तुम आयी तो सच कहता हूँ, आया मौसम दोस्ती का

Friendship
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बनारस सिर्फ वही नहीं है जो हम फिल्मों या किताबों में देखते/पढ़ते हैं. भदेसपन और टटकी हुई भाषा-बोली के अलावा भी कई समाज हैं जो बनारसी होते हुए भी आपकी सोच वाले बनारसी नहीं होते. यहाँ सिंधी, गुजराती, मराठी, बंगाली, तमिल हैं, और गरीब, बहुत गरीब, थोड़ा अमीर, ठीकठाक अमीर और बहुत अमीर भी हैं. ये सब अपने अपने विशिष्ट गुणों/अवगुणों के साथ-साथ बनारसी भी हैं. (Moral Story, Friendship).

इन्हीं में एक थी समीरा आर्या, मेरी ग्रेजुएशन की साथी, गुजराती – ठीकठाक अमीर – बनारसी.

अमूमन जैसा होता है, उससे उलट इस लड़की के आगे पीछे भवरें नहीं घूमते थे. ये जब कॉलेज आती तो एक कोने में चेयर डाल बैठ जाती, कभी-कभी तो दूसरी चेयर पर पैर फैलाकर.

ये डिक्टो मेरी स्टाइल थी. जाने क्या हुआ, कैसे हुआ कि हम एक बार झगड़ पड़े, और झगड़ा इतना बढ़ा कि हम दोस्त बन गए.

ये भी ताज्जुब की बात है कि कॉलेज लाइफ में जिससे आप झगड़ते हो, वही आपका बेस्ट-बडी बन जाता है.

हमारी दोस्ती ऐसी थी कि हम हफ़्तों एक दूसरे की शक्ल नहीं देख पाते, फिर भी जब मिलते तो पिछली बार जहाँ बात खत्म की थी, वहीं से शुरू हो जाते.

हफ़्तों क्यों नहीं मिल पाते की वजह ये कि मुझे तो खैर इन सिनेमा वालों की बड़ी चिंता रहती थी कि कहीं ये भूखे ना मरें, इसलिए बनारस के 23 सिनेमाहालों में अक्सर ही मूवी देखने चला जाता या कॉलेज बिल्डिंग के सबसे नीचे वाले फ्लोर में चलने वाले पूल-क्लब चला जाता, स्नूकर/बिलियर्डस देखने/खेलने (हालांकि कभी एक्सपर्ट नहीं बन पाया), और ये मोहतरमा जॉब करती थी. बताओ, 18-19 साल की उम्र में जॉब, पढ़ाई के साथ (क्लास बंक कर) जॉब.

मने हद्द थी ये तो. कहाँ हम लोग मिडिल क्लास के लड़के बाप के पैसे उड़ा रहे होते और ये अमीर बाप की बेटी कहीं छोटी-मोटी जॉब करती थी.

वन्स अपॉन अ टाइम, ये मेरे पास भागती हुई आई और इज्जत का कचरा करते हुए मेरे हाथ से समोसे-छोले की प्लेट छीन कर मुझे एक तरह से घसीटते हुए कैंटीन से बाहर ले गई.

मेरे साथी और जूनियर्स इतने खूंखार आदमी का यूँ घसीटा जाना देख मजे ले रहे थे, और वो खूंखार आदमी डस्टबीन में पड़े अपने 8 रुपये के समोसे-छोले देखे जा रहा था, बड़ा मार्मिक दृश्य था. खैर…

बोली, “बाइक लाया है? पेट्रोल है? मर मत, मैं डलवा दूंगी, अब चल, लंका चलना है”. बताओ साला, इतनी गुंडागर्दी. पर कोई ना, दोस्त थी, हम चल दिये लंका. अब ये पीछे से तेज चला, तेज चला की रट मारे जाए, और बेचारा मैं, बाइकर था कोई पायलट थोड़ी जो उड़ा कर ले जाता.

सच्ची, मुझे लगा था कि कोई सरप्राइज होगा मेरे लिए, दिल में उमंग थी, अच्छा अच्छा लग रहा था कि कुछ तो मजेदार होगा आज. पर जा रे जमाना, निर्मोही मुझे लंका की किसी गली में छोड़कर चली गई कि थोड़ी देर में आती हूँ. इसका थोड़ी देर पूरे एक घण्टे में पूरा हुआ और आते ही अगला हुक्म कि चल सिगरा.

