GST के सुपरिणाम तो मिलेंगे ही, देखना ये है कि और कितने दिनों तक चलती है इनकी दुकानदारी

दुनिया के 140 देशों में GST है. 1954 में GST लागू करने वाला फ़्रान्स पहला देश था, चीन ने 1994 में लागू किया. एक-दो को छोड़ दें तो लगभग सारे यूरोपियन देशों में GST है. ग़ौरतलब है कि business में केवल GST होना महत्वपूर्ण नहीं है, उसका IT-enabled होना ज़्यादा महत्व का विषय है, जिसमें व्यक्ति की दख़लअंदाजी न्यूनतम हो, तब ही ये प्रभावी रूप से टैक्स चोरी रोक पाता है. ज़्यादातर देशों में ये IT-enabled हो चुका है.

कहने का मतलब ये कि भारत कोई पहला देश नहीं है जहाँ GST लागू किया गया है. अभी हाल में 2014 में मलेशिया में इसे लागू किया गया. ट्रांज़िशन फ़ेज़ में वहाँ भी बहुत दिक्कतें आयी, लेकिन अभी धीरे-धीरे चीज़ें लाइन पर आ गयी. प्रश्न है कि ये दिक़्क़तें क्यों आ रही थी? क्या बिना किसी दिक़्क़त के भी इसे लागू किया जा सकता था?

तो दिक़्क़त का सबसे बड़ा कारण है GST की समझ! विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती है GST में करोड़ों लोगों को ट्रेंड करना – अधिकारियों को भी और व्यापारियों को भी, ख़ास कर MSME उद्योग से जुड़े व्यापारियों को. चुनौती ये कि केंद्र व राज्य के 60,000 राजस्व अधिकारियों और करोड़ों व्यापारियों को GST से जुड़ी ट्रेनिंग देना ताकि नई व्यवस्था में काम करने की एक समझ तैयार हो. जितनी ही ज़्यादा समझ बेहतर होगी, उतनी ही आसानी से नए सिस्टम में चेंजओवर होगा.

माने GST को अभी लागू किया जाए या एक साल बाद लागू किया जाए, जब भी लागू किया जाएगा, दिक़्क़तें आनी ही है, क्योंकि समझ प्रैक्टिकल माहौल में ही आती है, वरना GST का ड्राफ़्ट तो साल भर पहले से ही उपलब्ध है, CA भी ज़हमत नहीं उठा रहे थे इसको समझने की, क्योंकि ज़रूरत नहीं थी. अब ज़रूरत है तो हर कोई भिड़ा हुआ है GST समझने में, अधिकारी, व्यापारी, CA सभी भिड़े हुए हैं.

DD न्यूज़ पर मैंने देखा कि प्रतिदिन इसमें GST की क्लास लग रही है. कई बार राजस्व सचिव ख़ुद क्लास ले रहे हैं, हिंदी में! अन्य कई विशेषज्ञ भी. GST से जुड़े आम व्यक्ति सवालों के जवाब दिए जा रहे है. GST से जुड़े विज्ञापन आ रहे हैं ताकि व्यापारी की समझ बेहतर हो. अख़बारों में भी आ रहे थे. इंटरनेट पर खोजा तो देखा हिंदी व अंग्रेज़ी दोनो ही भाषाओं में इसकी उपलब्धता है. 2000 ट्रेनरों की फ़ौज लगी हुई है, इसे सरल व सुगम बनाने में.

फिर भी एक समस्या है जो ज़्यादा जटिल है, वो है GST के ख़िलाफ़ नकारात्मक माहौल तैयार करने वाली फ़ौज. रविश कुमार जैसे ‘पत्तलकार’ इसमें ज़्यादा भूमिका निभा रहे हैं. दुर्भाग्य ये है कि व्यक्ति यही न्यूज़ चैनल ज़्यादा देखता है. परिणाम ये हुआ कि इन चैनलों ने नाहक हल्ला मचाना शुरू किया कि GST से वस्तुएँ महँगी हो जाएँगी तो व्यापारियों ने ख़रीद ख़रीद माल स्टॉक करना शुरू किया, लेकिन हो गया उल्टा, व्यापारी घाटे में गया.

हल्ला मचाया गया कि GST आएगी तो आम आदमी का धंधा पानी चौपट हो जाएगा, जिस कारण बहुत से व्यवसायी तो GST नम्बर तक नहीं ले रहे हैं और इस कारण उन्हें दिया गया एक महीने का ग्रेस पीरियड ख़त्म हो गया और वो विरोध ही करते रह गए, GST नम्बर नहीं लिया, उनका वही कच्चा हिसाब किताब जारी रहा, परिणाम ये है कि भयंकर मंदी छा गयी है, व्यापार चौपट होता चला जा रहा है. यहाँ भी देर सबेर रास्ता निकलेगा.

लेकिन सोचने वाली बात ये हैं कि जो DD न्यूज़ पर चल रहा था, यदि वही जागरूकता अभियान निजी मीडिया हाउस ने भी सेवा भाव से चलाया होता, देश-दुनिया की बातें भी बतायी होती, ये बताया होता कि आम आदमी पूरी दुनिया में हैं, कपड़ा व्यवसायी भी है, केवल भारत में नहीं है, वहाँ भी दिक़्क़तें आयी थी, लोग धैर्य रखें, तो लोग आशान्वित होते, सकारात्मक होते, ये ट्रांज़िशन आसान होता. माने इसे आसान बनाने में निजी चैनल बड़ी भूमिका निभा सकते थे, क्योंकि लोग ज़्यादातर निजी चैनल ही देखते हैं, DD न्यूज़ कम देखा जाता है.

लेकिन ये करना तो दूर, उलटे ये तो नकारात्मक भूमिका में हैं. क्या रविश कुमार को नहीं पता है कि कितने देशों में GST है, लागू होने में वहाँ क्या दिक़्क़तें आयी थी? कहने का मतलब, इसे व इसके जैसे पत्तलकारों को देश से कुछ लेना देना तो है नहीं, न आम आदमी से. यदि होती तो जागरूकता अभियान में शामिल होता, भ्रम फैलाने वाले अभियान में नहीं! दूसरे ये निजी चैनल भी एजेंडे से कमाए प्रॉफिट के लिए है, लोकतंत्र की सेवा के लिए नहीं. तो इनसे इससे ज़्यादा की उम्मीद तो की नहीं जा सकती.

लेकिन जो भी हो, GST की समझ बढ़ने के साथ ही सब पटरी पर आता जाएगा. GST के सकारात्मक परिणाम यहाँ भी मिलेंगे जैसे अन्य देशों में दिखाई दिए. भ्रम फैलाने मीडियाई गिद्ध तब किसी नए मौक़े के तलाश में निकलेंगे. देखना यही है कि इनकी दुकानदारी और कितने दिनों तक चलती है.

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