खुला पत्र : पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के नाम

माननीय हामिद अंसारी साहब
पूर्व उपराष्ट्रपति, भारत

तीन दिनों पहले आपने कोझिकोड में हुए एक समारोह में भाग लिया था. इस कार्यक्रम का सह-आयोजन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफआई) ने किया था. ऐसा संगठन जिस पर युवाओं को इस्लामिक स्टेट (आईएस) में शामिल करवाने के आरोप हैं उस पीएफआई के कार्यक्रम में आप के भाग लेने पर जब विचार किया तो आप के कुछ दिनों पहले जब उपराष्ट्रपति की विदाई समारोह का आपका एक इंटरव्यू याद आया तो अनायास ही दिल किया कि मन में जो विचार आ रहे हैं वो आपको एक खुले ख़त के माध्यम से पूछ लूँ.

आपने 10 वर्षों तक देश के दूसरे सर्वोच्च पद को शोभित किया इसके लिए हम आपके तहे दिल से शुक्र गुजार है. आप इससे पहले सरकार के अनेक पदों पर कार्यरत रहे हैं और डिप्लोमेट के तौर पर देश के लिए काम भी किया है. एक रिवाज होता है जब कोई अपने पद से सेवानिवृत्त होता है तो उसके लिए विदाई समरोह का आयोजन किया जाता है आपके लिए भी किया गया. एक जवाबदार प्रधानमंत्री के नाते मोदी जी ने सभी औपचारिकताएं निभाई. हमें देख के बहुत आनंद भी है कि 10 वर्ष की सेवा के बाद जहाँ आपकी विदाई हुई वहीँ देश को अपना अगला उपराष्ट्रपति भी मिल गया है. लेकिन एक बात जो मुझे और शायद इस देश के हर इंसान को दुखी कर गयी वो जो विदाई समारोह के पहले एक टीवी चैनल को दिए गए साक्षात्कार में आपने वो कह दिया जिसे कहने से शायद आपको बचना चाहिए था. कम से कम अपनी पद की गरिमा का रक्षण करना आपका दायित्व होना चाहिए था.

जनाब आप उस देश को असहिष्णु घोषित कर रहे हैं जिस देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर एक अल्पसंख्यक होते हुए, सहिष्णुतापूर्वक, सभी ऐशोआराम के साथ, सभी सरकारी सुविधाओं का लाभ लेते हुए बने रहे. इस दौरान आपकी देश के प्रति कोई खास उपलब्धि भी नहीं रही है, न ही आपने समाज में कोई बदलाव लाने की कभी कोई किंचितमात्र भी कोशिश की, न ही समाज के किसी मसले या कुरीतियों को सुलझाने में कोई योगदान दिया है. बावजूद इसके आप उस पद पर 10 लम्बे वर्षो तक बने रहे. इस दौरान न ही किसी हिन्दू ने और न ही देश के किसी अन्य समाज ने आप पर उंगली उठाई. सभी ने सहिष्णुतापूर्वक आपके 10 वर्षो के कार्यकाल एक तरह सहा लेकिन अपने सहिष्णु होने का बखूबी परिचय भी करवाया तथा इस देश की महानता को दुनिया को दिखाया कि किसी तरह का कोई भेदभाव न होता है न किया जाता है.

जनाब इस देश के हिन्दुओं को आप असहिष्णु कहते है. जरा कभी अपने अंतरात्मा की आवाज सुनना कि सच में आप इन्हीं हिन्दुओं की बात कर रहे है न जो हिन्दू इस देश में 100 करोड़ से भी ज्यादा आबादी के साथ बहुसंख्यक होते हुए सदियों से इस देश की एकता और संप्रभुता को बनाये हुए है, देश के कानून और देश की अस्मिता को सबसे ऊपर रखते है, हर समस्या का हल सिर्फ और सिर्फ कानून और अदालतों से चाहते है. अरे जनाब इन हिन्दू को छोडो, हिन्दुओं के तो आराध्य भगवान् श्रीराम तक इस देश के कानून और संविधान के दायरे में आते है. तभी तो आजतक श्रीराम तिरपाल में विराजमान है. अपने जन्मस्थली के मंदिर की प्रतीक्षा करते हुए अपने ही 100 करोड़ हिन्दू भक्तो के होते हुए भी. इसका मतलब नही की वे बना नहीं सकते मंदिर बल्कि वो इस समस्या का हल सबके ख़ुशी से, देश के कानून से, संविधान के दायरे में रहते हुए चाहते है. उन्ही हिन्दुओं को आप असहिष्णु कह रहे है यह आपकी सिर्फ एक समाज के लिए अपनी संकीर्ण सोच को दर्शाता है.

