BHU : आपको इसमें design नज़र नहीं आता? कितने भोले हैं आप!

1950 से 90 के बीच एक अंग्रेजी उपन्यासकार हुए हैं Irwing Wallace. उन्होंने एक उपन्यास लिखा था The Almighty… Almighty मने सर्वशक्तिमान… प्रिंट मीडिया की कहानी थी।

एक Media Tycoon अपने मीडिया साम्राज्य को कायम रखने के लिए और हमेशा सबसे पहले ब्रेकिंग न्यूज़ देने के लिए समाचार खुद गढ़ लेता है. सुनियोजित हत्या, दंगा फसाद करा देता है. उसका मीडिया हत्या या घटना के दो मिनट बाद ही ब्रेकिंग न्यूज़ दे देता है. शायद इसी को सुपारी जर्नलिज्म कहा गया है.

[वामपंथी सिर्फ विश्वविद्यालयों में ही कर पा रहे मोदी के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास]

अन ज़रा, BHU के घटना क्रम पर, इसकी Time Line पर गौर फरमाइये –

21 सितंबर को BHU : दोपहर 2 बजे छात्राओ की तरफ से एक सामान्य पत्र proctor को लिखा जाता है जिसमे लड़कों द्वारा अभद्रता की general शिकायत है, किसी specefic घटना का कोई जिक्र नहीं है. पत्र लिखने वाला गुमनाम है. कोई व्यक्ति विशेष शिकायत कर्ता नहीं है.

पत्र में remedy क्या मांगी गई है?
1. सुरक्षा गार्ड की नियुक्ति
2. प्रकाश की व्यवस्था
3. CCTV की Installation
Proctor ने वो पत्र आवश्यक कार्यवाही हेतु अग्रेषित कर दिया.

पत्र देते ही हो गई घटना!

इस पत्र के ठीक 4 घण्टे बाद यानी शाम के 6.20 पे एक छात्रा के साथ छेड़छाड़ की घटना हो गयी / करा दी गयी / छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया गया.

देर शाम या यूं कहें कि रात 8 या 9 बजे इस छेड़छाड़ की मौखिक सूचना BHU के proctor को दी गयी. अब आप बताइए कि रात 9 बजे पोलिटिकल साइंस का एक प्रोफेसर 40,000 students की एक विशाल यूनिवर्सिटी में रात को 9 बजे क्या एक्शन लेगा? ध्यान रहे कि वो प्रोफेसर है, पुलिस का SSP नहीं.

और सुबह 6.30 बजे जब अभी लोग सो के नहीं उठे थे यूनिवर्सिटी गेट, जिसे सिंहद्वार कहा जाता है, धरना लगा दिया गया.

इतनी जल्दी कैसे जुट गए दिल्ली के लोग?

किसी राजनीतिक पार्टी या ट्रेड यूनियन के नेता से पूछिए कि दोपहर 11 बजे भी कलेक्टर को ज्ञापन देने के लिए 10 आदमी जुटाने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है, कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं और MSc, PhD करने वाली लड़कियां सुबह 6 बजे धरना देने पहुंच गई?

दोपहर तक दिल्ली और JNU तक के धरनेबाज धरना स्थल पर मंडराने लगे? धरना शुरू होने के सिर्फ दो घंटे बाद ही धरने की लीडरशिप बदल गयी? 11 बजे धरने के नारे बदल गए और इंक़लाब और आज़ादी की बातें होने लगी?

आपको इसमें कोई design नज़र नहीं आता?

21 सितंबर को दोपहर दो बजे रोशनी की व्यवस्था, CCTV, सुरक्षा गार्ड की नियुक्ति हेतु प्रार्थना पत्र, इस धमकी के साथ कि यदि कोई घटना हुई तो आप जिम्मेवार होंगे (पत्र की अंतिम लाइन पढ़िए) और 4 घंटे में घटना हो भी गयी और सिर्फ रात बीती और सुबह 6 बजे धरना लगा दिया? यूनिवर्सिटी प्रशासन को समय दिया गया?

4 घंटे में प्रकाश और CCTV लग जायेगा एक सरकारी महकमे में? फिर आप कहते हैं कि वाइस चांसलर ने स्थिति को ठीक से हैंडल नहीं किया?

आपको इसमें सुपारी आंदोलन की बू नहीं आती? आपको नहीं लगता कि सब कुछ पहले से नियोजित था, planned था.

कोई पर्दे के पीछे से सब मैनेज कर रहा था क्योंकि 22 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी बनारस आने वाले थे? क्योंकि देश दुनिया का मीडिया पहले से बनारस में मौजूद था?क्योंकि सारा प्रशासन और पुलिस बंदोबस्त प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगा था ?

आपको इसमें design नज़र नहीं आता? कितने भोले हैं आप?

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