लड़ना तो पड़ेगा ही… बस ये सोच लीजिये, किसके लिए लड़ेंगे?

ज्यादातर हिंदुओं के सामने अगर आप आसन्न संकट की समीक्षा करते हैं तो लगता है जैसे पड़ोस वाली पुष्पा की मम्मी को कैलकुलस पढ़ा कर आ रहे हो. उन्हें आप इस सभ्यता और संस्कृति पर संकट नहीं समझा सकते. आप उन्हें यह नहीं बता सकते कि भारत की हज़ारों सालों की संस्कृति नष्ट हो जाएगी, हमारे वंशज गुलाम या धिम्मी बनकर इस्लामिक शासन में शरिया के अंदर जीने को मजबूर होंगे… या विखंडित भारत में गृहयुद्ध की विभीषिका झेलेंगे.

ये सब दूर की बातें हैं. सामान्य मध्यमवर्गीय हिन्दू को जो बात समझ में आती है वह है तात्कालिक लाभ-हानि. एक औसत हिन्दू का नब्बे प्रतिशत उद्यम अपने बच्चों के आसपास केंद्रित होता है. बच्चे को अंग्रेज़ी पोएम सिखानी है, बच्चे को अच्छी नर्सरी में भेजना है, बच्चे का अच्छे स्कूल में एडमिशन कराना है, बच्चे को आईआईटी की तैयारी करानी है, बच्चे की शादी करानी है, बच्चों के बच्चे को संभालना है क्योंकि बहू को नौकरी करनी है.

मूल में देखिए तो यह बच्चों की भी शुद्ध चिंता नहीं है, इसके मूल में भौतिक आर्थिक समीकरण ही अधिक हैं. बच्चा कमाए, ज्यादा पैसे वाली नौकरी करे, नौकरी करने वाली बहू लाये… दोनों मिलकर और ज्यादा कमाएँ. इसके पीछे भविष्य की प्लानिंग नहीं है. यह चिंता नहीं है कि हमारे बच्चे कैसा जीवन जियेंगे, किस तरह के समाज में रहना चाहेंगे. अपनी संततियों को कैसे संस्कार देंगे, देश-समाज से कैसे जुड़ेंगे कि उनकी संचित आर्थिक समृद्धि सुरक्षित रह सके.

इसलिए ऐसे हिंदुओं से जब आसन्न सामाजिक संकट की चर्चा करें तो उसे स्पष्ट शॉर्ट टर्म इफ़ेक्ट तक सीमित रखें. आपकी जान पर खतरा है, और आपकी सोसाइटी का सिक्योरिटी गार्ड आपकी रक्षा नहीं कर पायेगा. आपके बच्चों को आपकी आँख के आगे काट डाला जाएगा और तब आईआईटी की अग्रवाल क्लासेज़ का स्कोर उसकी जान नहीं बचाएगा. अगर आपकी आंखों के आगे आपकी बेटी का बलात्कार होगा तो यह विचार आपको कोई सुख नहीं देगा कि आप सेक्युलरिज्म की जड़ें मजबूत कर रहे हैं क्योंकि बलात्कारी मुसलमान है. आपकी नौकरी, आपका रोज़गार सुरक्षित नहीं है.

सच कहूँ, यह भी कहकर देखा है… सामने वाला इसे आपके दिमाग में भरे ज़हर की उपज बताता है… “ऐसा कुछ नहीं होने वाला”… यह कराची, लाहौर, रावलपिंडी जैसे हिन्दू बहुल शहरों में हुआ है, आज़ाद भारत में काश्मीर में हुआ है, या आज बंगाल में हो रहा है, इससे वह इम्प्रेस्ड नहीं है.

या आपको लगता है कि आपके तथ्यों और तर्कों की रौशनी में उसने मान लिया कि ऐसा कुछ हो सकता है या होने ही वाला है… तो अभी आपको पूरा झटका लगना बाकी है… उसके ब्रह्मास्त्र के लिए तैयार हो जाइए – “अगर ऐसा हो ही जायेगा तो क्या कर लेंगे? कन्वर्ट हो जाएंगे… हर धर्म तो एक समान ही है, क्या फर्क पड़ता है”.

हिंदुओं का एक वर्ग धर्मांतरण को आखिरी इलाज माने बैठा है. उसे यह नहीं पता कि दुनिया में मुस्लिम, मुसलमानों की संख्या बढ़ाने में उतने इंटरेस्टेड नहीं हैं… वह बढ़ाने के लिए उन्हें अल्लाह के दिये अपने औज़ार का इस्तेमाल करना है, और अपनी या काफिरों की स्त्रियों की योनियाँ और गर्भाशय किस दिन काम आएंगे.

उनकी दिलचस्पी आपको कन्वर्ट करने में नहीं हैं. उन्हें आपकी ज़मीन, आपका फ्लैट, आपका रोज़गार चाहिए… संभवतः आपकी बेटी भी, अगर बोनस में मिल रही हो. कश्मीर से हिंदुओं को जब भगाया गया तो उन्हें दीन की दावत नहीं दी गई. उन्हें अल्लाह के संदेश के बारे में नहीं बताया गया.

मोहल्ले के लड़कों ने उनके दरवाज़े पर निशान लगा रखे थे कि उन्हें भगाने के बाद उस पर किसका कब्ज़ा होगा. उन्होंने नारे लगाए, “हिंदुओं, कश्मीर छोड़ दो… और अपनी औरतों को पीछे छोड़ जाओ”… कराची या लाहौर में हिंदुओं को दीन की दावत नहीं दी गई. उन्हें काटा गया, लूटा गया… अगर कन्वर्ट ही कर लिया जाता तो कब्ज़ा किसके मकान पर करते? बलात्कार किसका करते?

आप आज लड़ने को तैयार नहीं हैं. आपको लगता है, बिना लड़े दीन-हीन बन कर या धर्म बदल कर किसी तरह काम चल जाएगा… तो भूल जायें… आप कल को लड़ेंगे… उनकी फौज में जाकर लड़ेंगे, अपने भाइयों से लड़ेंगे…

क्योंकि इस्लाम की सबसे संक्षिप्त और स्पष्ट व्याख्या है – इस्लाम एक फौज है. और अगर आप फौज में भर्ती हुए हैं तो लड़े बिना क्या उपाय है… सोच लीजिये… किसके लिए लड़ेंगे?

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