रामलला दसकों से तिरपाल में बैठे देश के सुप्रीम कोर्ट का मुंह तक रहे है और उनके 100 करोड़ भक्त अज भी संविधान और कानून की प्रतीक्षा कर रहे रहे है. वरना क्या वजह होती की 100 करोड़ होते हुए भी अपने आराध्य भगवान् के लिए एक मंदिर न बना सके.

भूलिए मत न तो इस देश में कभी पैसो की कमी रही है और न ही शौर्य और हिम्मत की. बहुत लम्बा इतिहास है इस देश का इसे अपनी छोटी सी सोच से धूमिल न कीजिये साहब यह देश मुगलों को धूल चटाने वाले शिवाजी महाराज का है, महाराणा प्रताप जैसे शूरों का है तो चाणक्य का है सम्राट अशोक का भी है. बुद्ध और गाँधी का है तो भगत सिंह राजगुरु, आज़ाद और 16 बरस की उम्र में हंसते हंसते फांसी पे चढ़ जाने वाले खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारियों का भी है. बलिदानियों और क्रांतिकारियों का देश है फिर भी यह लोग कोर्ट की तरफ देखते है महज एक मंदिर बनाने के लिए क्यूंकि अगर हिन्दू डरते नहीं है तो किसी भी समाज और वर्ग को डराकर भी नहीं रहना चाहते है.

बस इस देश की अखंडता और संप्रभुता को बरकरार रखना चाहते है क्योंकि सच कहूँ तो वो अपने देश को अपने धर्म से ऊपर रखना जानते है. यही कारण है हमारी गंगा जमुनी तहजीब का जिसकी चमक सदियों से धूमिल नहीं है और ये देश अनेको आक्रान्ताओं के हमलों के बाद भी सर उठाकर खड़ा है सभी धर्म, सैकड़ों जातियां, हजारो बोली भाषाओँ को अपने में समेटे हुए. कोई ऐसे ही हजारों सालो से अपनी परंपराओं को सहज कर नहीं रख सकता कुछ तो बात होगी इस देश की मिटटी में.

याद रखिये ‘इस देश के संसाधनों पर पहला हक़ एक समाज विशेष का है“ कहने वाला जमाना बीत गया. देश के प्रधान ने पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए किसी भी समाज को कम या ज्यादा न आँका जाये इसको ध्यान में रखकर जब ऐलान किया है की देश के संसाधनों पर पहला हक़ गरीबों का है. “अगर ईद पर बिजली मिलती है तो दिवाली पर भी बिजली मिलनी चाहिए. स्मशान बनते हैं तो कब्रिस्तान भी बनने चाहिए” कहा है तो उनकी सोच को दर्शाता है ये बराबरी और समानता को दर्शाता है. इसमे किसी धर्म को आगे या पीछे रखने की बात नही की गयी बल्कि सबको सामान विकास पहुचे इसकी कल्पना रखी गई है. माने संकेत साफ़ है अन्याय किसी पर भी नहीं होगा और विकास सबका होगा तो फिर आप ये किसके इशारे पर असहिष्णुता का राग अलाप रहे है. आखिर किस उपहार की कीमत चूका रहे है जनाब की जो बात आप 10 वर्षो में नहीं कह सके अपने विदाई के दिन झट से कह दी.

हामिद अंसारी साहब आपने कहा मुसलमान असुरक्षित है और भय में है. लेकिन आपने ये नहीं बताया कि कौनसा मुसलमान असुरक्षित है? देश को बांटने वाले ओवैसी और दबंग मुख़्तार अंसारी जैसा मुसलमान या समाज को एक सूत्र में पिरोनेवाले एपीजे अब्दुल कलाम जैसा मुसलमान, सेना का मनोबल ऊँचा कर खुद को शहीद करनेवाले परमवीर चक्र अब्दुल हामिद जैसा मुसलमान या सेना पर पत्थर फेंकने वाले मुसलमान, देश को एक करनेवाला मुसलमान या कश्मीर पाक को देने की वकालत करनेवाला अलगाववादी वाला, पढ़ लिख के देश की सेवा करनेवाला या देश के वीरों के सम्मान अमर जवान ज्योति को तोड़ने वाला. आखिर कौन से मुसलमान डरे हुए हैं?

अगर सेना पर पत्थर फेंकनेवाला, देश के टुकड़े करने पर आमदा अलगाववाद वाला, समाज को बाँटनेवाला, अमर जवान ज्योति तोडनेवाला, समाज में व्याप्त कुरीतियों से मुंह मोडनेवाला, संविधान कानून को न माननेवाला, शरिया कानून को सख्ती से लागु करने की वकालत करनेवाला, हमारी मुस्लिम बहनों की बुर्का प्रथा के खिलाफ आवाज़ को दबानेवाला मुसलमान अगर डरा हुआ है तो मैं कहना चाहूँगा ये डर बने रहना चाहिए. ये डर जरुरी भी है. न जाने वो कौनसी वजह है जिससे आप डर को तो देख पा रहे है लेकिन उन डरनेवालों के कुकर्मों को नही देख पा रहे है.

