एक कहानी : एहसास

आज करीब बत्तीस साल बाद वैसा अनुभव हुआ. इतने साल पहले मैं भी तकरीबन इतनी ही उम्र का था जब मेरी पत्नी ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ अपने उभरे हुए पेट पर रख दिया था. शायद सातवां या आठवां महीना था, पत्नी से विरक्ति सी हो रही थी, बेडौल शरीर, वाहियात चाल और अंग प्रत्यंगों पर काली भूरी रेखाएं और धब्बे. पर जब उसने अंदर से हल्की सी सरसराहट की तो ना जाने कैसा तो अहसास हुआ.

हालाँकि मनौती मैंने लड़की की मांगी थी पर जब ये हाथ में आया तो लगा कि ये दुनिया की सबसे अनमोल नेमत है जो ऊपर वाले ने मुझे दी है. इतने नन्हें हाथ पैर, इतना कोमल, इतना मुलायम.

हाइजीन का कीड़ा है मुझे पर इस बच्चे के सामने जैसे कुछ पता ही ना चलता. परिवार के नाम पर हम पति पत्नी बस दो ही लोग थे, बहुत रोता था ये और जितना रोता उससे ज्यादा इसके कच्छे बदलने पड़ते, दिन रात सुबह शाम बस एक ही काम, ये निकालें और हम साफ करें.

जब पहली बार घुटनों पर चला और फिर जब खुद अपने पैरों पर, आहा, ऐसी खुशी का पल पहले कभी नहीं आया था जीवन में. कुछ कुछ बोलने भी लगा था और पहला शब्द इसने ‘माँ’ नहीं ‘पा’ कहा था.

ऑफिस से थक हार जब घर पहुंचो तो ये साहब हमेशा बाहर सड़क पर अपनी माँ की ऊँगली पकड़े मेरा इंतिजार करते हुए दिखते, और फिर जब तक इन्हें गाड़ी पर बिठा दो तीन चक्कर ना लगवा दो, घर जाने की आज्ञा नहीं मिलती.

स्कूल में सबसे अच्छे विद्यार्थियों में गिने जाते, इनकी माँ जो इनपर खूब मेहनत करती. आठवीं तक तो वे इनकी मदद करती रही फिर नवीं से मेरे हवाले हो गए. इनको पढ़ाने के लिए ऑफिस में दिन भर खुद पढ़ा करता और फिर शाम को इन्हें पढ़ाता.

शायद परवरिश में कोई कमी रह गई जो बुरी संगत में पड़ गए, गुटका और सिगरेट, ना जाने कैसा साहित्य. उसे दो तीन थप्पड़ मारने के बाद खुद कितना मानसिक आघात पहुंचता था, कैसे बताऊँ.

यहां वहां कई जगह पढ़ता कि एक उम्र के बाद पिता को पुत्र का मित्र बन जाना चाहिए. कई बार कोशिश की, पर जब भी ये सामने आता तो अंदर का पिता इस मित्रता को कुचल डालता, कैसे कोई पिता दोस्त बन सकता है. धीरे धीरे ना जाने कैसे एक गैप सा आता जा रहा था हम दोनों के बीच, कितनी कोशिश करता था इसे कैसे भी तो भर दूं पर होता ही नहीं था. बचपन में बोलना शुरू करता तो चुप ही नहीं होता था, पा ये क्या, पा ये क्यों, पा ये कैसे, और अब कुछ बोलता ही नहीं . मैं ही कुछ बोल दूं, कुछ पूछ दूं तो बस हां हूं ठीक है.

जीवन भर की कमाई इनकी पढ़ाई में होम कर दी, अच्छे से अच्छे कॉलेज में दाखिला करवाया, कॉलेज से निकलते ही अच्छी सी नौकरी मिल गई इन्हें. शायद नौकरी का ही इंतजार कर रहे थे बरखुर्दार, देश के दूसरे कोने में पोस्टिंग ली और भूल गए कि कोई बाप भी है इनका. हद्द तो तब जब एक दिन फोन से बताया कि शादी कर ली किसी तमिल लड़की से. अगर मुझसे पूछा होता तो यकीनन मना ही करता पर ये तसल्ली तो रहती कि पूछा तो, और क्या पता मान ही जाता जिद्द करता तो.

आज फोन किया और बताया कि पा, मैं पा बनने वाला हूं और आप दादा, लात मारी इसने आज, और हां, मुझे कुछ नहीं पता हां, इसकी परवरिश आप ही करोगे बस बता दे रहा हूं, कल की टिकट भेज रहा हूं…..

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