एक बिके हुए चैनल के एक बार फिर बिकने पर छाती पीटना बंद करें रुदालियाँ

खबर आई कि NDTV बिक गया है. खबर आते ही कुछ लोग बहुत खुश दिखे जैसे दुश्मन का कोई किला फतह कर लिया हो, तो कुछ लोग रुदालियों की तरह छाती पीटने लगे कि हाय देश मे स्वतंत्र निष्पक्ष पत्रकारिता की मौत हो गई… और न जाने क्या क्या.

अभी इस खबर को लेकर कई तरह के खंडन आ रहे हैं. अगर ये खबर झूठ है तो यह बड़ी दिलचस्प बात है कि ऐसी खबर इंडियन एक्सप्रेस में कैसे छप गई? अगर यह खबर झूठ है तो यह तय मानिए कि इसे जान बूझ कर NDTV ने ही प्लांट कराया है. NDTV और इंडियन एक्सप्रेस आजकल एक ही नाव में सफर कर रहे हैं. क्यों, यह एक दो दिन में साफ हो जाएगा.

पर बड़ी बात यह है कि क्या फर्क पड़ता है NDTV बिके या न बिके. जो लोग NDTV के बिकने पर रुदाली बन कर ये रोना रहे हैं कि देश में स्वतंत्र पत्रकारिता का अंत हो गया, वो भारत मे पत्रकारिता के संदर्भ में कुछ नहीं जानते. देश में अखबार और टीवी चैनल तो बाजारवाद के चलते बिक रहे हैं. पर पत्रकार तो बाजारवाद के दौर से पहले ही बिकने लगे थे.

मालूम नहीं कितने लोगों को पता है पर सच यह है कि 80 के दशक में जब कांग्रेस के नेता अर्जुन सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने लिफाफा पत्रकारिता की नई शुरुआत की थी. यानी हर महीने प्रदेश के प्रभावशाली पत्रकारों को बंद लिफाफे में पैसा पहुंचाने की. तब प्रदेश के पत्रकारों को हर महीने वेतन से ज़्यादा इंतज़ार मुख्यमंत्री के लिफाफों का होता था. क्योंकि बन्द लिफाफों में वेतन से कहीं ज़्यादा पैसा होता था.

बाद में जब अर्जुन सिंह दिल्ली की राजनीति में आ गए तो उनके साथ-साथ लिफाफा पत्रकारिता दिल्ली में भी आ गई. और दिल्ली में भी पत्रकार बिकने लगे. बाद में कांग्रेस और फिर धीरे-धीरे अन्य राजनीतिक दलों को भी यही लिफाफा पत्रकारिता मुफीद आने लगी.

कुछ पत्रकारों ने लिफाफों के दम पर तो कुछ ने नेताओं से नजदीकियों के चलते ट्रांसफर पोस्टिंग से पैसा कमाया. बड़ी-बड़ी कारें, बंगले और फिर फार्म हाउस खरीद डाले. कांग्रेस राज में पत्रकारों ने कमाया फिर वाजपेयी काल के भाजपा राज में भी. वाजपेयी काल में भाजपा के एक करीबी पत्रकार के कई कई मॉल में हिस्सेदारी है.

जब पत्रकार बिकने लगे तो मालिक कैसे पीछे रहते, उन्होंने खरीदारों को आफर दिया – पत्रकार क्यों खरीदते हो भई पूरा अखबार खरीद लो. और फिर पहले अखबार और अब चैनल बिकने लगे. NDTV भी बिक गया तो क्या हुआ!

NDTV के प्रशंसकों को याद दिला दूं कि ये चैनल तो खड़ा ही हुआ था दूरदर्शन को बेच कर. दूरदर्शन और सरकार के भ्रष्ट अधिकारियों – नेताओं ने NDTV को खड़ा करने के लिए दूरदर्शन को बेच डाला (सरकारी चैनल है इसलिए चलता रहा, यह अलग बात है).

NDTV के बिकने से न तो स्वतंत्र पत्रकारिता का अंत होगा न ही ईमानदार पत्रकारों का. क्योंकि NDTV स्वतंत्र नहीं था , पहले दिन से ही नहीं था. क्योंकि इसकी तो लॉन्चिंग ही प्रधानमंत्री निवास में हुई थी. और इसके कर्ता धर्ता पत्रकार भी कभी भी ईमानदार नहीं रहे. (मैं आम रिपोर्टर और तकनीशियनों की बात नहीं कर रहा). वो सत्ता के लिए काम करते रहे और उसकी कीमत वसूल करते रहे.

नीरा राडिया कांड को कौन भूल सकता है. इस पूरे कांड के फोकस में NDTV के ही पत्रकार थे. फिर यहीं से निकले एक और बडे पत्रकार ने CNN-IBN में अपना साम्राज्य कायम किया और अपने ही रिपोर्टर के स्टिंग आपरेशन (कैश फ़ॉर वोट) को जांच करने के बहाने रोक कर मनमोहन सरकार को जीवन दान दे दिया. क्या मुफ्त में? बिना बिके? कितनी कीमत में, यह नहीं जानता लेकिन डील में एक पद्मश्री सम्मान भी था.

तो इतनी डीलों में एक डील और सही!

और अंत में एक बात उनके लिए जो चैनल बिकने पर लड्डू बांट रहे हैं. NDTV के बिकने से भाजपा को दरअसल नुकसान ही होगा. NDTV ने इतने सालों में नरेंद्र मोदी और भाजपा को बात-बात पर अनावश्यक गालियां देकर, एकतरफा पूर्वाग्रह से ग्रसित रिपोर्टिंग करके और भारत के टुकड़े करने की मंशा पालने वाले अफ़ज़ल और बुरहान गैंग को हीरो बना कर इस देश के आम जनमानस को नरेंद्र मोदी की महत्ता का अहसास ही कराया है. इसलिए लड्डू बांटने वाले प्रार्थना करें कि ख़बर झूठी हो और स्यापा करने वाली रुदालियाँ एक बिके हुए चैनल के एक बार फिर बिकने पर छाती पीटना बंद करें.

लेखक के ब्लॉग प्रारंभ पर पूर्व प्रकाशित लेख

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