये जो किस्सा हुआ है जहां उनकी ढेर सारी कमियाँ उजागर की जा रही हैं. और यह भी स्पष्ट हुए जा रहा है कि शायद यह कथित छेड़छाड़, केवल आंदोलन छेड़कर BHU के कारोबार में छेड़खानी करने के लिए ही की गई हो.

रविश जी जिंदगी में BHU गए ही होंगे. मैंने तो दो दिनों में मुश्किल से दस घंटे बिताए वहाँ. मुझसे अधिक समय ही दिया होगा उन्होने. और मेरा अधिकतर समय तो लोगों से बातें करने में ही बीता. एक बात समझ में आई कि यह कैम्पस अपने आप में एक शहर सा है. इसके द्वार हैं लेकिन यह किला नहीं है कि बंद हो जाये. यहाँ एक thoroughfare भी है जिससे हज़ारों बाहरी लोगों का रोज़ का आना जाना लगा रहता है.

जिस तरह छेड़छाड़ को लेकर रविश जी, गिरीशचंद्र त्रिपाठी जी को घेरने की कोशिश कर रहे थे, उनकी दुष्ट मंशा स्पष्ट दिख रही थी. कोई भी सिस्टम हमेशा प्रोसीजर से ही चलता है. हर एक की अपनी ज़िम्मेदारी होती है, जवाबदेही होती है जिसके अंदर वो काम करता है. अगर वो बात निपटा न सका तो अगली लेवल तक जाती है. यहाँ भी यही हुआ.

रविश जी एक ही बात को लेकर अडे रहे, कि वाइस चांसलर साहब ने इतनी देर से परिस्थिति का संज्ञान क्यों लिया. इसका सीधा उत्तर पिछले पैराग्राफ में दिया है. वैसे भी रविश जी कई जगह ऐसे सवाल पूछ रहे थे कि कोई उनके जितना ही तेज़ व्यक्ति होता तो उन्हें वहीं धरकर नंगा कर देता. त्रिपाठी जी, रविश जी की तुलना में कहीं भी नहीं थे इसीलिए रविश जी आश्वस्त थे.

एक और बात सामने आई इस बहस में. त्रिपाठी जी ने अपनी बात रखने के लिए बिना टोक का स्पेस मांगा तो रविश जी हड़बड़ाये. त्रिपाठी जी इस को उपलब्धि में परिवर्तित नहीं कर सके लेकिन यह बात स्पष्ट थी कि लाल माइक वाला तानाशाह है, अगले को बोलने नहीं देता.

अगर अगला अपनी बात रखने के हक़ की बात करें तो ये लाल माइकिया तानाशाह बौखलाएगा. और अगर live चर्चा हो तो इस बात का बहुत उपयोग हो सकता है. लाल माइकिया को भी तमीज़ सिखाई जा सकती है और जानी भी चाहिए. अनिवार्य हो गया है यह अभी. बहुत धृष्टता करते हैं, शालीनता का मुखौटा लगाकर. ये कैसे हो सकता है इस पर विडियो बनाया जा सकता है अगर किसी स्टुडियो की सुविधा मिले.

लेकिन मेरा एक और सवाल है यहाँ. जिस तरह से और जिस तैयारी से बाहरी लोग आए, उसका संज्ञान पुलिस और इंटेलीजेन्स वालों ने पहले क्यों नहीं लिया? बनारस के मित्रों के साथ चर्चा में यह बात निकल आई कि काफी नए लोग दिख रहे हैं. पुलिस ने हेर, धर और थूर कर पूछताछ की होती तो पूरा षडयंत्र खुलकर सामने आ जाता.

लगता है BJP को विपक्ष की नीचता का अंदाज नहीं है या फिर ऐसी नीचता का उत्तर कैसे दिया जाता है इसकी समझ नहीं. वैसे विपक्ष से अपेक्षा यह होती है कि वो सरकार को गलत कदम न उठाने दें. लेकिन यहाँ विपक्ष सरकार को गलतियाँ करवाने पर उतारू है ताकि उसको जनता की नजरों में गिराया जा सके. काम करने न दो और कहो कि ये काम नहीं कर सकते. ऐसों से बलप्रयोग से ही निपटा जा सकता है.