आप भी जानते है मुस्लिम भी दो तरीके के है इस देश में जैसे हिन्दू दो तरीके के है. गौ को पूजनेवाले गौ-रक्षक है और गौ रक्षा के नाम पर इंसानियत के भक्षक भी है लेकिन जब देश का प्रधान शक्तिशाली पद पर बैठे हुए उस मंच से कहता है की फर्जी गौ-रक्षको पर लगाम लगाना होगा, ये इंसानियत के दुश्मन है तो ये सन्देश जाता है की किसी के साथ भेदभाव की नीती नहीं अपनाई जाएगी. लेकिन क्या आप सर्वोच्च पद पर बैठकर ये कह पाए कभी की देश के मुसलमानों को देश के जवानों पर पत्थर बाजी नही करनी चाहिए, की मुसलमानों को देश के संविधान का कानून का आदर करना चाहिय. देश की एकता अखंडता को बनाये रखने में योगदान देना चाहिए. क्या आपने अपने मुस्लिम समाज के लिए, अपने बहनों के लिए, अपनी कुरीतियों के खिलाफ कभी आवाज़ उठाई है की बहु विवाह, तिन-तलाक, हलाला, बुरका जैसी कुरीतियाँ बंद हो जानी चाहिए? जब आप 10 वर्षो में यह नहीं देख पाए तो साहब आपको यह किसने बता दिया की इस देश का मुसलमान डरा हुआ है?

जनाब गौर करनेवाली बात तो यह है की अगर मुसलमान डरा होता तो ये बात भी सार्वजनिक मंचो से खुलकर चीख चीख नहीं कह प् रहा होता की मुसलमान डरा है. आप अपनी बातो बड़े इत्मीनान से इतने बड़े मंच से शांतिपूर्वक रख पा रहे है और पूरा देश को उसको सहिष्णुतापूर्वक सुन रहा हैउसके बाद भी आपको पुरे राजकीय सम्मान से विदाई दी गई यही इस बात का पुख्ता सबूत है की यह देश सदियों से सहिष्णु था और रहेगा. आपने तो केवल अपने 10 वर्षो के उपहार फर्ज मात्र अदा करने का काम कर गए.

जनाब आपको सर्वोच्च पदों पर इसीलिए नहीं बिठाया गया था की आप देश की समस्या हमें गिनाये बल्कि आपको समस्याओं के समाधान के लिए बिठाया गया था. समस्या तो हम बतायेगे आपको समाधान ढूँढना होगा. समस्या तो बहुत है देश में| हर कीसी को है हर किसी की अलग है.

समस्या महिलाओं को बुर्के से भी है और अपनी आजादी की भी है. समाज में व्याप्त कुरीति, तिन तलाक को ख़त्म करने की भी है तो समस्या पत्थर फेकने वालों से भी है. समस्या अलगाववादियों से भी है तो देश को तोड़नेवाले मीडिया घरानों से भी है. फर्जी गौरक्षकों से है और गौ-भक्षकों से भी है, भ्रष्ट्राचार से है तो गरीबी से भी है. पकिस्तान से है और चीन से भी है. समस्या मौलानाओं को है शरिया कानून छीन जाने से तो हिन्दुओं को भी है मंदिर न बन पाने के कारणों से. लेकिन जब आप 10 वर्ष पूरे कर अपने विदाई समारोह में देश को गति प्रदान करने और आनेवाले उपराष्ट्रपति को शक्ति प्रदान करने की बात करने की बजाये आप देश की एकात्मता को खतरे में डाल कर देश के एक धड़े को डरा हुआ बताते है तो माफ़ करियेगा साहब आपकी 10 वर्षो के ईमानदार कार्यकाल पर भी न जाने संदेह होने लगता है. जनाब उस पद पर न कोई मुसलमान होता है न हिन्दू होता है वो सिर्फ एक भारतीय होता है. अपनी न सही पद की गरिमा का ध्यान रखा होता आपने लेकिन लगता है आप दस वर्ष देश के राष्ट्रपति नहीं बल्कि एक समाज और एक पार्टी के सिपहसलार बनकर रहे. न जाने क्यूँ लगता है की कुछ तो मज़बूरी होगी आपकी किसी पद का या उपहार का कर्ज अदा कर के जाना है आपको. चलो इसी के साथ एक बार ही सही लेकिन अपने अंतरात्मा की आवाज़ जरुर सुनने की कोशिश कीजियेगा शायद बची हुई जिंदगी में आप देश के लिए कुछ अच्छा कर पायें इसी उम्मीद के साथ अपनी बात ख़त्म करता हूँ. धन्यवाद.
जय हिन्द ! वन्दे मातरम !

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