उठिए, किताब उठाइये : सिर्फ लाल कपड़े में लपेट कर अगरबत्ती दिखाने से तो होगा नहीं काम

ma durga indonesia

वसुदेव और देवकी की आठवीं संतान को जन्म लेते ही मार देने के इरादे से कंस ने दोनों को कैद कर रखा था. ऐसे में ही एक दिन उसके पास नारद पहुंचे. नारद अजीब अजीब चीज़ें सिखा देने के लिए भी जाने जाते हैं इसलिए कंस को भी उन्होंने वैसी ही पट्टी पढ़ाई. उन्होंने कंस से पूछ लिया कि चक्र (circle) शुरू कहाँ से हुआ और ख़त्म कहाँ पर हुआ ये कैसे जोड़ोगे ? कोई सीधी लकीर तो है नहीं कि यहाँ से शुरू वहां ख़त्म !

अगर पहली तीन बेटियाँ होंगी और फिर पांच पुत्र हुए, तो पांचवा पुत्र तो आठवीं संतान भी हुआ. इसी तरह सात बेटे हुए और आठवीं बेटी, फिर एक बेटा तो आठवें बेटे (यानी नौवीं संतान) को मारोगे या आठवीं संतान, यानि बेटी को मारोगे ? ऐसे अटपटे प्रश्न से कंस परेशान तो हुआ, मगर ज्यादा दिमाग खर्च करने और जोड़-घटाव करने के बदले उसने तय किया कि चक्र में गिनती जहाँ से शुरू करो, वहीँ आकर अंत भी होता है. तो सबको मार दिया जाए, समस्या ही हल हो जायेगी !

ये कहानी दो वजहों से याद आई है. एक तो इसलिए क्योंकि वसुदेव-देवकी की आठवीं संतान सचमुच लड़की ही थी. उन्हें महामाया का अवतार माना जाता है जो कंस के हाथों मरी ही नहीं, उल्टा उसी के मृत्यु की भविष्यवाणी कर गई थीं. महाभारत के अज्ञातवास के समय पांडव इसी महामाया की उपासना करते दिखते हैं. दूसरा इसलिए क्योंकि कुछ लोग जो सोच रहे हैं पहले दिन पाठ नहीं किया तो अब करें या नहीं, वो भी कंस से प्रेरणा ले सकते हैं. नवरात्रि जो हर साल चक्रीय क्रम में दोहराई जाती है, उसमें पहला कौन और आखरी कौन सा ? आप आज भी पाठ शुरू कर सकते हैं.

कहा जाता है कि कहीं रेगिस्तान के बीचो-बीच खड़ा एक इकलौता पेड़, शमी का पेड़ है. पता नहीं कैसे बिना पानी के स्रोतों के आस पास हुए वो जीवित भी है. महाभारत की महामाया से ये भी जुड़ा है कि जब पांडव अज्ञातवास में जाते समय अपनी भेष-भूषा बदल रहे होते हैं तो वो राजा विराट की राजधानी के बाहर थे. वहीँ एक शमी का पेड़ होता है जिसके कोटर में वो अपने हथियार छुपा देते हैं. यहाँ युधिष्ठिर महामाया की उपासना करते दिखते हैं.

जिस महामाया की पूजा यहाँ विराट पर्व (पाण्डव-प्रवेश पर्व पांचवे अध्याय) में युधिष्ठिर कर रहे होते हैं वो और कोई नहीं विष्णु यानि नारायण की बहन मानी जाने वाली नारायणी होती हैं. महामाया रूप में भी वो कृष्ण की बहन होती हैं. यही रूप ललिता सहस्त्रनाम में भी नजर आता है, जहाँ विष्णु त्रिपुर सुंदरी के भाई हैं. बाद में जब शमी के पेड़ से पांडव अपने हथियार वापस निकालते हैं तो वो भी विजयदशमी का दिन होता है. इसी वजह से शमी को पूज्य मानने और आयुधों की पूजा की परंपरा भी होती है.

मोटे तौर पर ये माना जा सकता है कि हिन्दुओं के ग्रंथों को आप चाहे जिधर से भी उठा लें, उसमें उन्हीं देवी-देवताओं की पूजा उपासना नजर आती है. सबसे लम्बे समय से, आक्रमणों का प्रतिरोध करते, जीवित बचने का इतिहास भी हिन्दुओं का ही है. इस वजह से हमारी लौकिक परम्पराओं में भी ग्रन्थ नजर आ जाते हैं. हाल के वर्षों में जैसे जैसे हमलावर कौमें ये महसूस करने लगी हैं कि सम्मुख युद्ध में हिंदुत्व हज़ार साल में भी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुए, वैसे वैसे हमले के तरीके बदल कर परम्पराओं को रूढ़ी घोषित करने लगे हैं.

ऐसे में हिन्दुओं के काल को एक पीढ़ी आगे ले जाने की जिम्मेदारी निस्संदेह हम लोगों पर ही आती है. सिर्फ लाल कपड़े में लपेट कर उन्हें अगरबत्ती दिखाने से तो काम होगा नहीं. उठिए, किताब उठाइये!

#उत्तिष्ठत_जाग्रत_प्राप्य_वरान्निबोधत

(तस्वीर प्रमबनन मंदिर के दुर्गा विग्रह की है, जिसे इस्लाम पूर्व के जावा, इंडोनेशिया में बनाया गया था)

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