क्या सरकार को यह अंदाजा नहीं होता कि जब भी मोदी जी वाराणसी आएंगे तो कोई मुद्दा खड़ा किया जाएगा? और BHU एक प्राइम टार्गेट है? भले ही जनवरी 2017 में भाजपा की सरकार नहीं थी लेकिन क्या अस्सी पर हुए वामी परिसंवाद (19-01-2017) जिसका घोषित लक्ष्य ही Save BHU Save Education Save Democracy था, और जिसमें नामी गिरामी पैशाची बुद्धि के बुद्धिपिशाच उपस्थित थे, उसका भाजपा ने संज्ञान नहीं लिया था? क्या पुलिस या IB ने यह बात और उसकी रिपोर्ट नहीं दी थी? माना कि मंत्री नौसिखिये हैं, लेकिन क्या पुलिस और IB भी? या फिर ये नोटबंदी के नुकसान का गुस्सा बोल रहा है?

यहाँ एक अलग बात कहता हूँ. शोहदे का प्रतिकार न कर सकने वाले पुरुष की स्त्री, उस शोहदे के प्रति आकर्षित हो जाती है क्योंकि उसे अपने पति से ही घृणा होने लगती है कि ये मुझे बचाने हाथ भी नहीं उठा रहा. जनता शब्द भी स्त्रीलिंगी होता है. बाकी आप समझदार हैं.

पुलिस, CID और IB से इस परिसंवाद की रिपोर्ट मंगवाइए. LIU ने रिकॉर्डिंग की थी या नहीं? क्या तय हुआ?

मीडिया वो मच्छर है जो सरकार को हिजड़ा बना देता है अगर सरकार मच्छर का लिहाज करे. ये मीडिया इज्ज़त के काबिल रहा नहीं है; इसका लिहाज नहीं, इलाज जरूरी हो गया है.

BHU की बात पर आयें तो रविश जी एक अजेंडा चला रहे थे कि त्रिपाठी जी ने खुद आ कर बात क्यों नहीं की, नहीं तो मामला इतना नहीं बढ़ा होता.

रविश जी की धूर्तता समझने के लिए एक बात समझनी होगी. किसी भी संस्थान में chain of command होती है एक सिस्टम होता है. उसी से काम होता है. छात्रा की शिकायत का निपटारा वार्डन / प्रोक्टर लेवल पर होना चाहिए. यहाँ यही होता कि अगर छात्रा उन लड़कों को नहीं जानती या उनका बाइक नंबर भी नहीं देख पायी तो पुलिस में FIR कर के पुलिस को अपना काम करने दें.

लेकिन यहाँ मामला बढ़ाने की ही इच्छा थी, उन्हें किसी भी जवाब से संतुष्ट नहीं होना था. वाइस चांसलर मिलने आते तो उनसे भी असंतुष्टि दिखाई जाती, योगी जी से मिलने की मांग की जाती. वे भी मिलते तो उनका भी अपमान किया जाता और मोदी जी आए हैं तो वे ही मिलने आए, यहाँ, रास्ते पर, ये भी मांग की जाती. इसीलिए तो सभी लोग तैनात किए गए थे कि उपद्रव किया जाये. नहीं तो इससे भी बड़े कांड हो जाते हैं, कौन आता है?

ये खेल है मानसिक वर्चस्व का, कि हम आप के कार्यप्रणाली में दखल दे कर आप को हमारे कहने के मुताबिक नचा सकते हैं. आप के टॉप के व्यक्ति को भी सब काम छोड़कर हमारे किसी अदना व्यक्ति से भी बात कराने पर मजबूर कर सकते हैं. ये हैसियत है हमारी और आप की यही औकात. आप हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि हमारे पास आप की छवि बिगाड़ने की क्षमता है. असली सामर्थ्य हमारा है.

ये अराजक तत्वों का पसंदीदा खेल है जिससे वे ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कराते हैं जिससे सरकार, पुलिस, कानून, व्यवस्था पर से जनता का विश्वास उड़ जाये. वही शोहदे वाली हरकत है जहां शोहदे से कड़ाई से निपटने की आवश्यकता है.

BHU में इसके फलस्वरूप कुछ बदलाव हुए. इससे कई लोगों को खुशी हुई. उनकी खुशी जायज़ है या नहीं, या उनके शिकवे जायज़ थे या नहीं, इसकी मुझे जानकारी नहीं है. लेकिन एक बात है कि अपनों से निपटने के लिए शत्रु को भेद बताना या शत्रु को निमंत्रण देना हमारी पुरानी बीमारी है जिससे हम अभी तक सुधरे नहीं हैं. श्रीराम ने ही विभीषण को लंका का राज्य दिया, बाकी हर जगह शत्रु को बुलाने वाला उसके द्वारा निपटाया ही गया.

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