जीवन से संवाद : प्रकृति एक रहस्यमय रमणी

आँगन के वृक्षों से पीली पत्तियां झड़कर एक कालीन सी बिछा देती है. मन निराश होता तो मैं समझती पतझड़ आ रहा है. चूंकि मन आशा से भरा है तो मैंने सोचा पतझड़ जा रहा है. पीली पड़ चुकी पत्तियां सूखकर गिर रही हैं. अब इन सूनी टहनियों पर नई पत्तियां और नए फूल लगेंगे. मेरे ऐसा सोचने के साथ ही कहीं से ठंडी हवा का एक झोंका आता है और मेरे मन की मिट्टी को और नम कर जाता है. जहाँ पर जीवन में नई आशाएं, नई प्रतीक्षा नए सिरे से शुरू हो जाती है.

पहले लगता था ये सारा मन का खेल है. मन जैसा हो वातावरण वैसा होने लगता है. यदि आप प्रसन्न है, जीवन की सारी ऊहा-पोह के बाद भी संतुष्ट और आशावादी है, तो वातावरण निश्चित रूप से इस बात पर मोहर लगाने के लिए आपके अनुकूल हो जाता है.

अब जाना है कि कोई हवा का झोंका अचानक कहीं से आ जाता है, आसमान में पक्षियों का झुण्ड, कोई फुदकती हुई गिलहरी, कोई हंसता खेलता हुआ बच्चा आपके प्रसन्न चित्त को और प्रसन्न करता है तो, वो यूंही नहीं. प्रसन्न चित्त से उठती लहरें अपनी ही तरह की लहरों को आकर्षित करती है और आपके मौन व्यक्तित्व के साथ प्रकृति मुखर हो उठती है.

यदि ये मानकर चला जाए कि भाषा का आविष्कार न हुआ होता तो, प्राणी प्रकृति से कितना अधिक जुड़ा हुआ होता. दिन भर में कई पल ऐसे आते हैं, कि मैं भूल जाती हूँ कि मुझे बोलना भी आता है. और मैं अपने आसपास की वस्तुओं, पेड़ों, पौधों, पक्षियों या कभी कभी अदृश्यता से, अपनी भावनाओं से, अपने हाव भाव और व्यवहार से जुड़ जाती हूँ. और अक्सर मुझे प्रतिक्रया भी मिलती है.

ये क्यूंकर होता है, आज तक मैं नहीं जान पाई. प्रकृति एक रहस्यमयी रमणी की तरह है और इसके रहस्य को समझने के लिए उसे उघाड़ना नहीं है, बल्कि उसके रहस्य में घुलकर खुद भी रहस्यमय हो जाना है. जो जितना रहस्यमय होता जाएगा उतना ही वो अपने आप प्रकृति के स्वर्णिम नियम को समझता जाएगा. जितना वो उसे मौन रहकर स्वीकार करेगा उतना ही वो उसकी रहस्यमयता से पल्लवित होता जाएगा.

आरम्भ में हम इन के रहस्यों से अवगत होने पर इतने अभिभूत हो जाते हैं कि लगता है पूरी दुनिया को ढोल पीट पीटकर इन चमत्कारी बातों से अवगत करा दें. लेकिन मैंने जाना है कि एक सीमा तक प्रकृति भी साथ देती है कि लोगों तक इन बातों का एक सिरा पहुंचे लेकिन यदि आप उन्हें जबरदस्ती पकड़ाने की कोशिश करते हैं तो प्रकृति या वो अदृश्य शक्ति आपका साथ छोड़ देती है. आप कौन होते हो लोगों को प्रकृति के रहस्य बताने वाले. जैसे आपने जाना है वैसे लोगों को भी प्रयत्न करने दो.

मेरे जीवन में भी वो सीमा आई और उसके बाद मैंने खुद को खींच लिया. बिना स्व अनुभूति के आपकी बातों पर कोई विश्वास नहीं करेगा. मैंने भी लोगों को विश्वास दिलाना छोड़ दिया और प्रकृति के रहस्यों में चुपके से दोबारा विलीन हो गई और मेरे लिए रहस्यों के नए द्वार खुल गए. ………

……..सिर्फ मेरे लिए ……..

सत्य में मेरा विश्वास

मेरी पूर्णत्व की परिकल्पना

हे प्रभु !

तुम्हारे सृजन में सहायता दे… – गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर

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