अपनी जड़ों से जुड़ने की हिम्मत दिखाएँ, वरना राष्ट्रवाद के प्रहरी नहीं, पर्यटक ही हैं ‘वे’

फेसबुक पर कई लोगों ने एक पोस्ट शेयर की है. इंदौर की एक मुस्लिम महिला लिखती हैं, वे संघ की एक शाखा में गईं जहाँ कुछ लड़कियों को लाठियाँ चलाने, मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग दी जा रही थीं. उनके मुस्लिम होने के बावजूद उन्हें उसमें खुशी खुशी शामिल किया गया और उनका अनुभव बहुत अच्छा रहा.

यह प्रकरण बहुत अच्छा था, खुशी की बात है कि उन्होंने बहुत सकारात्मक रूप से इसे चित्रित किया. सारे हिन्दू उस मुस्लिम महिला द्वारा की गई प्रशंसा से गदगद थे. सभी उनकी राष्ट्रवादी सोच से बहुत प्रभावित और प्रसन्न थे.

पर इस पोस्ट पर हिंदुओं की प्रतिक्रिया देख कर हिन्दू मानस के बारे में एक निष्कर्ष गहरा हो गया. हिन्दू के मन में मुस्लिम से अप्रूवल खोजने का लोभ इतना प्रबल है कि उनकी बुद्धि लक्ष्य से भटक जाती है.

एक हिन्दू की बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा है, या दिवास्वप्न है कि इस देश में हिन्दू और मुस्लिम सौहार्द्रपूर्ण सहअस्तित्व में रहें. जब भी कोई मुस्लिम इसकी जरा सी संभावना दिखाता है तो हिंदुओं का सारा इतिहासबोध, आजतक का सारा अनुभव नेपथ्य में चला जाता है. सभी इस सौहार्द्र के स्वर्णमृग के पीछे चल देते हैं.

नहीं, आरएसएस की उस शाखा में उस मुस्लिम महिला को शामिल करके कुछ भी गलत नहीं किया गया. पर उस महिला ने चार दिन शाखा में आकर ऐसा भी कुछ नहीं कर दिया कि हम अपने निष्कर्ष बदल लें.

अगर 20 करोड़ में कोई एकाध राष्ट्रवाद की राह पर आपके साथ आना चाहता है तो उसे भगाने की जरूरत नहीं है… आने दें… पर बहुत उत्साहित होने की भी बात नहीं है. सूरज पश्चिम में नहीं उगा है, गंगा अरब सागर में नहीं गिरने लगी…

अधिक से अधिक संभवतः उस उत्साही मुस्लिम व्यक्ति को इस्लाम और राष्ट्रवाद के विसंगत संबंध याद दिला दें… एक बार बता दें कि राष्ट्रवाद की कठिन राह उनके मज़हब से थोड़ी आड़ी ही चलती है, ज्यादा देर साथ नहीं चल पाएंगे… अगर वापस अपनी जड़ों से जुड़कर हिन्दू बनने की हिम्मत है तो सोचें, वरना वे राष्ट्रवाद के प्रहरी नहीं, पर्यटक ही हैं…

एक और बात उठाई गई है उसी पोस्ट में – मुसलमानों को बताया गया है, ऐसा नहीं है कि हिंदुत्व अकेले संघ की संपत्ति है. बाबरी ध्वंस के बाद उसी इंदौर में जब दंगे हुए थे तो शहर के कांग्रेसियों ने हिंदुओं की ओर से मोर्चा संभाला था.

भागलपुर में कांग्रेस के शासन में दंगे हुए थे. कलकत्ता में ज्योति बसु ने मुस्लिम दंगाइयों को पिटवाया था. नरसिम्हा राव का बाबरी प्रकरण में परोक्ष सहयोग रहा है… वहीं शिवराज सिंह और रमन सिंह के काल ने मुस्लिमों को सुरक्षा और प्रश्रय ही दिया है…

इसमें हमारे खुश होने का क्या है?

अगर इंदौर में कांग्रेसियों ने बाबरी के टूटने पर हुए दंगों में हिंदुओं की ओर से मोर्चा संभाला तो वो कांग्रेसी हमारे अपने हैं. अगर बंगाल में ज्योति बसु ने मुसलमानों की तुड़ाई की थी तो वह ज्योति बसु भी एक दिन के लिए ही सही, अपना था. और नरसिम्हा राव तो अपने हैं ही. इसमें शंका कुछ नहीं है. और अगर रमन सिंह और शिवराज हिंदुओं को सशक्त करने में सक्षम नहीं हैं तो वे भी गए गुजरे हैं, उनका विकल्प खोजिये… अंदर या बाहर…

मेरे सीखने भर इसमें इतना ही निकला, और कुछ नहीं. और दुख की बात यह निकली कि कांग्रेस तक में खुरच-खुरच कर, खोद खोद कर अच्छाई खोजनी पड़ रही है.

मुस्लिम समाज के सदस्यों से संघ की प्रशंसा या इस प्रशंसा पर किसी हिन्दू का मोह अच्छे लक्षण नहीं हैं. संघ जिन बातों को अपने विरुद्ध आक्षेप समझ कर रक्षात्मक हो जाता है, उन्हें आक्षेप नहीं, हिन्दू समाज की अपेक्षा समझे… जिन आरोपों को भ्रान्तियाँ समझ कर दूर करने का प्रयास किया जाता है उन्हें लक्ष्य समझ कर प्राप्त करने की चेष्टा करे, इसी में कल्याण है.

 

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY