नमो चालीसा : धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे

नमो के बयानों, उनकी कार्यशैली पर पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से जो कुछ भी सोशल मीडिया और MSM पर होता है. आरोप प्रत्यारोप के बीच जो लोग उनका मुख्य उद्देश्य विस्मृत कर देते हैं उनके लिए साहित्यकार गुरुदत्त जी की पुस्तक “परित्राणाय साधूनाम” से कुछ पंक्तियाँ उद्दृत करना चाहूंगी कि –

“कृष्ण ने जब यह कहा था- “धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे” तो उसने उस योजना का ही उल्लेख किया था जिससे सत्य की विजय हुआ करती है और पाप का नाश हुआ करता है”

“परन्तु प्रश्न यह है कि क्या सत्य की विजय हुई थी?”

“नि:संदेह हुई थी”

“क्या युद्ध में कृष्ण ने झूठ बोल-बोलकर पांडवों की विजय नहीं कराई थी?”

“वह तो युद्धकाल की नीति का प्रश्न था. युद्ध से पूर्व तो कृष्ण ने कभी झूठ नहीं बोला था. युद्ध से पूर्व अर्जुनादिक पांडव-पक्ष के लोगों ने लाखों की क्या, दस-बीस की भी हत्या नहीं की थी. मेरा कहने का अभिप्राय यह है कि युद्ध-पूर्व अर्थात साधारण परिस्थिति में श्रेष्ठ और दुष्ट की परीक्षा की जानी चाहिए. “विनाशाय च दुष्कृताम” के लिए कृष्ण का युद्धकालीन झूठ और अर्जुनादिक हिंसा अनुचित नहीं कही जा सकती.”

“यह कैसे जाना जाय कि विपक्षी दुष्ट है और हमारा पक्ष ही श्रेष्ठ है. युद्ध के समय तो प्राय: दोनों पक्ष स्वयं को ठीक ही मानते हैं”

“किसी के स्वयं के मानने से तो कुछ होता नहीं. शास्त्र ने परीक्षा के लिए कसौटी बना दी है. उस पर परखकर ही तो हम किसी पक्ष के श्रेष्ठ अथवा बुरा होने का निर्णय कर सकते हैं. और वेदानुगामियों की संशयात्मक बुद्धि नहीं होती. वे तो स्थिर बुद्धि के होते हैं. निर्णय करते समय वे उसे शास्त्र में लिखित सिद्धांतों के कसौटी पर परख लेते हैं और फिर निश्चय बुद्धि से कार्य करते हैं.”

“क्या शास्त्र की कसौटी में कोई दोष नहीं है?

“अनुभव और युक्ति से तो शास्त्र के सिद्धांत निर्भ्रान्त प्रतीत होते हैं. देखिये मुख्य सिद्धांत ये हैं-
एक, चरित्रवान वह है जो यम और नियमों का पालन करता है.
दूसरा, चरित्रवानों को निर्भय करना परम कर्तव्य है, इस निर्भय करने में दुष्टों का विनाश आवश्यक है.
तीसरे, “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम” के लिए बहुत कुछ त्याग और तपस्या करनी पड़ती है. इस त्याग और तपस्या में प्राय: अच्छे लोगों में से कइयों को आत्मसमर्पण भी करना पड़ता है.”

उपरोक्त उद्धरण में प्रत्येक पंक्ति पर गहन विचार से आज की ही नहीं किसी भी समयकाल की परिस्थितियों को समझा जा सकता है.

जब अंग्रेज़ कहते हैं “Everything is fair in war” तो कैसे हम कूदकर उसमें हामी भर देते हैं. लेकिन वही बात जब गीता से उद्धरित की जाएगी तो हम साम्प्रदायिक कहलाने लगते हैं. युद्धकाल में राष्ट्र हित के लिए लिया गया किसी भी तरह का निर्णय स्वीकार्य होता है. और युद्ध का मतलब हमेशा हाथ में तलवार बन्दूक लिए खड़ी सेना नहीं होता, हाथ में कलम लिए भी हम सैनिकों की भांति राष्ट्रहित के लिए लड़ सकते हैं.

कौरव सेना में पड़ी फूट तो समझ आती है, ‘देश विरोधी तत्वों’ की तरह विनाश काले विपरीत बुद्धि के तर्ज़ पर भीष्म और कर्ण के बीच सेनापति पद के लिए हुई तकरार, कर्ण और शल्य के बीच का द्वेष तो समझ आता है. वे अपनी सेना या राज्य के लिए नहीं अपने अपने स्वार्थ के वशीभूत लड़ रहे थे. ठीक वैसे ही जैसे विरोधी अपने अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए लड़ रहे हैं.

लेकिन आज तो हम विकास और समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं, हमें अपने सेनापति पर विश्वास करना ही होगा. राष्ट्रहित के अलावा उनका कोई उद्देश्य ही नहीं, फिर क्यों हम उनके हर फैसले में दो पक्ष में खड़े हो जाते हैं. वर्तमान में थोड़ा सा नुकसान उठाकर यदि भविष्य सुखद होनेवाला है तो हमारी दृष्टि उतनी दूर तक क्यों नहीं देख पाती. क्या हम भी त्वरित लाभ और व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण राष्ट्र हित में रोड़ा बन जाएं?

बात चाहे सेना की हो, युवाओं, गरीबों, किसानों की योजनाओं को लेकर हो, बात चाहे विमुद्रीकरण और GST की हो सब अपने बहीखाते खोलकर नफा नुकसान बताने बैठ जाते हैं. सोशल मीडिया पर समय बिताने के लिए लिखा गया आपका कोई विचार किसी पाठक की मनोवृत्ति पर क्या असर डाल रहा है इस बात की फिक्र किये बिना बस कीपैड पर अंगूठा लगाए जाते हैं.

याद रखिये ये अंगूठा आप अपनी आनेवाली पीढ़ी के लिए तैयार हो रही वसीयत पर लगा रहे हैं. इसलिए मुद्दे और मामलातों को पूरी तरह समझ कर उसके वर्तमान और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों को मद्दे नज़र रखते हुए फिर अंगूठा लगाइए. ऐसा न हो कि आपकी ये विरासत किसी गलत को वारिस बना दें.

और अंत में फिर वही बात लिखूँगी कि “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम” के लिए बहुत कुछ त्याग और तपस्या करनी पड़ती है. इस त्याग और तपस्या में प्राय: अच्छे लोगों में से कइयों को आत्मसमर्पण भी करना पड़ता है.”

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