नमो, नवरात्रि और नया भारत

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नवरात्रि प्रारम्भ होते ही नरेन्द्र मोदी के नौ दिवसीय उपवास अचानक चर्चा में आ जाते हैं. व्रत तो सभी करते हैं, फिर ऐसा क्या है जो प्रधानमंत्री के व्रत को इतना महत्वपूर्ण बनाता है.

इसका सबसे मुख्य कारण मैं बताती हूँ… व्रत, उपवास एक मानसिक अवस्था का नाम है. आप दिन भर फलाहार और उपवास के तरह तरह के व्यंजन खाकर भी उपवासी नहीं कहलाते लेकिन कुछ लोग पूरी आस्था और सात्विक भाव से दो समय भोजन करके भी सदा ही उपवासी होते हैं, अर्थात ‘ईश्वर के पास’. फिर मोदीजी तो इस उम्र में भी निराहार रहकर कड़ा व्रत रखते हैं.

मैं माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उन्हीं उपवासी लोगों में गिनती हूँ जो सदा से ईश्वर के पास वास करते हैं.

ये सिर्फ इसलिए नहीं कह रही कि उन्होंने हिमालय की कंदराओं में अज्ञातवास करते हुए साधना की है, या राजनीति के फलक पर सूरज बनकर भारत माँ को गौरवान्वित कर रहे हैं, या आज विपक्ष के विरोधों के बावजूद उनके हौसले कम नहीं होते.

या अपनी सारी आलोचनाओं को कंठ में धारण कर भी उनके कंठ से किसी के लिए अपशब्द नहीं निकलते, या उनके स्वभाव की विनम्रता उनके व्यक्तित्व और उनकी देह भाषा में अनायास ही प्रकट होती रहती है, या ऐसी बहुत सी खूबियाँ जो उनके विरोधियों की भी दिखाई देती है और वे ईर्ष्या की आग में जल भुनकर मोदीजी के विकास के सपने को तहस नहस करने के लिए जी जान से जुटे हैं…

उपरोक्त तमाम खूबियों के अलावा जो उन्हें सबसे विशिष्ट व्यक्ति बनाता है, वो है उनका जगतजननी माँ अम्बे के प्रति साक्षी भाव.

जी हाँ उनके लिए माँ अम्बे केवल ईश्वर का रूप नहीं बल्कि हर योगी की तरह उनको यह पता है कि यह पूरा ब्रह्माण्ड उसी माँ की अलौकिक ऊर्जा-शक्ति का लौकिक रूप है. इसलिए उनका हर कार्य माँ को समर्पित होता है. फिर ऐसे व्यक्ति के भाव सभी माँ के लिए सदैव एक से होते हैं, फिर चाहे वो जन्म देने वाली माँ हो, अम्बे माँ हो या फिर भारत माँ.

भारत के राजनैतिक गरीब रथ को बुलेट ट्रेन में बदलने के उनके सपने को साकार करने में अभी बहुत बाधाएं आएंगी, और उसके लिए उन्हें कौटिल्य की कूटनीति का सहारा लेकर हमेशा से आलोचनाओं का शिकार भी होना पड़ेगा.

लेकिन जैसा कि मैं हमेशा कहती हूँ, एक कालखण्ड से दूसरे कालखण्ड में प्रवेश के लिए बने बनाए ढाँचे को तोड़ने का जो दुस्साहस करता है, वो उस विशेष काल में यश-अपयश को तो प्राप्त होता है लेकिन आने वाले काल के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल जाता है. इसलिए जब भी किसी ने समाज के बने बनाए ढाँचे को तोड़ा है, उसे सम्मान के साथ अपयश और अपमान भी मिला है.

इस अपमान के ज़हर को भी पचा ले जाने की ऊर्जा ही उनको मिलती है नवरात्रि के इस व्रत से. जगतजननी माँ अम्बे के प्रति उनका साक्षी भाव ही उनको बनाता है “उपवासी”. और यही मातृशक्ति ही साकार करेगी उनके ‘नए भारत’ के स्वप्न को. आइये हम अपने व्रत को भी उनके व्रत में सम्मिलित कर भारत माँ के चरणों में अर्पित करें.

वैसे भी किसी अच्छे इंसान की चेतना जब देश के हित में काम करती है तो उस देश की चेतना भी उन्नति करती है… हालांकि जीवन विरोधों से भरा हुआ है तभी जीवंत है… इसलिए ये बुराई और आलोचनाओं से भरे बादल मंडराते रहेंगे और इन्हीं बादलों के बीच मोदीजी की अच्छाइयाँ और नेकनामी सूर्य की भांति चमकती रहेगी…

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