जीत नज़र नहीं आती तो हुदैबिया की सुलह, जब जीते तो उमर का सुलहनामा!

मुसलमान के लिए दो सुलहनामे अहम हैं. पहला हुदैबिया की सुलह और दूसरा उमर का सुलहनामा. जब जीत नज़र में नहीं आती तो हुदैबिया की सुलह. और जब जीत जाये तो उमर का सुलहनामा.

हुदैबिया की संधि में मक्का के कुरैशों ने कुछ शर्तें लगाई थी जिन्हें मुसलमान बहुत अपमानकारक बताते हैं. लेकिन ह. मुहम्मद ने उन्हें मान लिया. क्या थी वे शर्तें?

कुरैशों ने इनके दावे को मानने से इंकार किया था और कहा था कि “खुद की पहचान के साथ साधारण अरबी पद्धति से, पिता के नाम के साथ लिखें, अल्लाह का रसूल न लिखें, हम ये कुबूल नहीं करते कि आप रसूल हैं, होते तो आप से जंग न करते. इसे काट दो”. अली ने मना किया लेकिन ह. मुहम्मद ने खुद अपने हाथ से वे शब्द काट दिये.

आप किसी मुसलमान मौलाना को इस पर बोलते सुनेंगे तो वे कहेंगे कि ये उन्होने शांति के खातिर किया. उनके साथी तो उस वक़्त मरने मारने को तैयार थे इनकी शान के खातिर. लेकिन इन्होंने अमन के लिए ये अपमान का घूंट पी लिया.

अपने साथियों को समझाया कि इसके पीछे जो कूटनीति है यह आप लोगों को समझ नहीं आएगी. भरोसा रखिए. बेमन से ही क्यों न सही, वे मान गए. ह. मुहम्मद खुद, शांति के खातिर यह इतने बड़े अपमान का घूंट पी गए. ऐसी मिसाल दूसरी मिल नहीं सकती.

ये उनकी सोच है. लेकिन ज़रा सोचिए, मरने मारने से क्या होता? अगर जीत भी जाते तो कुरैश भी कच्चे या कायर नहीं थे. खालिद, जो बाद में इस्लाम का सब से बड़ा सिपहसालार बना, उस समय कुरैश का सेनापति था और मशहूर योद्धा था. मुसलमानों का खात्मा होने के आसार थे और जीतते भी, तो कम बचते, फौज कम हो जाती, बाद में कोई भी निपटा जाता.

ह. मुहम्मद के सेनापतित्व के बारे में जो समझने से इंकार करें वे मौलाना की बातों को मानने को स्वतंत्र हैं. मैं समझता हूँ, उन्होने जो किया वो व्यवहारिक था. अब मौलानाओं को महिमा मंडन करना है तो कौन रोक सकता है? इस तरह के परिस्थिति देखकर की हुई संधियों के और उदाहरण भी दे सकते हैं लेकिन ज़रूरी नहीं है.

दस साल की मुद्दत थी सुलह ए हुदैबिया की, दो साल के बाद टूटी. मुसलमानों का कहना है कि मक्का वालों ने संधि का उल्लंघन किया, लेकिन खुद पढ़ने पर बात पकड़ में आती है. टाइमिंग!

अमन के खातिर उन्होने (मुसलमानों के मुताबिक) मृत्यु समान अपमान भी झेल लिया, अपने हाथों से अपने नाम के आगे लिखा ‘रसूलल्लाह’ काट दिया. मक्का से कोई मदीना में पनाह माँगेगा तो नहीं देंगे, लौटा देंगे लेकिन मदीना से किसी ने मक्का में पनाह मांगे तो मक्का वाले रख सकते हैं, यह भी मान लिया.

तो यहाँ मक्का पर आक्रमण इतना ज़रूरी हुआ? और जब आक्रमण किया तो क्या सुलह के प्रस्ताव नहीं आए थे? मान लिया एक भी? तब जीत सामने दिख रही थी तो अमन ओझल हो गया? हुदैबिया की संधि के समय उनके साथ 1500 लोग थे लेकिन मक्का फतह के समय 10,000 का लश्कर ले कर निकले थे.

कहने का मतलब एक ही है, कि अगर मुसलमान संधि के लिए तैयार हो जाएँ तो उनके लिए हुदैबिया का उदाहरण है. बाकी आप समझदार हैं. अब उमर का सुलहनामा देखें.

इस सुलहनामे को ले कर एक विवाद है कि लागू करनेवाले खलीफा उमर कौन से थे. दूसरे खलीफा उम्र इब्न खत्तब या उमय्यद खलीफा उमर (दूसरे) जो 9वीं सदी में हो गए.

लेकिन यह सुलहनामा बहुत महत्व का है. इस्लाम जब जीतता है तो उसकी ऐसी शर्तें होती हैं जिनसे उबरना मुश्किल है. इब्न ताइमिय्या के अनुसार, गैर मुस्लिम इसकी शर्तों से तभी मुक्त हो सकेगा अगर वो इस्लाम की फौज में शामिल हो कर इस्लाम के लिए लड़ेगा.

वैसे जिन मुल्कों में ये लागू हुआ वे वहाँ यूरोपीय सत्ताओं के आने तक कभी स्वतंत्र नहीं हुए और आज मुस्लिम देशों का हिस्सा है. अपवाद यरूशलम का, वो भी इसलिए कि वहाँ इस्राइल आ गया. Pact of Umar / Omar अथवा Treaty Of Omar / Umar के नाम से गूगल कर लीजिये.

तात्पर्य एक ही है. इस्लाम से कोई भी संधि करने से पहले ये दो सुलहनामे और उनकी परिस्थितियाँ समझ लें. जब इस्लाम जीत नहीं सकता है तो हुदैबिया की संधि का अनुसरण किया जाएगा जिसे सही समय देखकर कोई भी बहाना देकर तोड़ा भी जाएगा. जो जीतता है वो इतिहास अपने हिसाब से लिखता लिखवाता है. और जहां इस्लाम जीत सकता है तो उमर का सुलहनामा ही हारे हुए लोगों की नियति होती है.

उमर का सुलहनामा आप यहाँ पढ़ सकते हैं. [शांतिदूतों के शांति प्रस्ताव – उमर का सुलहनामा – 1000 वर्ष बाद भी वही बात]

इस्लाम से सलूक वही करें, जो इस्लाम आप से करेगा. काश पृथ्वीराज को यह पता होता.

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