शांतिदूतों के शांति प्रस्ताव – उमर का सुलहनामा – 1000 वर्ष बाद भी वही बात

इस्लाम के इतिहास में उमर का सुलहनामा एक अहम दस्तावेज़ है जिसकी जानकारी हर गैर मुस्लिम को होनी आवश्यक है. आज भी यह मानने के कारण हैं कि मुस्लिम राजनेता इसी को गैर मुस्लिम समाज पर किसी न किसी आंशिक रूप से थोपने की कोशिश करते रहते हैं.

उस सुलहनामे की सभी शर्तें दे रहा हूँ, खुद ही पढ़ कर गौर करें. मेरी टिप्पणियां, जहां आवश्यक लगी, वहाँ ब्रैकेट में दी हैं. वैसे Terms Of Umar, Pact Of Umar या Conditions Of Umar नाम से गूगल सकते हैं, ढेरों रिफ्रेन्स मिल जाएँगे.

सीरिया के ईसाई जब मुसलमानों से युद्ध हारे तो इस्लाम के दूसरे खलीफा उमर इब्न अल खत्तब को उन्होने एक सुलहनामा भेजा, जिसकी शर्तें उमर के मर्जी के मुताबिक ही थी. शर्तें कुछ इस प्रकार हैं:

हमारे शहरों में या उनके आस पास के इलाकों में हम कोई नए चर्च, सन्यासियों के लिए आश्रम, सन्यासिनियों के लिए आश्रम नहीं बनवाएंगे.

मौजूदा जो भी निम्न इमारतें हैं या जो भी मुस्लिम इलाके में हैं उनमें कोई क्षति उत्पन्न हो तो हम उसे वैसे ही क्षतिग्रस्त रहने देंगे, और उनकी कोई मरम्मत करने का कतई प्रयास नहीं करेंगे. (न नए मंदिर बनाने की स्वतन्त्रता और न पुराने के जीर्णोद्धार की).

राहगीर और यात्रियों के लिए हमारे दरवाज़े हमेशा खुले रहेंगे. उनके रास्ते से कोई भी मुस्लिम गुजर रहे हो उन्हें हम तीन दिन तक खाने–रहने की सुविधा प्रदान करेंगे.

हमारे चर्च में या हमारे घरों में किसी भी (मुस्लिम विरोधी) जासूस को आश्रय नहीं दिया जाएगा. न ही ऐसे किसी व्यक्ति को हम मुस्लिमों से छुपाएंगे.

हमारे बच्चों को हम कुरान नहीं सिखाएँगे. (इस्लाम के स्वरूप की जानकारी नहीं देंगे).

हमारे धर्म का हम कोई भी सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करेंगे और न ही किसी को हमारे धर्म में मतांतरित करेंगे. (विसर्जन यात्रा पर आपत्तियाँ, हुल्लड़ और घर वापसी पर प्रतिक्रिया याद करें).

अगर हमारे किसी भी संबंधी ने इस्लाम अपनाना चाहा तो हम उसे रोकेंगे नहीं. (लव जिहाद में फंसी लड़कियों के माँ-बाप ने कुछ कड़े कदम उठाए तो मीडिया से क्या तमाशा खड़ा किया जाता है, याद है न?)

हम मुसलमानों को हमेशा सम्मान देंगे. अगर हम बैठे हैं और वे बैठना चाहे तो हम उठकर हमारे आसन उन्हे देंगे.

हम मुसलमानों की कोई नकल नहीं करेंगे – जैसे कि उनके समान वस्त्र पहनना, या उनके जैसी पगड़ी पहनना या उनके जैसे जूते पहनना या उनके समान बाल बनाना. हम बोलने का ढंग भी अलग रखेंगे और उनके बोलने का ढंग नहीं अपनाएँगे.

हम घुड़सवारी नहीं करेंगे, न ही कोई तलवार या अन्य कोई शस्त्र रखेंगे और न ही अपने बदन पर कोई शस्त्र रखेंगे. (खुद ही इसका अर्थ समझ लीजिये)

हमारी मुहरों में अरबी लिपि का प्रयोग नहीं करेंगे.

हम शराब नहीं बेचेंगे.

हमारा कपाल का हमेशा मुंडन करेंगे.

