क्योंकि हम ‘दीपावली’ नहीं मनाते, पटाखावली और झालरवली मनाते हैं

dipavali diya patakha

मेरा घर वरुणा नदी के तट पर है, गंगा की एक सहायक नदी. बनारस है तो गंगा जी के लिए मशहूर पर इसका नाम दिया है दो अन्य नदियों ने, वरुणा और असी. इन दोनों के बीच की भूमि वाराणसी. अपने इसी जीवन में मैंने इस वरुणा को धीरे-धीरे नाला बनते देखा है और अब फिर से इसे वापस नदी बनता हुआ देख रहा हूँ.

रोज शाम को जब गोपाल लोग अपनी भैसों को नदी से वापस ले जाते तो उनके साथ-साथ रेस लगाते कुम्हार लोग भी दिखते जो अपनी ठेला गाड़ियों पर नदी से निकाली गीली मिट्टी ले जाते. इन मिट्टियों से दिन भर या तो चाय पीने वाले कुल्हड़ बनते या पूजा वगैरह में इस्तेमाल होने वाले दीपक. दीवाली से 2-3 महीने पहले से ही खूब जम कर काम करते ये भाई लोग.

अब नहीं दिखता ये नजारा.

क्योंकि हम ‘दीपावली’ नहीं मनाते. हम पटाखावली और झालरवली मनाते हैं.

कहानियों में पटाखे आज से 2000 साल पहले चीन में खोजे गए, और पटाखों के इस्तेमाल का पहला प्रमाण भी वर्ष 1040 में चीन में ही मिलता है. वहां ऐसा मानते हैं कि पटाखों के शोर से बुरी आत्माएं भागती हैं. हमारे यहां इसके लिए हनुमान चालीसा पर्याप्त है. भारत में पहला पटाखा कारखाना लगा 1923 में. मतलब भारत में पटाखों को अपना शतक मारने में भी अभी छह साल बचे हैं.

तो प्रश्न ये कि पटाखों का दीपावली से क्या सम्बन्ध. ये तो 100 साल या कुल मिलाकर 2000 साल से पुराने हैं भी नहीं, जबकि हम तो मानते हैं कि राम त्रेतायुग में पैदा हुए थे.

वाल्मीकि रामायण (संस्कृत में), कंबन की तमिल रामायण (इरामावतारम), रंगनाथ की तेलुगु रामायण, विममलसुरि की जैनरामायण (पउमचरिय), तुलसी की रामचरितमानस (अवधि में) से लेकर बर्मा की रामवत्थु और थाई रामकियेन तक 300 से अधिक रामायणों में कहीं भी पटाखे का जिक्र नहीं है. दीपकों का है, केवल रामायण में ही नहीं, हिंदुओं की हर आरती में घी या तेल के दिये हैं, हवन-यज्ञ में घी की आहुतियां हैं.

क्यों हैं?

कहीं भी ये नहीं लिखा कि पटाखे फोड़ने से भगवान खुश होते हैं या कोई फायदा होता है (चीन में होता है, ऊपर बताया), पर तीन बत्ती वाला घी-दीपक से गणेश, दो-मुखी घी-दीपक से मां सरस्वती, एक-मुखी घी-दीपक से माँ दुर्गा, 16 बत्ती वाले घी-दीपक से विष्णु और 8 या 12 मुखी सरसो-दीपक से महादेव की कृपा होती है. सूर्य कमजोर हो तो आदित्य हृदय का पाठ और शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या हो तो शनिस्त्रोत का पाठ करते हुए सरसो का दीपक जलाने के लिए कहा जाता है.

ये सब धार्मिक बातें हैं, पर दीपावली भी तो धर्म का ही हिस्सा है. कुछ वैज्ञानिक पहलू भी हैं इन दीपकों के. दीपक एयर प्यूरीफायर का काम करते हैं, हवा से हानिकारक कणों को नष्ट करते हैं. ये एक घर के अंदर पूजागृह में जले एक दीपक की बात है. सोचिये कि जब हर घर के बाहर, छतों पर एक साथ 50-100-200 दीपक जलें तो क्या होगा.

दीपावली का मूल ही है कि वातावरण शुद्ध हो, इतने दिए जलें कि हवा ठीक हो जाये पर हम करते इसका जस्ट उल्टा हैं. हम जितना हो सके उतना अशुद्ध करते हैं, कापर, लेड, मैग्नीशियम, सोडियम, जिंक, नाइट्रेट, नाइट्राइट छोड़ देते हैं और तुर्रा ये कि इसपर गर्व भी करते हैं.

एकपक्षीय सोच से तर्क आता है कि हमें ही क्यों रोका जा रहा है, उन्हें कोई क्यों नहीं बोलता जो एक दिन में हजारों लीटर खून बहा देते हैं नदियों में. तो जरा खुद से सोचिये कि जिन्हें आप अपना ही नहीं मानते, उनके कर्मों के विरोध में पूरी ढिठाई से ये कहते हैं कि वे कुछ करते हैं तो हम भी कुछ करेंगे. “आखिर किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है”. वे नदी-जमीन गन्दी करते हैं, हम हवा गन्दी कर देंगे, भले ही ये बात हमारे अपने मूल धार्मिक कर्तव्य के खिलाफ ही क्यों ना हो.

एक बात और, पिछले साल चाइनीज सामान का बहिष्कार हुआ था, सफल भी रहा. पर कुछ जगहों पर फायदे की जगह नुकसान हुआ, लोगों ने झालरों की जगह दीपक तो जलाए पर केरोसिन के.

विरोध पर्याप्त नहीं है, उचित रीति की भी आवश्यकता हैं.

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