रास्ते में बताया कि इंटरव्यू देकर आ रही है और दूसरा इंटरव्यू देने जा रही है. सिगरा पर मुझे तीन घण्टे वेट करना पड़ा. जब वापस आई तो मैं बाइक पर बैठा अपनी ना जाने कौन सी सिगरेट पी रहा था. देखते ही बोली, स्मोकिंग इज इंज्यूरियस टु हेल्थ, और सिगरेट छीनने को आगे बढ़ी.

यार 3 रुपये की सिगरेट, जो अभी आधी बची हो, कैसे बरबाद करने देता. आसपास के लोग देख रहे थे और ये मस्तमौला मुझसे सिगरेट छीन रही थी. बोली, “ये सिगरेट मुझे दे दे ठाकुर”, ये सुनकर धुंआ गले में फंस गया, हंसते-खांसते, अपनी आंख का पानी पोंछते हुए जब मेरी नजर उस पर पड़ी तो मेरा जबड़ा लटक गया. खाली मेरा ही कहाँ, आसपास खड़े सभी लोग जबड़ा लटकाये इस लड़की को देख रहे थे. ये मोहतरमा बड़े स्टाइल से मुझसे छीनी हुई सिगरेट अपने होठों पर लगाये कश खींच रही थी, और तो और फिर धुंए के छल्ले भी बना रही थी. माँ कसम, मजा आ गया था ऐसी बिंदास लड़की देखकर. साथ ये भी बोल गई कि थोड़ी महंगी वाली पिया कर, ये तो बहुत हार्ड है.

एक बार पापा से भी मिली थी ये. मेरे दोस्तों में ही कुछ बात थी या पापा में, कभी जान नहीं पाया. मुझसे ज्यादा मेरे पापा के दोस्त बन जाते सब. बहुत दिनों बाद तक पापा से इसकी बात होती रही थी.

कहते हैं ना कि ‘सत’ खत्म करना हो तो उसमें मिलावट कर दो. रिश्तों में मिलावट, रिश्ता खत्म कर देती है. मुझे भी जाने क्या सुर चढ़ा था कि एक दोस्त के कहने पर उसे प्रपोज कर दिया. उस दिन एग्जाम खत्म हुआ था हमारा, उसे घर छोड़ने के रास्ते में बोल दिया था मैंने. वो शॉक्ड, बोली, यार, ये बात तू पहले नहीं बोल सकता था, मेरी तो शादी तय है.

उसे सच में मेरे लिए बहुत बुरा लग रहा था, बोली कि घर मत चल, सारनाथ चलते हैं. पर मैंने मना कर दिया. रात फोन किया, पापा से बात की फिर मुझसे बात करने लगी. मुझे भी बहुत अजीब सा लग रहा था, क्योंकि मैं सच में तो प्यार करता नहीं था उससे. उसे छलने चला था, उसे ये दुख दे गया था कि उसकी वजह से उसका दोस्त (यानि मैं) दुखी है, जबकि ऐसी कोई बात ही नहीं थी.

अगली सुबह उसने मुझे एक पार्क में बुलाया, मुझे समझाने लगी, और मैं शर्मिंदगी के मारे सर नीचा किये उससे कुछ बोल नहीं रहा था. मेरा यूं सर झुकाकर बैठे रहने से उसे और पीड़ा होती, वो और शिद्दत से मुझे समझाती, मैं शर्म से और गड़ जाता. हिम्मत कर, उसका हाथ अपने हाथों में लेकर उसे सच बताया, बताया कि मैं झूठ बोल रहा था, चाल चल रहा था, तुझे बेवकूफ बनाने चला था. उसे जैसे ही मैंने इस बात का यकीन दिलाया, वो उठकर चली गई. उसके बाद हमारी कभी बात नहीं हुई. आज तक नहीं हुई.

उसकी शादी में मेरे अलावा सभी आमंत्रित थे.

रोज की तरह तफरी मार कर जब रात 8 बजे घर आया तो पापा ने कहा कि समीरा का फोन आया था अभी, तुम्हें अपनी शादी में बुला रही है, चले जाओ.

उसने मुझे माफ़ कर दिया, उसने मुझे याद किया, इतना बहुत था मेरे लिए. शादी में जाने का कोई मतलब नहीं था.

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