हम कहीं भी हों, एक ही तरह के वस्त्र पहनेंगे और कमर में हमेशा एक विशिष्ट पट्टा (zunar) बांधे रहेंगे.

जिन सड़कों पर या बाज़ारों में मुसलमानों का आना जाना है वहाँ हम हमारे क्रॉस या हमारी किताबें नहीं प्रदर्शित करेंगे.

हमारे चर्च में भी ज़ोर से घंटनाद नहीं करेंगे और केवल उनके लोलक से मंद ध्वनि करेंगे, और न ही हम प्रार्थनाएँ ऊंचे स्वर में गाएँगे. (नमाज कितनी भी ऊंचे आवाज़ में हो, लाउडस्पीकर जायज है, आरती के वक़्त लाउडस्पीकर उतारने का मुलायम तरीके से या ममतापूर्ण आग्रह)

जब हम हमारे मृतकों को अंतिम संस्कार के लिए ले जा रहे हैं तो धीमे स्वर के साथ ही यात्रा होगी.

मुस्लिम इलाके से हमें गुज़रना हो तो हम दिये नहीं जलाएंगे.

हमारे मृतक मुसलमानों के नजदीक नहीं दफनाएंगे.

हम हमारे घर मुसलमानों से ऊंचे नहीं बांधेंगे.

ये (धिम्मा की) शर्तें हमें मंजूर हैं और हम इनका पालन करेंगे, जिनके बदले में आप हमारी रक्षा करेंगे. अगर हम से किसी भी शर्त का उल्लंघन हुआ तो परिणामों के हम ही जिम्मेदार होंगे. (धिम्मा = दोयम दर्जे का नागरिक होना)

जब खलीफा उमर को यह सुलहनामा पढ़ कर सुनाया गया तो उन्होने संतोष जताया और कहा कि इसमें और दो शर्तें जोड़ दी जायें. वे हैं:

जिन्हें मुसलमानों ने गुलाम बनाया है ऐसे व्यक्तियों को हम खरीदेंगे नहीं. (आपका परिचित-रिश्तेदार हो तो भी खरीद के आज़ाद नहीं कर सकते, अब आया इस शर्त का मतलब समझ में?)

किसी भी मुसलमान पर हमारा हाथ नहीं उठेगा. अगर किसी ने हाथ उठाया तो उसे इस सुलहनामे से कोई भी संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा.

वैसे जो मुसलमान से हारा है उसके साथ अपमानजनक बर्ताव इस्लाम में जायज़ है. जज़िया जिस तरह से लिया जाता था, याने जिस तरह से अमुस्लिम को मुस्लिम अधिकारी को सौंपना पड़ता था, वह बहुत ही बेइज्जती करनेवाला प्रोसीजर है लेकिन इस्लाम में वो पूर्णतया जायज़ है.

शांति के अर्थ अलग-अलग होते है. हमेशा एक बात याद रखें. चर्चा के लिए एक फ्रेम ऑफ रिफ्रेन्स होती है. शांतिदूत हमेशा आप को उनकी फ्रेम ऑफ रिफ्रेन्स पर चलाना चाहेंगे. उनके मुताबिक उनका मज़हब सत्य है क्योंकि उनके श्रद्धेय ने उनसे वैसे कहा है और ये कहा है कि उन्हें ईश्वर ने भेजा है. आप से आग्रह करेंगे कि आप भी उनका ये कहना सत्य मान लें.

शराफत से आप मान गए तो आप उनके trap में आ जाते हैं. उनके श्रद्धेय कहते हैं कि वे और उनका प्रणित मज़हब ही अंतिम सत्य है, बाकी सब या तो झूठ है (मूर्तिपूजा) या फिर कालबाह्य है (यहूदी और ईसाई), और सभी मनुष्यों को इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य है.

आप को या तो सहर्ष स्वीकार करना होगा अगर मुसलमान आप को दावत दे रहे हैं या फिर वे आप पर राज करेंगे – अगर आप उनसे युद्ध में जीवित रहे. श्रद्धेय का यह भी कहना है कि पूरी पृथ्वी पर इस्लाम की सत्ता कायम करना ही अल्लाह का हुक्म है, और हर मुसलमान को इस हुक्म की तामीली में अपने हैसियत से शरीक होना है. ये उसका कर्तव्य है.

बाकी आप सोचिए आप को क्या करना है. आत्मानं सततं रक्षेत.

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